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राज्यसभा की सीटों का वैश्य कनेक्शन: वोटबैंक पर निशाना और विरोधी भी धराशायी

आम आदमी पार्टी ने साल 2019 के लोकसभा चुनाव और साल 2020 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए ये दांव खेला है

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Jan 04, 2018 07:40 PM IST

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राज्यसभा की सीटों का वैश्य कनेक्शन: वोटबैंक पर निशाना और विरोधी भी धराशायी

कहना गलत नहीं होगा कि आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल राजनीति सीख चुके हैं. उन्होंने सीएम बनने के बाद कहा भी था कि ‘राजनीति कोई रॉकेट साइंस नहीं है’. अब पॉलिटिक्स के गुर सीखने के बाद उन्होंने अपने दांव से जहां कुमार विश्वास को चित कर दिया तो वहीं उनके निशाने पर अब बीजेपी का वोट बैंक है.

दिल्ली में बीजेपी के बनिया समाज के वोट बैंक को देखते हुए केजरीवाल ने राज्यसभा के लिए गुप्ता समाज से दो लोगों को तरजीह दी. भले ही सुशील गुप्ता और एन डी गुप्ता के नामों से सियासत के गलियारों में तूफान उठ रहा हो लेकिन आम आदमी पार्टी ये जानती है कि बनिया बिरादरी को अपने खेमे में लाने का ये सही वक्त है. आम आदमी पार्टी ने साल 2019 के लोकसभा चुनाव और साल 2020 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए ये दांव खेला है.

Arvind Kejriwal on evm

दिल्ली में कांग्रेस के वोटबैंक में सेंध लगाने के बाद अब अरविंद केजरीवाल की नजर बीजेपी के वोटबैंक पर है. दिल्ली में पंजाबी खत्री और बनिया समाज के वोटर ही बीजेपी के वोटबेस माने जाते हैं. दिल्ली बीजेपी के कई बड़े नेता बनिया बिरादरी से आते हैं. डॉ हर्षवर्धन, विजय गोयल और विजेंद्र गुप्ता जैसे नाम वैश्य समाज के लिए पार्टी की तरफ से नुमाइंदगी करते आए हैं. डॉ हर्षवर्धन को तो दिल्ली का संभावित सीएम तक माना जा रहा था. लेकिन ऐन मौके पर उनका नाम हटने के बाद दिल्ली बीजेपी की राजनीति में कई मोड़ आ गए. किरन बेदी पर बीजेपी का खेला गया दांव खाली गया.

ये भी माना जाता है कि डॉ. हर्षवर्धन के सीएम चेहरा न बनाए जाने की वजह से बीजेपी के कोर वोटर रहे बनिया समाज ने सबक सिखाने के लिए वोट नहीं दिया. शायद तभी से बीजेपी ने पूर्वांचलियों पर बड़ा दांव खेलते हुए मनोज तिवारी को पार्टी अध्यक्ष बनाया. बीजेपी ने कोर वोटर होने के बावजूद विकल्प का वोटबेस भी तैयार किया जो दिल्ली एमसीडी चुनाव में सही भी साबित हुआ. हालांकि बीजेपी को अबतक के चुनावों में पंजाबी खत्री और वैश्य समुदाय का समर्थन मिलता आया है. भले ही वैश्य समाज संख्या बल में कम हो लेकिन चुनावों के समीकरण बदलने का माद्दा रखता है.

kumar vishwas

लेकिन साल 2015 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने पहले से चले आ रहे जातीय समीकरणों को बदलने का काम किया. इस बार वो वैश्य समाज को लुभाना चाहती है. तभी केजरीवाल ने दो गुप्ता को टिकट देकर बिरादरी में संदेश देने की कोशिश की है. केजरीवाल दिल्ली के वैश्य समाज को अपने नाम के बूते अपनी पार्टी में लाने की कवायद में जुटे हैं.

आम आदमी पार्टी ये मानती है कि दिल्ली में उसने खुद को कांग्रेस के विकल्प के तौर पर स्थापित कर लिया है. ऐसे में पिछले लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद अब उसे जातीय समीकरणों को साधने की जरूरत है. इसलिए उसने बीजेपी के कोर वोटबैंक को ही निशाने पर लेने का काम किया है. पार्टी को लगता है कि दिल्ली की राजनीति में फिलहाल बनिया समाज बीजेपी में पूर्वांचलियों के वर्चस्व की वजह से नेपथ्य में है और उसे भी शायद बीजेपी के विकल्प की तलाश है. लेकिन केजरीवाल ये भूल रहे हैं कि जिस वोटबैंक में वो सेंध का सपना देख रहे हैं वो छह दशक पहले जनसंघ से जुड़ा था तो बाद में बीजेपी के साथ अबतक जुड़ा हुआ है. बीजेपी से बनिया समाज का ये जुड़ाव कई दशकों का है जिस पर दिल्ली में जाट या पंजाबी मुख्यमंत्री बनाने से भी असर नहीं पड़ा है. दिल्ली में मदन लाल खुराना भी मुख्यमंत्री रहे तो साहिब सिंह वर्मा भी. लेकिन बीजेपी की सरकार बनाने में वैश्य समाज के वोटर ने कभी सौदेबाजी नहीं की.

ManojTiwari_ArvindKejriwal

फोटो: पीटीआई

ऐसे में बनिया समाज से सिर्फ दो नामों को राज्यसभा भेजकर केजरीवाल दिल्ली में बड़ा कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे. हां, उनके इस फैसले से हरियाणा की राजनीति पर जरूर वो असर डाल सकते हैं. सुशील गुप्ता और एन डी गुप्ता का ताल्लुक केजरीवाल की तरह ही हरियाणा से भी है. पेशे से सीए एन डी गुप्ता का हरियाणा में वैश्य समुदाय में काफी असर माना जाता है तो वहीं सुशील गुप्ता समाजसेवी होने की वजह से भी वैश्य समाज में गहरी पकड़ रखते हैं. हरियाणा में सुशील गुप्ता के चैरिटेबल स्कूल और हॉस्पिटलों ने उन्हें एक बड़ी पहचान दी है. ऐसे में केजरीवाल हरियाणा के वैश्य समाज के वोटरों को लुभाने के लिए अपने दांव से कुछ नया जरूर पा सकते हैं.

बहरहाल केजरीवाल ने राज्यसभा के तीर से दो शिकार करने का काम किया है. एक तरफ उन्होंने कुमार पर अविश्वास जताते हुए विरोध का अध्याय ही समाप्त कर दिया तो दूसरा ये कि दिल्ली के साथ साथ हरियाणा के भी वैश्य समाज के वोटरों को पार्टी का न्यौता दे डाला. दिल्ली में तकरीबन 20 प्रतिशत और हरियाणा में 15 प्रतिशत वैश्य आबादी मानी है. ऐसे में अगर केजरीवाल इस हिस्से को हासिल करने में कामयाब हो जाएं तो भविष्य में बीजेपी को टक्कर दे सकते हैं.

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