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MP में AAP जोर तो लगा रही है लेकिन कांग्रेस के हाथों में अब भी है 'एंटी-इनकंबैंसी फैक्टर'

आम आदमी पार्टी को एंटी-इनकंबेंसी के खेल का चैंपियन माना जाता है. लिहाज़ा वह मध्य प्रदेश की गद्दी पर नज़रें टिकाए बैठी है, ताकि मौजूदा बीजेपी सरकार के खिलाफ जनता की नाराज़गी का फायदा उठा सके

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada Updated On: May 03, 2018 12:16 PM IST

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MP में AAP जोर तो लगा रही है लेकिन कांग्रेस के हाथों में अब भी है 'एंटी-इनकंबैंसी फैक्टर'

राजनीति अगर बच्चों का खेल होती तो, किसी चीज का इरादा करना महज़ लट्टू घुमाने जितना सरल होता और धैर्य रखना गुड्डे-गुड़ियों की शादी के मानिंद आसान. लेकिन राजनीति बच्चों का खेल नहीं है. किसी शख्स या संस्था का अतिउत्साही रवैया और क्रांतिकारी दखल किसी दूसरे के बनाए रेत के महल को पल भर में ढहा सकता है. हालांकि किसी चीज़ की नई शुरुआत या नए निर्माण के लिए बुलंद हौसले, जुनून और जज़्बे की भी उतनी ही शिद्दत से दरकार होती है.

AAP और आईआईटीयन की तुकबंदी

लिहाज़ा आम आदमी पार्टी (AAP) भी इसी फलसफे की तर्ज़ पर प्रयास कर रही है. AAP ने पिछले हफ्ते घोषणा की है कि पार्टी बीजेपी शासित मध्य प्रदेश में अपने पूरे सामर्थ्य के साथ विधानसभा चुनाव लड़ेंगी. इसके लिए AAP ने एक लंबी-चौड़ी और महत्वाकांक्षी योजना बनाई है. मध्य प्रदेश में इसी साल नवंबर-दिसंबर में चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल वहां नवंबर में चुनाव अभियान की शुरुआत करेंगे. मध्य प्रदेश में AAP का नेतृत्व फिलहाल आलोक अग्रवाल के हाथ में है. आलोक ही मध्य प्रदेश के शहरों, कस्बों और गांवों तक पार्टी के विचारों की अलख जगा रहे हैं. फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत के दौरान आलोक अग्रवाल ने बीते छह महीनों के दौरान मध्य प्रदेश में AAP की गतिविधियों और रणनीति के बारे में विस्तार से बताया.

आलोक अग्रवाल देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी-कानपुर के छात्र रह चुके हैं. लिहाज़ा आम आदमी पार्टी आलोक को चेहरा बनाकर आईआईटी के पूर्व छात्रों को आकर्षित करने की मुहिम में जुटी है. इसके लिए बाकायदा 'आईआईटियन फॉर आलोक' नाम के एक ग्रुप का गठन किया गया है. दरअसल आलोक आईआईटी के पूर्व छात्रों से देश में बदलाव ला सकने वाली नीतियों पर सुझाव मांगते हैं. इसके अलावा आलोक आईआईटियन और अन्य सुशिक्षित युवाओं को सक्रिय राजनीति में आने के लिए प्रेरित भी करते हैं.

AAP ने अपने अभियान के लिए 'बदलेंगे मध्य प्रदेश' का नारा बुलंद किया है. यह पूरा अभियान ऑनलाइन है. आईआईटियन सर्कल में इसकी बैठकें भोपाल, दिल्ली और मुंबई में आयोजित होती हैं. लेकिन AAP की यह पूरी कवायद तब सार्थक नज़र आएंगी जब कोई आईआईटियन आगे बढ़कर चुनाव में हिस्सा लेगा. केजरीवाल एंड टीम की ये गंभीर कोशिशें तभी रंग लाएंगी जब कोई आईआईटियन मध्य प्रदेश के किसी दूरदराज इलाके में सिस्टम के साथ मिलकर काम करेगा. लेकिन सवाल उठता है कि एक टेक्नोक्रेट (तकनीकी विशेषज्ञ) उन लोगों को कितना प्रभावित कर सकता है, जो अपने विचारों और योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए अलग-अलग पदों पर आसीन होते हैं? लेकिन AAP को अपने अभियान और विचारों पर पूरा भरोसा है. लिहाज़ा पार्टी ने आईआईटियंस से मध्य प्रदेश सरकार के 1.80 लाख करोड़ रुपये के बजट के समुचित उपयोग के लिए सुझाव मांगे हैं. ताकि चुनाव के दौरान प्रदेश की जनता के सामने बेहतर योजनाओं और सुविधाओं की पेशकश रखी जा सके.

अग्रवाल ने खुलासा किया कि मध्य प्रदेश में AAP का अच्छा-खासा कैडर तैयार हो चुका है. अहम बात यह है कि AAP के कैडर में वे लोग जो कि राजनीति में नए हैं, और वे लोग जो पहले बीजेपी-कांग्रेस से जुड़े रह चुके हैं, उनका अनुपात 90:10 है. यानी AAP के ज्यादातर कार्यकर्ता राजनीति में नए-नए आए लोग हैं. ऐसे में अगर AAP मध्य प्रदेश में जीत दर्ज करती है और सरकार बनाने में कामयाब हो जाती है, तो उसके ज्यादातर नेता अनुभवहीन होंगे. तब वे किसी अनुभवी नेता की तरह व्यक्तिगत नफा-नुकसान के बजाए सिर्फ जनता और प्रदेश की भलाई के बारे में ही सोचेंगे.

आलोक अग्रवाल के मुताबिक, 'मध्य प्रदेश की हालत खराब है. बिजली के दाम बढ़ते ही जा रहे हैं. प्रदेश की करीब एक तिहाई आबादी पानी के गंभीर संकट से जूझ रही है. लेकिन फिर भी लोग बीजेपी के विकल्प के तौर पर कांग्रेस पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं.'

प्रदेश में शुरू होगा जनसंवाद

सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता बनने से पहले आलोक अग्रवाल एक इंजीनियर हुआ करते थे. उन्होंने नर्मदा बचाओ आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आलोक उस टीम के सदस्य रहे हैं जिसने मान बांध परियोजना के चलते विस्थापित हुए परिवारों के लिए 10 करोड़ रुपये मुआवजा दिलवाने में कामयाबी हासिल की. आलोक ने बताया कि मध्य प्रदेश के लिए AAP अपनी योजना का ब्लूप्रिंट तैयार कर रही है. पूरी योजना बन जाने के बाद प्रदेश में जनसंवाद अभियान शुरू किया जाएगा. इस जनसंवाद में हर क्षेत्र के विशेषज्ञों को आमंत्रित किया जाएगा और उनसे AAP के ब्लूप्रिंट की समीक्षा कराई जाएगी. अच्छे सुझाव मिलने पर उन्हें ब्लूप्रिंट में शामिल किया जाएगा. यानी विशेषज्ञों को ब्लूप्रिंट में बदलाव का मौका दिया जाएगा.

दुष्यंत दांगी मध्य प्रदेश में आम आदमी पार्टी के प्रदेश सचिव हैं. उन्होंने साल 2011 में इंडिया अगेंस्ट करप्शन मूवमेंट में हिस्सा लिया था और साल 2013 में वह AAP के साथ जुड़ गए थे. दुष्यंत दांगी का कहना है कि मध्य प्रदेश में AAP के 35,000 स्वयंसेवक हैं और अगले दो महीनों में यह आंकड़ा दोगुना होने की उम्मीद है.

वहीं आलोक अग्रवाल का कहना है कि AAP प्रदेश के 30 फीसदी बूथों को कवर कर चुकी है. उनका दावा है कि मई के अंत तक पार्टी मध्य प्रदेश के सभी 230 निर्वाचन क्षेत्रों के बूथों तक अपनी पहुंच बना लेगी. प्रत्येक जिले में AAP का विधानसभा प्रभारी सोशल मीडिया, आदिवासी मुद्दों, दलितों-किसानों के मुद्दों पर विशेषज्ञों की एक टीम का नेतृत्व करेगा. AAP का यह अभियान विकेन्द्रीकृत और विविध होगा. पार्टी ने 'पोहा चौपाल' की भी योजना बनाई है. जिसके तहत इस इलाके के पसंदीदा नाश्ते पोहा के साथ स्थानीय लोगों को नीतियों और योजनाओं पर चर्चा के लिए बुलाया जा रहा है. AAP ने अपनी पहली पोहा चौपाल 13 अप्रैल को मंदसौर जिले में आयोजित की थी. बता दें कि मंदसौर वही जगह है जहां पिछली साल विरोध-प्रदर्शन के दौरान पांच किसान मारे गए थे.

इन तीन मुद्दों पर चुनाव प्रचार रहेगा केंद्रित

दुष्यंत दांगी ने बताया कि मध्य प्रदेश में AAP का अभियान तीन मुद्दों पर केंद्रित होगा. यह मुद्दे हैं बिजली विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार, कृषि संकट और बेरोजगारी. AAP नेताओं ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि मौजूदा वक्त में मध्य प्रदेश को 17,500 मेगावाट बिजली उपलब्ध है. जबकि प्रदेश में बिजली की अधिकतम मांग 11,000 मेगावाट है. लेकिन फिर भी प्रदेश में न सिर्फ बिजली संकट है बल्कि बिजली के दाम भी आए दिन बढ़ा दिए जाते हैं. AAP नेताओं ने बिजली विभाग के आंकड़े दिखाते हुए खुलासा किया कि वर्ष 2016-17 के दौरान बीना पावर सप्लाई लिमिटेड ने 14.2 करोड़ यूनिट बिजली के लिए 11 महीनों में 478.26 करोड़ रुपये का भुगतान किया. जिसके हिसाब से प्रति यूनिट बिजली की औसत दर 33.68 रुपये होती है. इसी तरह झाबुआ पावर लिमिटेड से 2.54 करोड़ यूनिट बिजली खरीदी गई, जिसके एवज में 214.20 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था. यहां प्रति यूनिट बिजली की कीमत 84.33 रुपये थी.

आम आदमी पार्टी का आरोप है कि शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने 1,575 मेगावाट बिजली के लिए छह निजी कंपनियों के साथ समझौते किए हैं. अलग-अलग निजी कंपनियों से अलग-अलग दामों पर बिजली खरीदकर पैसों का जमकर गोलमाल हो रहा है. अपने आरोपों को मज़बूती देने के लिए AAP की टीम सरकारी आंकड़ों और दस्तावेज़ों को पेश कर रही है. वर्ष 2016-17 के दौरान बीना पावर सप्लाई लिमिटेड ने 14.2 करोड़ यूनिट बिजली के लिए 11 महीनों में 478.26 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया. यानी प्रति यूनिट बिजली के औसत दाम 33.68 रुपये थे. लेकिन झाबुआ पावर लिमिटेड से 2.54 करोड़ यूनिट बिजली के लिए 214.20 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया. यहां प्रति यूनिट बिजली की कीमत 84.33 रुपये थी. यानी दोनों कंपनियों के दामों में भारी अंतर था. इनके अलावा मध्य प्रदेश पावर लिमिटेड और जयप्रकाश पावर वेंचर्स लिमिटेड कंपनी से भी अलग-अलग दरों पर बिजली खरीदी गई. इन आंकड़ों के आधार पर AAP का कहना है कि आखिर शिवराज सरकार अलग-अलग निजी कंपनियों से बिजली खरीद ही क्यों रही है?

AAP ने मध्य प्रदेश में दूसरा अहम मुद्दा कृषि को बनाया है. AAP ने भावांतर भुगतान योजना को कृषि उपज मंडी अधिनियम 1972 की धारा 36 (सी) के तहत अवैध माना है. दरअसल भावांतर भुगतान योजना को शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने अक्टूबर 2017 में शुरू किया था. इस कृषि योजना के तहत किसानों को उनकी फसल के बाजार मूल्य और न्यूनतम समर्थन मूल्य के अंतर का भुगतान किया जाता है. अधिनियम में कहा गया है: 'बिक्री के लिए बाजार या मंडी में लाई गई अधिसूचित कृषि उपज की कीमत निविदा द्वारा या खुली नीलामी प्रणाली के ज़रिए तय की जाएगी. किसी भी हालत में बाज़ार के सहमत मूल्य में से कोई कटौती नहीं की जाएगी (बाजार में इस तरह की अधिसूचित कृषि उपज की कीमत राज्य सरकार द्वारा समर्थन मूल्य के तौर पर घोषित की जाती है, लिहाज़ा इसे घोषित मूल्य से नीचे नहीं रखा जाएगा और बाजार में निर्धारित दर से नीचे किसी को भी बोली लगाने की अनुमति नहीं दी जाएगी).'

AAP ने इस मामले में फ़र्स्टपोस्ट के साथ एक ईमेल साझा किया है. जिसमें साफ निर्दिष्ट किया गया है कि, भावांतर भुगतान योजना किसानों को हर तरह की उपज की गारंटी नहीं देती है. यह योजना इस बात की गारंटी नहीं देती है कि सभी तरह की उपज और किसी उपज की एक निश्चित मात्रा कुल उपज का 30 फीसदी से कम होने की स्थिति के मुताबिक खरीदी जाएगी. यानी बाकी 70 फीसदी उपज पर जमाखोर कब्ज़ा जमा लेंगे. इस मामले में जब विकल्प पूछा गया तो AAP ने दो उपाय सुझाए. इनमें एक तो किसानों के कर्ज़ को माफ करना है और दूसरा उपाय स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट को लागू करना है. बता दें कि स्वामीनाथन समिति ने अपनी रिपोर्ट में उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य उत्पादन की लागत का डेढ़ गुना करने का सुझाव दे रखा है.

किसान न्याय यात्रा और पोहा चौपाल

पिछले हफ्ते AAP ने मध्य प्रदेश में किसान न्याय यात्रा शुरू की है, जिसमें किसानों के लिए 24 घंटे बिजली आपूर्ति की मांग बुलंद की गई है. इसके अलावा पिछले साल 6 जून को मंदसौर में किसानों पर गोलीबारी में शामिल पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हत्या का केस दर्ज करने की भी मांग की जा रही है. मंदसौर में हुई इस गोलीबारी में पांच प्रदर्शनकारी किसान मारे गए थे. संयोग से, कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने सितंबर 2017 में राजस्थान के बारन से झालावाड़ तक किसान न्याय यात्रा की थी. इस दौरान सचिन पायलट ने 30 मील की पदयात्रा की और रास्ते में आम लोगों के साथ बातचीत भी की थी. ऐसा करके सचिन पायलट ने किसानों की मुख्य समस्याओं और लोगों के अहम मुद्दों को समझने की कोशिश की थी. जिसका फायदा उन्हें दो लोकसभा सीटों और एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में मिला था. जहां कांग्रेस उम्मीदवारों ने बीजेपी उम्मीदवारों को शिकस्त देकर शानदार जीत दर्ज की थी.

मध्य प्रदेश में AAP का तीसरा सबसे अहम मुद्दा बेरोजगारी है. राज्य आर्थिक सर्वेक्षण 2017 के मुताबिक मध्य प्रदेश में 14.11 लाख लोग बेरोजगारों थे. इन बेरोजगार लोगों में से 12.98 लाख शिक्षित थे. दुष्यंत दांगी ने बताया कि, 'शिक्षित बेरोजगार युवाओं की आजीविका के लिए हम एक बेरोजगारी भत्ता योजना की पेशकश करेंगे. क्योंकि लोगों को रोजगार की गारंटी देना राज्य सरकार का काम होता है.'

AAP ने तो कह दिया कि उसकी सरकार बनने पर वह शिक्षित बेरोजगार युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देगी. लेकिन सवाल उठता है कि, क्या इतने बड़े पैमाने पर किसी कल्याणकारी योजना को वित्त पोषित करने के लिए राज्य में पर्याप्त राजकोषीय संसाधन मौजूद हैं?

वहीं कांग्रेस की एंटी-इनकंबेंसी पर भी खतरा

आम आदमी पार्टी को एंटी-इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) के खेल का चैंपियन माना जाता है. लिहाज़ा वह मध्य प्रदेश की गद्दी पर नज़रें टिकाए बैठी है, ताकि मौजूदा बीजेपी सरकार के खिलाफ जनता की नाराज़गी का फायदा उठा सके. ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र AAP की सरगर्मियां दिन-ब-दिन तेज़ होती जा रही हैं. लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति में धमाकेदार दस्तक देने से पहले अभी AAP को अपनी क्षमता और योग्यता को दिखाना होगा. AAP को यह साबित करना होगा कि मध्य प्रदेश में सरकार बनाने और चलाने के लिए उसके पास पर्याप्त अनुभवी और योग्य नेतृत्व मौजूद है. AAP को बाकायदा अपनी टीम की बैंच स्ट्रैंथ को साबित करना होगा. अगर ऐसा न हुआ तो नतीजे में पार्टी का आदर्शवाद और ऊर्जा रिटायर्ड हर्ट भी हो सकते हैं.

जहां तक कांग्रेस की बात है तो पार्टी जमीनी स्तर पर लोगों से जुड़ने में नाकाम साबित हो रही है. खासतौर पर अपने फ्रंट विंग सेवा दल के खात्मे के बाद से मध्य प्रदेश में कांग्रेस सिमटती ही जा रही है. जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं और नेताओं के अभाव में कांग्रेस का जनाधार घटता ही जा रहा है. ऐसे में कांग्रेस के लिए अगले विधानसभा चुनाव की राह कठिन नजर आ रही है. पार्टी फिलहाल एंटी-इनकंबेंसी के सपने संजोए बैठी है, लेकिन AAP की सरगर्मियां उसके इस सपने को चकनाचूर कर सकती हैं. यानी AAP की एंट्री के बाद अब मध्य प्रदेश में सत्ता में वापसी करना कांग्रेस के लिए और भी मुश्किल हो गया है.

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