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कहीं अखिलेश की हालत अजित सिंह जैसी न हो!

इसमें शक नहीं कि अखिलेश चुनाव हारे तो यूपी के एक और अजित सिंह बन जाएंगे

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Feb 07, 2017 04:35 PM IST

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कहीं अखिलेश की हालत अजित सिंह जैसी न हो!

मुलायम सिंह के राजनीतिक गुरू चौधरी चरण सिंह को पूर्वी उत्तर प्रदेश का आजमगढ़ भी उतना ही पसंद था जितना कि जाटों के दबदबे वाला मेरठ या आगरा.

सत्तर के दशक में उन्होंने मंझली खेतीहर जातियों का मजबूत गठबंधन बनाया था और इसे एक ठोस राजनीतिक ताकत में बदल दिया था.

आजमगढ़ उन्हें इसलिए प्यारा था क्योंकि यह जिला यादवों के दबदबे वाला था जिनका राजनीतिक व्यवहार चौधरी चरण सिंह की भविष्य की राजनीतिक योजना के लिए अहम था.

हालांकि वो खुद जाट थे लेकिन चौधरी पूरे प्रदेश में जाटों के निर्विवाद नेता के तौर पर उभरे. मुलायम सिंह यादव तब उनके चेले थे.

मुलायम ने नजदीक से देखा विश्वासघात का खेल

मुलायम ने राजनीतिक विश्वासघात और अस्थिरता का खेल बहुत करीब से देखा था जब कांग्रेस समर्थित चरण सिंह सरकार को गिरा दिया गया था.

कई तिकड़मों के बाद चौधरी चरण सिंह, उनके पक्के दुश्मन चंद्रभानु गुप्ता और भारतीय जनसंघ साथ आए और 18 अक्टूबर 1970 को त्रिभुवन नारायण सिंह की अगुवाई वाली गैर-कांग्रेसी सरकार को समर्थन दिया.

लेकिन तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी हर कीमत पर टीएन सिंह सरकार को गिरा देने का निश्चय कर चुकी थीं.

पहली बार उन्होंने अपने निजी सचिव यशपाल कपूर को गैर-कांग्रेसी गठबंधन गिराने का काम सौंपा. कपूर की मदद की थी मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्रा ने.

साजिशों के शहर में तब्दील हुआ लखनऊ

इसके बाद लखनऊ साजिशों का शहर बन गया. दलबदल करवाने के लिए शहर के दो बड़े होटलों, कार्लटन होटल और हजरतगंज के कपूर्स इन में ठाठदार दावतें दी गईं.

1971 में उत्तर प्रदेश की 85 में से 73 लोकसभा सीटें जीतने के बाद इंदिरा गांधी ने अपनी कोशिशें तेज कर दीं और टीएन सिंह सरकार को गिरा दिया.

charan singh

चौधरी चरण सिंह

पॉल आर ब्रास ने चरण सिंह की आत्मकथा - एन इंडियन पॉलिटिकल लाइफ- के तीसरे खंड में इस पूरे घटनाक्रम का रोचक ब्योरा दिया है.

यहीं से 'भारतीय राजनीति में गंभीर भ्रष्टाचार' की शुरुआत हुई और 'सूटकेस कल्चर' ने जगह पाई.

यशपाल कपूर पर नोटों से भरे सूटकेस लाकर दलबदल के लिए विधायकों को लुभाने के आरोप लगे थे.

वफादारों की धोखाधड़ी

ब्रास की किताब में त्रिभुवन नारायण सिंह अपने वफादारों की धोखाधड़ी को कुछ इस तरह बयान करते हैं, 'वो लोग, जो कुछ दिन पहले तक, मेरे पास आंखों में आंसू लिए आते थे और कहते थे कि मैं इस्तीफा न दूं... वही लोग एक-एक कर के मुझे धोखा देने लगे. सभी हथकंडे अपनाए गए, ये जांच का विषय है... लेकिन वह (कपूर) प्रधानमंत्री के निजी सचिव रहते हुए वहां लंबे समय तक रहे थे.'

उन दिनों किसी विधायक के लिए राजनीतिक वफादारी बदलने की कीमत 40 हजार रुपए से एक लाख रुपए होती थी. और यह सब सीधे इंदिरा गांधी की निगरानी में किया गया था.

हालांकि इंदिरा गांधी गैर-कांग्रेसी गठबंधन से उत्तर प्रदेश को छीनने में कामयाब हो गई लेकिन चौधरी चरण सिंह उन्हें तब से उनके राजनीतिक जीवन के हर कदम पर चुनौती देते रहे.

उन्हें कांग्रेस पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं था और कांग्रेस से ज्यादा से ज्यादा फायदा पाने के लिए ही गठबंधन करते थे.

वो दोनों दलों के परस्पर विरोधी सामाजिक आधार को भी समझते थे और अपनी राजनीति के अलग किरदार को बचाए रखने के लिए ही चुनावी गठबंधनों से बचते भी थे.

गठबंधन से इसलिए डरते हैं मुलायम 

आज के संदर्भ में इतिहास को याद कर यह समझा जा सकता है कि मुलायम सिंह यादव कांग्रेस से कोई भी गठबंधन करने को लेकर संदेह का रुख क्यों रखते हैं.

मुलायम चरण सिंह की राजनीतिक छाया में पले-बढ़े हैं. उन्होंने चरण सिंह के अवसरवाद को अपनाकर अपने राजनीतिक आधार को न सिर्फ बरकरार रखा है बल्कि उसे बढ़ाया भी है.

अपने गुरू की ही तरह मुलायम को भी आजमगढ़ उतना ही लुभाता रहा है जितना कि इटावा.

2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने आजमगढ़ को अपना संसदीय क्षेत्र चुना ताकि वो न सिर्फ यादवों में बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश की खेतीहर जातियों में भी स्वीकारे जाएं.

राजनीतिक छल से राजनीतिक पूंजी बनाई

बीते चार दशकों में मुलायम सिंह ने कड़ी मेहनत और बेमिसाल राजनीतिक छल से अपनी राजनीति की पूंजी बनाई है.

उन्होंने मुसलमानों-यादवों और पिछड़ी जातियों का सतरंगी गठबंधन तैयार किया और चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत हथियाते हुए उनके बेटे अजित सिंह को हाशिए पर धकेल दिया.

चौधरी की भदेस छवि के बनिस्बत नब्बे के दशक में अजित सिंह सलीकेदार, कम बोलने वाले, अमरीका में पढ़े इंजीनियर थे जो पिता की जगह संभालने लौटे थे. लेकिन आखिरकार उन्हें जो मिली वो पिता की टूटी-फूटी विरासत थी.

राजनीति में जो दिखता है वो अक्सर छल होता है और एक गलत कदम अर्श से फर्श पर ले आता है.

अखिलेश का राहुल गांधी के साथ गठबंधन सुर्खियां जरूर बन सकता है लेकिन सामाजिक गठजोड़ तैयार करने की इसकी क्षमता अभी जमीन पर दिखना बाकी है.

सूटकेस कल्चर की वापसी की गारंटी नहीं

इस बात की भी कोई खास गारंटी नहीं है कि जिस सूटकेस कल्चर ने सत्तर के दशक में चौधरी चरण सिंह को चुनौती दी थी वो अलग अंदाज में वापसी नहीं करेगा. उस खास किरदार को धुंधला नहीं करेगा जिसे चौधरी चरण सिंह और मुलायम सिंह ने बड़ी मेहनत से संभाल कर रखा था.

लेकिन इसमें कोई ज्यादा शक नहीं कि अगर अखिलेश यह चुनाव हारे तो उत्तर प्रदेश की राजनीति के एक और अजित सिंह बन जाएंगे.

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