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आप का राज्यसभा के लिए टैलेंट हंट पूरा, 'अपनों' के कतरे पर और 'बाहरी' को थमाई ‘राज्य’नीति

आखिर राज्यसभा के उम्मीदवार की ‘टैलेंट हंट’ आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन से शुरू होने के बाद सुशील गुप्ता पर आकर कैसे सिमट गई?

Updated On: Jan 03, 2018 04:09 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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आप का राज्यसभा के लिए टैलेंट हंट पूरा, 'अपनों' के कतरे पर और 'बाहरी' को थमाई ‘राज्य’नीति

आम  आदमी पार्टी ने राज्यसभा चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों का एलान कर दिया. तीन नाम सामने आए. आप के वरिष्ठ नेता संजय सिंह, पूर्व कांग्रेस नेता सुशील गुप्ता और चार्टर्ड अकाउंटेंट एन डी गुप्ता. राज्यसभा के लिए आप के नामित चेहरों को देखकर आम जन-मन में सवाल उठने शुरू हो गए हैं. पहला सवाल तो ये ही है कि आखिर राज्यसभा के उम्मीदवार की ‘टैलेंट हंट’ आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन से शुरू होने के बाद सुशील गुप्ता पर आकर कैसे सिमट गई?

आप ने तय किया था कि राज्यसभा में राजनीतिक पार्टी के लोगों की बजाए एक्सपर्ट्स को भेजा जाएगा. नई स्टाइल की पॉलिटिक्स का ये हिस्सा था. लेकिन जब जानेमाने चेहरों ने आप के प्रस्ताव को ठुकराना शुरू किया तो ये कवायद विशेषज्ञों की बजाए वापस नेताओं पर सिमट गई.

India’s former Reserve Bank of India (RBI) Governor Raghuram Rajan, listens to a question during an interview with Reuters in New Delhi, India September 7, 2017. REUTERS/Adnan Abidi - RC125A9D7D10

पीएसी की बैठक के बाद जब डिप्टी सीएम मनीश सिसोदिया नामों का एलान कर रहे थे तो वो पर्चा पढ़ कर सुशील गुप्ता का प्रोफाइल बता रहे थे. यानी साफ है कि खुद उनके जेहन में सुशील गुप्ता की तस्वीर एक राजनीतिज्ञ और पूर्व कांग्रेसी की थी. लेकिन पार्टी के फैसले को सही साबित करने के लिए बार बार उन्हें चैरिटी मैन बताया जा रहा था. मीडिया के जरिए ये संदेश देने की कोशिश की गई कि जिस शख्स के चैरिटी स्कूलों में 15 हजार बच्चे निशुल्क पढ़ते हों उसे टिकट देने में क्या दिक्कत है? वाकई दिक्कत तो कुछ भी नहीं. लेकिन जिस आप ने राज्यसभा चुनाव के लिए पहले ही ये पॉलिसी तैयार की थी कि वो राज्यसभा में राजनीतिक दल से किसी को नहीं भेजेगी तो फिर सुशील गुप्ता कैसे उस पैमाने में खरे उतर गए? आखिर पूर्व कांग्रेसी में आम आदमी पार्टी को अपनों के बीच से ज्यादा क्या विश्वसनीय लगा? कुमार विश्वास और आशुतोष के नाम खारिज करने के बाद आखिर किस आधार पर संजय सिंह के नाम पर मुहर लग गई?

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भले ही आम आदमी पार्टी संजय सिंह के नाम से ये संदेश देने की कोशिश करे कि पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं की अहमियत समझी है. लेकिन आप का पूर्व का इतिहास ही इस संदेश को खारिज करने का काम करता है.

दरअसल अंदरूनी कलह से जूझ रही पार्टी ने इस फैसले के जरिए गुटबाजी को ठिकाने लगाने की कोशिश की थी. लेकिन जब रघुराम राजन, जस्टिस टी एस ठाकुर, यशवंत सिन्हा जैसे बड़े नामों ने आप के प्रस्ताव को ठुकरा दिया तो साख बचाने के लिए बाहरियों का सहारा ले लिया. लेकिन ये समझ से परे है कि इन बाहरियों को किस वफादारी का ईनाम मिला?

क्या इस फैसले से उन कार्यकर्ताओं की अनदेखी नहीं हुई जिन्होंने लोकपाल आंदोलन के वक्त से लेकर पार्टी बनने और सत्ता तक पहुंचने के सफर में अपना खून-पसीना एक किया?

दो चौंकाने वाले नामों से साफ है कि आम आदमी पार्टी के भीतर विश्वास का संकट गहरा गया है. विश्वास के संकट के गहराने की ही वजह से कुमार विश्वास का पत्ता काटा गया. बाहरियों की आड़ लेकर ही पार्टी प्रवक्ता आशुतोष को भी राज्यसभा की उम्मीदवारी से ठिकाने लगा दिया गया.

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दरअसल आप की इसी विश्वसनीयता की कमी की ही वजह से तमाम बड़े नाम भी आप पर भरोसा नहीं कर पा रहे थे. सोचने वाली बात है कि जिस पार्टी को तकरीबन पांच साल होने जा रहे हैं वो राजनीतिक पार्टी ही अपने बीच में से राज्यसभा के लिए उम्मीदवारों का नाम नहीं तय कर सकी. ये फैसला आलाकमान में असुरक्षा की भावना ही उजागर करता है.

इस फैसले से एक दूसरी बात भी सामने आती है कि आम आदमी पार्टी भी बीएसपी और एसपी जैसी तमाम क्षेत्रीय पार्टियों की राह पर निकल चुकी है जो नहीं चाहती कि पार्टी में कोई दूसरा बड़ा कद कभी भविष्य तैयार हो सके. तभी गुटबाजी और असंतोष को कम करने की आड़ में उन चेहरों का कद कतरा गया है जो भविष्य में किसी दूसरे पद के लिए चुनौती न बन सकें. ये कीमत पहले योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण जैसे चेहरों ने चुकाई तो अब कुमार विश्वास और आशुतोष की बारी थी. पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा की बगावत के वक्त ही ये कहानी सामने आ चुकी थी कि कुमार विश्वास को राज्यसभा जाने से रोकने की तैयारी शुरू हो चुकी थी.

बहरहाल राज्यसभा के उम्मीदवारों के ऐलान से एक संदेश जरूर जनता के बीच गया कि 70 विधानसभा सीटों वाली दिल्ली में 66 विधायकों के बावजूद आम आदमी पार्टी को राज्यसभा के लिए एक भी विधायक या कार्यकर्ता भरोसे पर खरा नहीं उतरा.

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