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कश्मीर की लूट है, लूट सके तो लूट

अब्दुल्ला को अंदाजा नहीं था कि उनकी अपील हुर्रियत नेताओं पर असर नहीं छोड़ेगी?

Updated On: Dec 08, 2016 02:17 PM IST

Nazim Naqvi

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कश्मीर की लूट है, लूट सके तो लूट

अभी बीते पांच दिसंबर को काले ओवरकोट पर लाल मफलर डाले फ़ारुख अब्दुल्ला नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकर्ताओं के बीच अपने पिता शेख़ अब्दुल्ला की 111वीं सालगिरह पर बोल रहे थे.

हजरतबल में हुए इस कार्यक्रम में बोलते हुए उनकी निगाहें जरूर अपने कार्यकर्ताओं पर थीं मगर निशाना भारत विरोधी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस पर था.

quote]हमारी पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के खिलाफ नहीं है, हम भी कश्मीरियों के मौलिक अधिकारों का समर्थन करते हैं लेकिन इसे पाने के लिए गलत रास्तों पर नहीं चल सकते. अलग राह मत अपनाओ, एक हो जाओ, हम भी तुम्हारे साथ खड़े हैं.'

फ़ारुख अब्दुल्ला कश्मीर की सियासत को जानते ही नहीं बल्कि जीते हैं. ऐसे में  'एक हो जाओ' का नारा देते हुए क्या उन्हें ये अंदाजा नहीं था कि उनकी ये अपील हुर्रियत के नेताओं पर कोई खास असर नहीं छोड़ेगी?

सवाल ये है कि फिर क्यों भूतपूर्व मुख्यमंत्री एक ऐसी मांग कर रहे हैं जिसका कोई असर नहीं होने वाला?

फारूख अबदुल्ला

फ़ारुख अबदुल्ला

हुर्रियत  कैसे आई ?

हुर्रियत कांफ्रेंस की जड़ों  को समझना हो तो कश्मीर में क्या कैसे घटा ये याद करना होगा. साल 1988-89 के बीच कश्मीर की आजादी को लेकर जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट या जेकेएलएफ ने कश्मीर की बर्फीली वादियों में गर्माहट पैदा की, जो जल्दी ही आग बनकर चिनार को झुलसाने लगी.

इस आग की तपिश से भारत झुलसा और  पड़ोसी पकिस्तान ने भी हाथ तापने शुरू किए. इसे दुनिया ने भी महसूस किया.

हुआ ये कि पहले जेकेएलएफ के नौजवानों ने कश्मीर की आजादी के लिए भारतीय सुरक्षा सेना से लड़ना शुरू किया. शुरू में सेना को इन लड़ाकों को पहचानने में दिक्कत पेश आई.  फिर अचानक एक के बाद एक जेकेएलएफ के लड़ाके मारे जाने लगे.

ये बहुत बाद में पता लगा कि जेकेएलएफ के लोगों को मरवाने में जो लोग मुखबिरी कर रहे थे वो भी पाकिस्तान समर्थक थे लेकिन वो दूसरे ज्यादा उग्र पाकिस्तानी लड़ाकों के लिए जगह बनाना चाहते थे.

बहरहाल लिबरेशन फ्रंट के लोग सुरक्षा बलों की गोलियों का निशाना बनने लगे. सेना की निर्ममता की खबरें सुर्खियां बनने लगीं. सेना के खिलाफ मानवाधिकार संगठनों की बयानबाजियां मुखर हो गईं.

ये पूरा किस्सा मुझे पता लगा जब मैं और मेरे एक दोस्त पत्रकार जो की कश्मीर के थे, उन्हें कानपुर में जेकेएलएफ का कश्मीर से भागा हुआ एक लड़ाका मिला. ये मुलाकात महज एक इत्तेफाक थी. पर जो हुआ उसकी पुष्टी बाद में कई अन्य सरकारी और गैर सरकारी सूत्रों ने बाद में की. जाहिर है भारतीय सेना के लोग जो इन्हें मारकर वाहवाही लूट रहे थे, उन्हें क्यों इससे गुरेज होना था.

 

जेकेएलएफ के फाउंडर अमानुल्लाह खान. (Photo. wikicommons)

जेकेएलएफ के फाउंडर अमानुल्लाह ख़ान.

इसके बाद नंबर आया कश्मीरी पंडितों का 

कश्मीरी पंडितों का पलायन एक बड़ी घटना थी, जो उस समय इन सुर्खियों में दबकर रह गई. वैसे भी डोगरा हुकूमत (1846-1947) के समय कश्मीरी पंडितों की जनसंख्या लगभग 20% थी, जो 1990 के दशक में मात्र 5% रह गयी थी.

जेकेएलएफ दरअसल एक  तरह से वो पैदल सेना थी जो राजाओं के जमाने में युद्धों केवल युद्ध आरंभ करने का काम दिया जाता था.

किस्सा-मुख्तसर ये कि जेकेएलएफ जिसकी ताकत को खत्म किया गया और दूसरी ओर उसे आतंकी संगठन घोषित करके हाशिये पर डाल दिया गया.

Photo. wikicommons

कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बल  जो एक बार दाखिल हुए  तो उन्हें  वहां से निकलने का मौका ही नहीं मिला.

ऐसे पैदा हुई ‘ऑल पार्टीज़ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस’

इससे पहले की जेकेएलएफ के झंडे तले जमा हुई कश्मीरी जनता अपने घरों को लौटती इस्लामी-अतिवादियों के गिरोहों ने उनका स्थान ले लिया. इन्हें पकिस्तान की आईएसआई का समर्थन हासिल था.

इसी स्थिति के गर्भ से हुर्रियत का जन्म होता है, जिसने अलगाववाद के लिए लड़ रहे अलग-अलग संगठनों को एक परचम तले इकठ्ठा किया. नाम दिया ‘ऑल पार्टीज़ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस’.

हुर्रियत का बुनियादी स्वर ये है कि ‘कश्मीर, भारत-पाक विभाजन का अधूरा एजेंडा है जिसे जम्मू-कश्मीर की अवाम की आकांक्षाओं के अनुसार हल किया जाना चाहिए’.

ये वो समय रहा जब फारूख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री बने एक दशक से ज्यादा हो चुका था. इस एक दशक में 'शेरे-कश्मीर’ फ़ारुख अब्दुल्ला के इस बेटे ने गोल्फ खेलने में महारत हासिल कर ली. कहते हैं कि इस समय में उन्होंने सरकार चलाने पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

इस बीच खुशवंत सिंह की कहानियों ने भी उनकी कई खूबियों को उजागर किया है. सिंह अब्दुल्ला के बारे में बोले, 'वो जब वादी-ए-कश्मीर से बिलकुल सुर्ख और ताजे सेब की तरह दिल्ली आते हैं तो उनपर लुट जाने वाले हसीन चेहरों का उन्माद उन्हें कश्मीर की समस्याओं पर सोचने का मौका ही नहीं देता है.

Photo. wikicommons

फ़ारुख अब्दुल्लाह  जब  मुख्यमंत्री थे

जेकेएलएफ हो या अतिवादी इस्लाम की जड़ें मजबूत करता हुआ ‘हुर्रियत-संगठन’, इन्हें गंवार और पिछड़ी सोच का पर्याय माना जाता है. भारत सरकार जितनी जल्दी हो सके, इसका दमन कर देना चाहती है. 89 से 93 यानी पांच वर्षों में लापरवाहियों की खाद से ताकत हासिल करता ये छोटा सा पौधा आज 25 वर्षों में एक ऐसा दरख्त बन चुका है, जिसे उखाड़ पाना लगभग 80 बरस के फ़ारूख अब्दुल्ला के लिए मुश्किल ही नहीं शायद नामुमकिन भी है.

आइये अपने मूल-प्रश्न की ओर लौटते हैं. फ़ारूख अब्दुल्ला ये नारा, 'हुर्रियत वालों! हम तुम्हारे साथ हैं, एक हो जाओ, आगे बढ़ो, हमें अपना दुश्मन मत समझो' क्यों दे रहे हैं? वर्तमान मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने, जो पिछले दिनों में वादी में फैली हिंसक वारदातों का कोई तर्कसंगत जवाब ढूंढ रही थीं, तुरंत पलटवार किया 'फ़ारूख अब्दुल्ला के बयान से साबित हो गया कि जम्मू-कश्मीर सरकार का प्रमुख विरोधी दल, पृथकतावादी हुर्रियत संगठन से अलग नहीं है और ये बात भी साबित होती है कि पिछले महीनों की हिंसक वारदातों को उसका मौन समर्थन हासिल था. महबूबा यहीं नहीं रुकी. उन्होंने कहा 'ये वही फ़ारूख अब्दुल्ला हैं, जो कहा करते थे कि हुर्रियत नेताओं को झेलम में फेंक देना चाहिए.'

Photo. wikicommons

मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी महबूबा मुफ़्ती भाजपा  के साथ  श्रीनगर में सरकार चला  रहीं हैं.

दरअसल केंद्र की सियासत में एक शिफ्ट आया है. मुफ़्ती मुहम्मद सईद के निधन के बाद केंद्र समर्थित पीडीपी सरकार लड़खड़ाने के बावजूद संभलती नजर आ रही है. इससे वादी के सभी 'अभिनेताओं' को बेचैन कर दिया है.

कोई चाहता भी है कश्मीर में समाधान 

कश्मीर का समाधान कोई नहीं चाहता. अपने-अपने हिस्से के कश्मीर पर सबकी नजर है.

भारतीय राजनीति गलत या सही जिन भी तेवरों के साथ आगे बढ़ रही है, उसमें छोटी-छोटी भूमिकाओं के सहारे कहानी में बने रहने की कोशिश भर कर रहे हैं.

बात ये है कि अगर ये बदलाव अगर शिकारा खींचते लोगों के हक में हुआ तो पथराव करने तक को रोजगार की तरह देखने पर मजबूर कश्मीरी, अपने लीडरों से दो-टूक सवाल करेगी.

और उसे सही जवाब कौन देना चाहता है.

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