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'ओमकारा' को याद करें आडवाणी और राहुल गांधी

लंगड़ा त्यागी और रज्जू की कहानी बन गए हैं आडवाणी और राहुल गांधी

Updated On: Dec 17, 2016 09:02 AM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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'ओमकारा' को याद करें आडवाणी और राहुल गांधी

लालकृष्ण आडवाणी खुद बताते हैं कि वे हिंंदुस्‍तानी सिनेमा के बड़े फैन हैं. वह चाहें तो राहुल गांधी को फिल्म ओमकारा के एक सीन को याद करा सकते हैं.

फिल्म में लंगड़ा त्यागी बने सैफ़ अली ख़ान रज्जू नाम के दूल्हे की बारात रोक लेते हैं. रज्जू का रोल दीपक डोबरियाल ने निभाया है.

सो दूल्हे मियांं बाद में दोबारा मुलाकात पर दुखी हो कर पुल से कूदने की धमकी देते हैं. रज्जू बार-बार कूदने की धमकी तो देता है पर कूदता नहीं.

इस पर लंगड़ा त्यागी रज्जू को जिस तरह की गालियां देता है वो पहलाज निहलानी के जमाने में तो भारी असंसदीय होतीं. लेकिन इसे प्रेम से पगे साफ-सुथरे अंदाज में कहें तो त्यागी रज्जू से कहता है, ‘तुम कूदते क्यों नहीं, तुम्हें रोक कौन रहा है?’

ऐसा ही हाल आडवाणी जी का है. ठीक यही काम राहुल गांधी भी कर रहे हैं.

भरपूर मनोरंजन 

RAHULGANDHIPARLIAMENT

पिछले कुछ दिनों से भारत के लोगों का दो तरह से भरपूर मनोरंजन हो रहा है.

पहला लालकृष्ण आडवाणी के इस्तीफा देने की धमकी से. दूसरा, उस धमकी से जो राहुल गांधी बार-बार यह कहते हुए देते हैं कि वह मोदी का भंडा फोड़ कर देंगे. उनके गुब्बारे की हवा निकाल देंगे.

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यकीनन इन दोनों के अंदर थोड़ा-थोड़ा सा रज्जू बसता है.

उम्र का अंतर, अलग-अलग राजनीतिक बैकग्राउंड और विचारधारा होने के बावजूद आडवाणी और राहुल दोनों का दर्द एक सा है. दोनों के दोनों बस दूल्हे ही बने रह गए.

ओमकारा के रज्जू की तरह दोनों मानते हैं कि उन्हें जो चाहिए था, मसलन  प्रधानमंत्री की कुर्सी, वो लंगड़ा त्यागी जैसों के कारण ही नहीं मिल पाई.

सपनों के टूटने का गम भुलाने के लिए दो ही रास्ते हैं. या तो आप हताशा से बाहर निकलें और  इसे अपनी किस्मत मानकर बिना किसी दुर्भावना के आगे बढ़ें. या फिर नई शुरुआत करें और अपने भाग्य को अपने हाथ से बदलने की कोशिश करें.

लेकिन लगता है, आडवाणी इनमें से कुछ भी नहीं कर रहे हैं. वो न तो इसे अपना किस्मत मान पर रहे हैं. ना ही वो अपना दुख दूर करने के लिए कुछ ठोस कर रहे हैं.

समय-समय पर, वो बीजेपी के इतिहास से बाहर आकर सार्वजनिक आलोचना करते हैं. या फिर इस्तीफे की धमकी देकर, जिसका वो कभी पालन नहीं करते अपनी मौजूदगी का एहसास कराते हैं. आखिर में कुछ बातों के तीर चलाने के बाद अपनी कही बातों को वापस ले लेते हैं.

सोचिए, इस उम्र में पहले कुछ कहना फिर अपनी बातों को वापस लेना उनकी सेहत पर क्या असर डालता होगा.

आडवाणी को हुआ क्या है? 

Advani

यह समझ पाना मुश्किल है कि आडवाणी जी को क्या हो गया है. वो आडवाणी जो बीजेपी के असली ‘लौह पुरुष’, हिंदुत्व के पोस्टर बॉय, राम राज्य झंडा बरदार, प्रधानमंत्री के मुख्य रक्षक और उनके स्वघोषित गुरु हैं. उनका ये अचानक बदलाव गुजरे जमाने के शेक्सपियर की रचना ‘हेमलेट’ के किरदार जैसा है.

1984 में बीजेपी को 2 सीटों से अगले चुनाव में 88 सीटों तक पहुंचाने वाले आडवाणी, अपनी मौजूदगी के सवाल को सुलझाने का क्यों नहीं साहस दिखाते.

उन्हें किस बात का डर है? राजनीति में आप्रसंगिक हो जाने का?  आडवाणी शायद नहीं जानते कि, ऐसा हो चुका है. या, फिर कोई सपना बाकी है! जैसे राष्ट्रपति भवन में पहुंच कर आराम करने का.

ऐसा क्या है जो आडवाणी को ऊंची आवाज में शोर मचाने फिर खिलौना पाकर किसी बच्चे की तरह मान जाने जैसा है.

ईमानदारी से कहें तो, आडवाणी अगर वाकई में राजनीति की दिशा पर चिंतित होते. या फिर वो वाकई इस बात से परेशान होते कि आज अटल बिहारी वाजपेयी को सत्ता पक्ष को देख कर क्या लगता. या उन्हें बीजेपी के अंदरूनी लोकतंत्र का दर्द होता तो अब तक वो अपना इस्तीफा दे चुके होते.

आडवाणी जैन हवाला केस में अपना नाम आने पर एक बार इस्तीफा दे भी चुके हैं.  वो इस्तीफा देते फिर चाहे जो होता. लोग याद रखते कि वो एक योद्धा की तरह लड़े भले चाहे वो खेत रहे.

लेकिन उनकी हरकतों से किसी अड़ियल बाराती की याद आती है जो अपनी हरकतों से सबका ध्यान खींचना चाहता है. कभी वो लौह पुरुष होते थे आज वो नाजुक मिजाज बच्चे से लगते हैं.

राजनीतिक बयानबाजी से विस्फोट कर आडवाणी अपनी विरासत के साथ वैसा ही कर रहे हैं. जैसा कभी उनके कार सेवकों ने अयोध्या के विवादित ढांचा को गिराकर किया था.

राहुल गांधी कहीं आडवाणी ना बन जाएं

इससे अवश्य ही, राहुल गांधी के लिए सीख लेने वाली बात है. राहुल, खुद भी इस मोड में रहते है कि 'मैं तुम्हें बर्बाद कर दूंगा लेकिन तुम मुझे ऐसा करने नहीं दे रहे.'

खाली बातें जुमले और नारे. जैसे आडवाणी कहते थे 'मंदिर वहीं बनाएंगे'. इस तरह के जुमलों से केवल कुछ समय के लिए भोली-भाली जनता को बरगलाया जा सकता है. जब लोग चेहरे के पीछे की असलियत को देख लेते हैं तो ये उनके भरोसे को बड़ी ठेस पहुंचती है.

राहुल गांधी खुशनसीब हैं कि उनकी नाकामियों और रणछोड़ इतिहास के बावजूद भारत की राजनीति उन्हें बार-बार अपने आप को सुधारने का मौका दे रही है.

नोटबंदी को लेकर जनता के गुस्से ने राहुल को उनके लिए बोलने का मौका दिया है. साथ ही विपक्ष की आवाज बनने का भी मौका दिया है.

बीजेपी के मार्गदर्शक की आधी उम्र के राहुल अगर भारतीय राजनीति के आडवाणी नहीं बनना चाहते. तो उन्हें अपनी दी धमकियों और दावों पर बने रहना चाहिए.

पिछले कुछ दिनों के दौरान, राहुल ने सियासी भूकंप लाने का दावा किया. साथ ही प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार को जाहिर करने की धमकी दी.

मंच सज चुका है, देश इंतजार कर रहा है, पूरा मीडिया मौजूद है. जैसा कि, लंगड़ा त्यागी कहता है: अगर तुममें हिम्मत है, ओमकारा से लड़ने का साहस है, तो आगे बढ़ो. कोई तुम्हें नहीं रोक सकता.

या फिर मायूसी से इंतजार करने वाले आडवाणी बन जाओ.

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