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यूपी-बिहार उपचुनाव : राजस्थान में घाव मिले थे, बीजेपी के लिए अब जीत ही मरहम है

राजस्थान के बाद अब यूपी और बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है. चुनाव आयोग ने यूपी की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट और बिहार की अररिया लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव की तारीख तय कर दी है

Updated On: Feb 09, 2018 07:06 PM IST

Amitesh Amitesh

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यूपी-बिहार उपचुनाव : राजस्थान में घाव मिले थे, बीजेपी के लिए अब जीत ही मरहम है

राजस्थान के बाद अब यूपी और बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है. चुनाव आयोग ने यूपी की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट और बिहार की अररिया लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव की तारीख तय कर दी है. यहां उपचुनाव 11 मार्च को होगा. इसके अलावा बिहार की जहानाबाद और भभुआ विधानसभा के लिए भी उपचुनाव इसी दिन होगा. चुनाव परिणाम 14 मार्च को आएगा.

भले ही बात उपचुनावों की हो रही हो, लेकिन, इन चुनावों को लेकर यूपी और बिहार की सियासत गरमा गई है. सियासी गलियारे में चर्चा इसी बात को लेकर हो रही है कि सत्ताधारी बीजेपी का क्या होगा. खासतौर से राजस्थान में अलवर और अजमेर लोकसभा के उपचुनाव में कांग्रेस के हाथों करारी हार के बाद इन चुनाव में सबकी दिलचस्पी बढ़ गई है.

यूपी में योगी और केशव की प्रतिष्ठा दांव पर

Yogi Adityanath Keshav prasad maurya

दरअसल यूपी में गोरखपुर सीट पर उपचुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और फूलपुर सीट पर उपचुनाव उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के चलते हो रहा है. यही वजह है कि यूपी में लोकसभा की इन दो सीटों पर हो रहे उपचुनाव में बीजेपी की प्रतिष्ठा दांव पर है.

दरअसल गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ 1998 से लगातार सांसद रहे हैं. उन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में लगातार पांचवी बार जीत दर्ज की थी, लेकिन, प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया था. अब वो यूपी विधान परिषद के सदस्य हैं.

दूसरी तरफ फूलपुर सीट से उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पहली बार लोकसभा सांसद बने थे. आजादी के बाद पहली बार इस सीट पर बीजेपी को जीत नसीब हुई थी. अब केशव मौर्य भी यूपी विधान परिषद के सदस्य हैं.

गोरखपुर सीट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए बीजेपी को जीत दिलाना काफी जरूरी हो गया है क्योंकि इस सीट से सीधे उनकी प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है. इस सीट पर हार योगी के काम और उनकी साख पर बट्टा लगाने वाला हो सकता है. हालांकि इस सीट पर अब भी बीजेपी का पलड़ा ही भारी दिख रहा है.

बात अगर फूलपुर की करें तो यहां बीजेपी को कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ सकता है. खासकर अगर विपक्ष कोई साझा उम्मीदवार खड़ा कर दे तो बीजेपी की राहों में मुश्किलें आ सकती हैं.

क्या अखिलेश और मायावती हाथ मिलाकर बीजेपी को सबक सिखाने की कोशिश करेंगे? क्या पूरा विपक्ष बीजेपी के खिलाफ एकजुट होगा? यह एक बड़े सवाल हैं क्योंकि, विधानसभा चुनाव में हार के बाद एसपी-कांग्रेस में स्थानीय निकाय के चुनाव में गठबंधन नहीं हुआ था, जबकि बीएसपी ने अलग चुनाव  लड़कर बेहतर प्रदर्शन किया था.

Akhilesh Mayawati

ऐसे में मायावती का एसपी-कांग्रेस के साथ जाना आसान नहीं लग रहा है. हालांकि सियासी गलियारों में मायावती के फूलपुर से चुनाव लड़ने को लेकर कयास लगाए जाते रहे हैं. वो भी विपक्षी दलों के सहयोग से.

इन दोनों सीटों पर उपचुनाव का परिणाम केंद्र की मोदी सरकार के काम और यूपी के सांसदों के रिपोर्ट कार्ड से भी जोड़कर देखा जाएगा. क्योंकि लोकसभा चुनाव से पहले यूपी की इन दोनों सीटों पर जीत और हार का व्यापक असर होगा.

बिहार में भी मचा है घमासान

बिहार की सियासत में भी लंबे वक्त से घमासान मचा हुआ है. पिछले साल जुलाई में बिहार की सियासत में बड़ा मोड़ आया जब नीतीश कुमार ने लालू का साथ छोड़कर फिर से बीजेपी का हाथ पकड़ लिया. तभी से इसे जनादेश का अपमान बताकर लालू परिवार नीतीश कुमार पर जनता को धोखा देने का आरोप लगाता रहा है. इसके चलते जेडीयू में भी शरद यादव समेत कुछ लोगों ने बगावत कर दी, उन्हें बाहर भी जाना पड़ा था.

अब लालू परिवार और आरजेडी के सामने नीतीश कुमार से टकराने की बड़ी चुनौती होगी. अगर वाकई में जनता नीतीश कुमार के लालू का साथ छोड़ने से नाराज है तो उपचुनाव में यह साफ भी हो जाएगा.

लेकिन, आरजेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि इस वक्त चारा घोटाले के मामले में लालू यादव रांची में जेल में बंद हैं. अगर चुनाव के पहले उन्हें जमानत नहीं मिली तो फिर आरजेडी को लालू के बगैर ही मोर्चा संभालना होगा.

लालू परिवार की अग्निपरीक्षा

ऐसे में लालू के दोनों बेटों तेजस्वी और तेजप्रताप के साथ-साथ राबड़ी देवी के लिए भी यह किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा. क्योंकि अररिया लोकसभा सीट पर सांसद तस्लीमुद्दीन आरजेडी के कोटे से ही सांसद थे, जबकि जहानाबाद में भी मुद्रिका यादव आरजेडी के ही विधायक थे जिनके निधन के कारण यहां उपचुनाव हो रहा है.

दूसरी तरफ, नीतीश कुमार की एनडीए में वापसी के बाद यहां भी आंतरिक समीकरण बिगड़ गया है. एनडीए के घटक दलों के अंदर ही इस वक्त खींचतान चल रही है. लोकसभा चुनाव 2019 के वक्त एनडीए के भीतर तो खलबली की उम्मीद पहले से ही की जा रही थी. लेकिन, उपचुनावों ने खलबली पहले ही मचा दी है.

Nitish oath ceremony

पहले बात अररिया की करें तो यहां लोकसभा सीट पर जेडीयू या बीजेपी का उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरेगा. अररिया सीट पहले भी जेडीयू-बीजेपी गठबंधन में बीजेपी  के ही खाते में रही है. 2009 में यहां से बीजेपी के प्रदीप सिंह लोकसभा सांसद बने थे. हालांकि 2014 में प्रदीप सिंह यह सीट हार गए थे. अब नए समीकरण में अगर यह सीट बीजेपी के खाते में फिर से जाती है तो यहां से बीजेपी प्रदीप सिंह या किसी और को टिकट देगी इस पर मंथन चल रहा है.

दिलचस्प बात है कि दिवंगत आरजेडी सांसद तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज अहमद आरजेडी नहीं बल्कि जेडीयू के टिकट पर चुनाव जीतकर अभी वर्तमान में विधायक हैं. लेकिन, फिलहाल वो पार्टी से निलंबित हैं. अगर जेडीयू को यह सीट मिलती है तो नीतीश कुमार तस्लीमुद्दीन के निधन के बाद सहानुभूति वोट के लिए उनके बेटे को अपना उम्मीदवार बना सकते हैं.

जेडीयू बनाम आरएलएसपी की लड़ाई कौन जीतेगा

बिहार में एनडीए के भीतर असल लड़ाई जेडीयू बनाम आरएलएसपी है. नीतीश कुमार बनाम उपेंद्र कुशवाहा के बीच की खींचतान जगजाहिर है. इसका असर रह-रह कर दिख भी जाता है. लेकिन, अब जहानाबाद विधानसभा सीट पर भी एक बार फिर से यह खींचतान देखने को मिल रही है.

दरअसल, जेडीयू-बीजेपी के पुराने गठबंधन के तहत जहानाबाद विधानसभा सीट जेडीयू के कोटे में थी, जहां 2010 में उसे जीत भी मिली थी. लिहाजा इस सीट पर अभी अपना दावा कर रही है. लेकिन, 2015 में आरजेडी से गठबंधन करने के बाद जेडीयू ने यह सीट आरजेडी के लिए छोड़ दी थी. आरजेडी के मुद्रिका सिंह यादव यहां से चुनाव जीते थे. उनके निधन के बाद फिर से जेडीयू यहां दावा कर रही है.

लेकिन, पिछली बार यह सीट एनडीए में आरएलएसपी कोटे में गई थी. इसी लिहाज से इस सीट पर उपेंद्र कुशवाहा दावा कर रहे हैं.  ऐसे में दोनों के बीच फिर से खींचतान देखने को मिल रही है. उधर, उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी से उनके पुराने साथी और जहानाबाद के सांसद अरुण कुमार भी इस सीट पर अपना दावा कर सकते हैं, क्योंकि पिछली बार जहानाबाद विधानसभा सीट पर उन्हीं के समर्थक को ही आरएलएसपी ने टिकट दिया था. लेकिन मौजूदा वक्त में कुशवाहा और अरुण कुमार की राहें अलग हो चुकी हैं.

नीतीश की प्रतिष्ठा भी दांव पर

ऐसे में एनडीए के भीतर का गणित काफी उलझ कर रह गया है. यहां भी नीतीश कुमार और बीजेपी की प्रतिष्ठा दांव पर है, क्योंकि बिहार में भी नए समीकरण के बाद पहली बार कोई चुनाव हो रहा है. लिहाजा इन उपचुनावों के परिणाम का यूपी और बिहार की राजनीति पर व्यापक असर पड़ने वाला है. ये नतीजे लोकसभा चुनाव के पहले माहौल को किसी के पक्ष में बना या बिगाड़ सकते हैं.

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