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संसद में नोटकांड के 8 साल बाद नोट पर शुरू हुआ संग्राम

संसद में एक बार फिर नोटों पर संग्राम छिड़ने वाला है. बवाल के लिए विपक्ष तैयार है.

Updated On: Nov 20, 2016 03:01 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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संसद में नोटकांड के 8 साल बाद नोट पर शुरू हुआ संग्राम

संसद में एक बार फिर नोटों पर संग्राम छिड़ने वाला है. नोटबंदी को लेकर इस बार बवाल के लिए विपक्ष ने कमर कस ली है. शीतकालीन सत्र में सरकार को घेर कर फैसला वापस लेने के लिए दबाव बनाया जाएगा. लेकिन आठ साल पहले यही विपक्ष यूपीए के ब्रांड के साथ सत्ता में था. तब विपक्ष में एनडीए था.

उस वक्त भी संसद के भीतर नोटों को लेकर घमासान हुआ था. संसद में नोटों से भरे बैग लाए गए. नोटों को उछाला गया. संसद के भीतर नोटकांड से सनसनी मच गई थी. संसद में विश्वासमत जीतने के लिए सांसदों को खरीदने के लिए करोड़ों रुपए की घूस दी गई थी.

सांसदों की खरीद-फरोख्त

22 जुलाई 2008 को केंद्र की यूपीए सरकार को संसद में विश्वासमत हासिल करना था. अमेरिका के साथ परमाणु डील को लेकर वामदलों ने समर्थन वापस ले लिया था.

विश्वासमत में यूपीए गठबंधन को जीत तो हासिल हो गई लेकिन सांसदों की खरीद-फरोख्त के आरोप कांग्रेस को झेलने पड़े. नोटों से भरे बस्ते लेकर कई सांसद लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास इकट्ठा हो गए. बस्तों से नोट निकालकर लहराने लगे.

सांसदों का आरोप था कि उन्हें यूपीए की सरकार बचाने के लिए पक्ष में वोट डालने के लिए करोड़ों रुपए दिए गए. सरकार ने आंकड़ों का खेल तो जीत लिया था लेकिन संसद में नोटकांड से भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ भी हुआ.

राजनीति में पैसे का खेल एक बार फिर सबके सामने था. इससे से पहले जेएमएम(झारखंड मुक्ति मोर्चा) घूस कांड लोकतंत्र पर दाग लगा चुका था.

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एक अप्रत्याशित घटना संसद के इतिहास में काले अध्याय के रूप में दर्ज हुई. संसद की गरिमा को आघात लगा. उन नोटों के बंडलों पर किसी ने भी अपना हक नहीं जताया क्योंकि वो कालाधन था.

कालाधन सांसदों की खरीद-फरोख्त में इस्तेमाल होता आया है. उसी कालेधन को रोकने के लिए नोटबंदी का फैसला लिया गया है. अब उसी नोटबंदी पर संसद में सरकार और विपक्ष आमने-सामने है.

कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्र में सूटबूट की सरकार है जिसे गरीबों के दर्द से कुछ लेना देना नहीं है. अब नोटबंदी के मामले को लेकर समूचा विपक्ष ‘सूटबूट की सरकार’ को संसद और सड़क पर देख लेने की धमकी दे रहा है.

वहीं, मोदी लगतार अपनी रैलियों में जनता को ये समझा रहे हैं कि उनका फैसला गरीबों के हित में किया गया है. गाजीपुर में उन्होंने कहा कि, 'देश में पैसा बहुत है लेकिन गलत जगह पर है. नोटबंदी के फैसले ने देश के अमीरो-गरीबों को बराबर कर दिया है.'

हालांकि अर्थशास्त्री ही उनके इस चुनावी बयान का विश्लेषण कर सकते हैं. लेकिन फैसले की मंशा पर सवाल उठाने की राजनीतिक वजहें कई हैं.

यूपी-पंजाब चुनाव में धन-बल की ताकत से निपटने के लिये नोटबंदी का फैसला संहारक हथियार है. क्योंकि राजनीति में पैसा बड़ा हथियार बना लिया गया है.

सांसदों-विधायकों को खरीदना, दलित वोटरों को खरीदना, चुनाव में सरकारी खजाने का दुरुपयोग करना तो उम्मीदवारों को टिकट बेचना आज की राजनीति का फॉर्मूला है.

लोकतंत्र के 60 साल में 'नोटतंत्र'

लोकतंत्र के साठ साल में पॉलिटिक्स पैसा कमाने की मशीन हो गई और पावरफुल लोगों के लिए वोटर खरीदने का. सत्ता में राजनीतिक घराने तैयार हो गए. घराने के सदस्यों के नाम एक-एक सीट भी तय हो गई.

जनता की सेवा के नाम पर मिली कुर्सी अकूत संपत्ति बढ़ाने के काम आने लगी. पोस्टिंग, ट्रांसफर, टेंडर, टिकट और तमाम योजनाओंं के नाम पर पैसा आने लगा. पांच साल में ही एक सांसद करोड़ों रुपए कमाने वाला कमाऊ हो गया.

काले धन की लगातार आवक बढ़ती चली गई. कालेधन के चलते ही चुनाव प्रचार में पानी की तरह पैसे का इस्तेमाल डंके की चोट पर खुला खेल हो गया.

चुनाव आयोग में बताए गए खर्च और किये गए खर्च के बीच का फर्क बढ़ता ही चला गया. पांच साल में कमाया गया कालाधन चुनाव जीतने में काम आने लगा.

लोकतंत्र पर मायूस होती आस्था राजनीतिक पार्टियों की पैसे की लूट और इस पर चुप्पी को खामोशी से ताक रही है. लेकिन अब कालेधन के खिलाफ एक मुहिम का आगाज हुआ है.

इसकी व्यापकता को सिर्फ कुछ दिनों या महीनों में नहीं समझा जा सकता. जिस धन-बल ने आजादी के बाद से राजनीति को अपना मोहरा बना लिया हो और लोकतंत्र को गुलाम, उस व्यवस्था और चरित्र को बदलने में वक्त तो लगेगा ही.

चुनाव खर्च पर आयोग नहीं कस पाता शिकंजा

एक महीने पहले ही चुनाव आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए सभी राजनीतिक दलों को निर्देश दिया है कि वो चुनाव प्रचार के लिए सरकारी पैसे या तंत्र का इस्तेमाल न करें वर्ना उनकी मान्यता रद्द हो सकती है.

आयोग ने साफ कहा कि वो राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार में सरकारी पैसे या तंत्र के इस्तेमाल के बिलकुल खिलाफ है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2014 के लोकसभा चुनाव में 30 हजार करोड़ रुपए खर्च हुए थे. जबकि केंद्र और चुनाव आयोग ने महज सात से आठ हजार करोड़ रुपए खर्च किए थे.

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इससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि चुनाव में 22 से 23 हजार करोड़ रुपए का कालाधन लगा.

दिलचस्प बात ये है कि आजतक सभी पार्टियां भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ आवाज उठाती रही हैं लेकिन नोटबंदी के फैसले पर वो आम आदमी की दुहाई दे रही हैं.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह कहते हैं कि नोटबंदी के फैसले से कुछ पार्टियां गरीब हो गई हैं.

अमीरों का क्या फायदा?

संसद के शीतकालीन सत्र में नोटबंदी पर महासंग्राम होना तय है. लेकिन अब तक कई गतिरोध और विरोध देख चुके पीएम मोदी ने कैबिनेट को भरोसा दिलाया है कि नोटबंदी के फैसले पर देश की जनता सरकार के साथ है. ऐसे में विपक्ष के दबाव में झुकने का सवाल ही नहीं होता है.

विपक्ष नोटबंदी के फैसले को गरीबों के खिलाफ बता रहा है जबकि गरीब लोग ये जरूर जानना चाहेंगे कि नोटबंदी से अमीरों का क्या फायदा हो सकता है?

क्‍योंकि सियासत तो इसी पर बवाल काट रही है.

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