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कोलकाता के बाद अमरावती, जहां बीजेपी कमजोर है वहां विपक्षी एकता का प्रदर्शन क्या संकेत दे रहा है?

19 जनवरी को पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में मेगा रैली के दिन ही टीडीपी प्रमुख और आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने एक बार फिर विपक्षी दलों के इसी तरह के जमावड़े का ऐलान कर दिया.

Updated On: Jan 21, 2019 05:17 PM IST

Amitesh Amitesh

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कोलकाता के बाद अमरावती, जहां बीजेपी कमजोर है वहां विपक्षी एकता का प्रदर्शन क्या संकेत दे रहा है?

19 जनवरी को पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में मेगा रैली के दिन ही टीडीपी प्रमुख और आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने एक बार फिर विपक्षी दलों के इसी तरह के जमावड़े का ऐलान कर दिया. नायडू ने कोलकाता की रैली को बीजेपी के अंत की शुरुआत बताकर आंध्रप्रदेश की राजधानी अमरावती में भी कुछ इसी तरह की बड़ी रैली करने का ऐलान कर दिया. मतलब अब पूर्वी भारत में कोलकाता के बाद एक बार फिर दक्षिण भारत में अमरावती में बीजेपी के खिलाफ एक मंच पर सभी नेता जुटेंगे.

चंद्रबाबू नायडू के ऐलान के बाद अब सवाल यही खड़ा हो रहा है कि विपक्षी दलों की तरफ से चुनावी साल में पहले उन राज्यों को ही क्यों लक्ष्य बनाया जा रहा है जहां बीजेपी का जनाधार कम रहा है. पश्चिम बंगाल में 294 सदस्यों वाली विधानसभा में सत्ताधारी टीएमसी के 211 विधायकों की तुलना में बीजेपी का महज 1 विधायक है. जबकि लोकसभा में भी 42 सीटों में से टीएमसी के 34 सांसदों की तुलना में बीजेपी के महज 2 सांसद ही जीते हैं.

इसी तरह आंध्रप्रदेश में भी 2014 में साथ हुए विधानसभा और लोकसभा चुनाव में बीजेपी की हैसियत टीडीपी की तुलना में काफी छोटी रही है. हालांकि उस वक्त दोनों दलों के बीच गठबंधन भी हुआ था. लेकिन, उस वक्त भी आंध्रप्रदेश की कुल 176 विधानसभा सीटों में से टीडीपी को 102 जबकि बीजेपी को महज 4 सीटों पर ही जीत मिली थी. इसी तरह लोकसभा चुनाव में राज्य की 25 सीटों में से टीडीपी के खाते में 15 और बीजेपी के खाते में महज 2 सीटें ही आई थीं.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी बात को उठाते हुए विपक्षी दलों को घेरना शुरू किया है. मोदी ने तंज कसते हुए बीजेपी के विरोध में आने वाले महागठबंधन के नेताओं को कोलकाता की रैली में देश भर के विपक्षी दलों के गठबंधन को देखने के बाद पीएम मोदी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी का केवल एक विधायक है लेकिन वहां बीजेपी के विरोध में देश के सारे दल इकट्ठा हो गए हैं. मोदी ने इसका कारण बताते हुए कहा कि हम सत्य के रास्ते पर चलने वाले हैं इसलिए हमारी पार्टी के एक विधायक से भी ये विपक्षी लोग डर गए हैं.

क्या है विरोधियों की मंशा?

कोलकाता के बाद अमरावती में इसी तरह के विरोधी दलों के नेताओं की एकता दिखाने के पीछे मंशा साफ है. पंचायत चुनाव में बीजेपी को मिली अच्छी सफलता के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ही इस वक्त बीजेपी को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मान रही हैं. हालात भी राज्य में कुछ ऐसे बन गए हैं जिनमें टीएमसी के मुकाबले बीजेपी ही मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में आ गई है. लेफ्ट के जनाधार खत्म होने और कमजोर कांग्रेस का टीएमसी के सामने नतमस्तक होने के बाद अब बंगाल में लड़ाई टीएमसी बनाम बीजेपी की होती जा रही है.

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भले ही बीजेपी के राज्य में एक मात्र विधायक हो लेकिन, ममता बनर्जी को अपने कोर वोटर को साथ रखने के लिए बीजेपी का डर दिखाना जरूरी लग रहा है. ममता को लगता है कि बीजेपी के डर से राज्य के अल्पसंख्यक वोटों का ध्रुवीकरण भी लेफ्ट और कांग्रेस की तरफ जाने के बजाए उनकी तरफ हो जाएगा. हालाकि अभी यह तय नहीं है कि कांग्रेस और टीएमसी मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ेंगे या नहीं लेकिन, कांग्रेस की राज्य इकाई ममता के साथ जाने के पक्ष में नहीं है. लेफ्ट भले ही विपक्षी एकता की बात करे लेकिन, टीएमसी के साथ जाने में दोनों ही दलों को एक-दूसरे से परेशानी हो सकती है.

ममता बनर्जी की तरफ से विपक्षी दलों का जमावड़ा अपने यहां कोलकाता में लगाने का मकसद भी यही है. राज्य में बीजेपी के खिलाफ ममता का बिगुल फूंकने का मकसद भी यही है.

ममता-नायडू की पोजिशनिंग की कोशिश

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इसके अलावा ममता बनर्जी रैली के माध्यम से कांग्रेस समेत सभी विपक्षी कुनबे के सभी नेताओं को भी अपनी ताकत का एहसास कराना चाहती हैं. इस रैली के केंद्र में अपने-आप को रखकर ममता अपने लिए 2019 के चुनाव के बाद के लिए पोजिशनिंग कर रही हैं. उन्हें लगता है कि पश्चिम बंगाल के लोगों में यह संदेश जाए कि चुनाव बाद ममता बनर्जी प्रधानमंत्री पद की दावेदार भी हो सकती हैं, जिससे लोकसभा चुनाव में फिर फायदा मिल सकेगा.

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ममता की रैली की सफलता के बाद अब चंद्रबाबू नायडू भी उसी रास्ते पर जाने की सोंच रहे हैं. उन्हें भी लगता है कि रैली में सभी विरोधी दलों को साथ रखकर अपने यहां होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी कैडर में नई जान फूंकी जा सकती है. ममता बनर्जी की तरह नायडू भी अपने-आप को लोकसभा चुनाव के बाद पोस्ट पोल के लिए तैयार रखने की कोशिश कर रहे हैं, लिहाजा इस तरह की मेगा रैली की तैयारी में हैं.

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