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हाईकोर्ट के आदेश पर 'आप' भले खुश हो ले, लेकिन 'अयोग्यता' का डर बरकरार है

आम आदमी पार्टी के उन 20 विधायकों के लिए यह जान लेना जरूरी है कि कोर्ट से मिली राहत अस्था किस्म की है और अयोग्य ठहराये जाने का खतरा उनके सिर पर अब भी मंडरा रहा है.

Debobrat Ghose Debobrat Ghose Updated On: Mar 26, 2018 05:09 PM IST

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हाईकोर्ट के आदेश पर 'आप' भले खुश हो ले, लेकिन 'अयोग्यता' का डर बरकरार है

आम आदमी पार्टी(आप) हाईकोर्ट के आदेश पर मारे खुशी के बल्लियों उछल सकती है क्योंकि कोर्ट ने ऑफिस ऑफ प्रॉफिट(लाभ का पद) मामले में 20 विधायकों को अयोग्य ठहराने के चुनाव आयोग के फैसले को दरकिनार कर दिया है. लेकिन, दरअसल यह वक्त आम आदमी पार्टी के लिए खुशी मनाने का है नहीं.

आम आदमी पार्टी के उन 20 विधायकों के लिए यह जान लेना जरूरी है कि कोर्ट से मिली राहत अस्था किस्म की है और अयोग्य ठहराये जाने का खतरा उनके सिर पर अब भी मंडरा रहा है.

चुनाव आयोग ने आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों के संसदीय सचिव के पद को लाभ के पद के दायरे में माना था और आयोग के इस रुख के बाद राष्ट्रपति ने विधायकों को अयोग्य करार दिया.

हाईकोर्ट ने आज मामले को चुनाव आयोग के पास भेज दिया ताकि अयोग्य ठहराये गए 20 विधायक मौखिक सुनवाई में अपना पक्ष पेश कर सकें.

बहरहाल, संविधान के विशेषज्ञों तथा मामले में अर्जी देने वाले पक्ष की राय है कि हाईकोर्ट ने बेशक राहत दी है और चुनाव आयोग से कहा है कि मौखिक सुनवाई के जरिए आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों को अपना पक्ष रखने का मौका दे लेकिन हाईकोर्ट से मिली यह राहत अस्थाई किस्म की है.

संविधान-विशेषज्ञ एस के शर्मा ने फर्स्टपोस्ट से कहा, 'इन 20 विधायकों को बस अस्थायी राहत मिली है. विधायकों का पक्ष सुनकर चुनाव आयोग को अपना फैसला सुनाना है. इन विधायकों का मामला उन सारी कसौटियों को पूरा करता है जिनके आधार पर इनके पद को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का मामला माना जाय. बात कुछ ऐसी ही है कि किसी दोषी को फांसी की सजा सुना दी गई है लेकिन सर्वोच्च अदालत ने उसपर कुछ देर के लिए स्थगन लगा दिया है लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि दोषी आने वाले सभी वक्तों के लिए अब सजा से मुक्त हो चुका है.'

Delhi High Court

संविधान-विशेषज्ञ एस के शर्मा ने अपनी बात को समझाते हुए कहा कि अगर चुनाव आयोग 20 विधायकों की मौखिक सुनवाई करता है तो फिर ‘अयोग्य’ करार होने की दशा में वे अपना पक्ष आयोग के सामने नहीं रख सकते, अपना पक्ष रखने के लिए उनका दर्जा ‘योग्य’ का होना चाहिए लेकिन राष्ट्रपति ने विधायकों को अयोग्य करार दे दिया था. इसी कारण राष्ट्रपति के आदेश को लेकर यथास्थिति बहाल रखी गई है ताकि अयोग्य करार दिए गए विधायक अपने ‘योग्य’ होने का दर्जा बहाल रखते हुए सुनवाई में शामिल हों.'

बहरहाल इस मामले में याची(अर्जी दायर करने वाले) प्रशांत पटेल विधायकों के तर्क से सहमत नहीं. प्रशांत पटेल ही ने मामले में सबसे पहले एक जनहित याचिका दायर कर पूछा था कि संसदीय सचिव का पद ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के दायरे में आता है या नहीं.

प्रशांत पटेल का कहना है, 'चुनाव आयोग में मामले की सुनवाई 11 दफे चली और इन 20 विधायकों को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया गया. लेकिन कभी तो ये विधायक सुनवाई में आये ही नहीं और कभी ऐसे मुद्दे उठाये जो मामले के लिहाज से प्रासंगिक ही नहीं थे. यह बात इस तथ्य से स्पष्ट होती है कि राष्ट्रपति ने इन्हें जब अयोग्य करार दिया तो ये विधायक हाईकोर्ट की शरण में गए और हाईकोर्ट ने इनसे सवाल पूछा कि आप लोगों ने चुनाव आयोग की नोटिस का कोई जवाब क्यों नहीं दिया. कोर्ट ने इन्हें बस अस्थाई राहत दी है.'

कैसे तय होता है ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का मामला

आम तौर पर ऐसी तीन बातें हैं जिन्हें कसौटी मानकर ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के मामले में फैसला किया जाता है-

1. क्या कोई व्यक्ति ऐसे पद पर है जो लाभ का पद कहलाता है

2. क्या यह पद सरकारी महकमे का है ?

3. क्या पद पर होने के कारण वह व्यक्ति कोई लाभ कमा रहा है ?

आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों के मामले में ये बात निकलकर सामने आई कि वे लाभ के पद पर हैं.

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इन विधायकों को संसदीय सचिव पद की शपथ दिलायी, सो यह पद दिल्ली सरकार का है. इनकी नियुक्ति का आदेश भी मुख्यमंत्री ने पारित किया.

तीसरी कसौटी को लेकर विधायकों का जवाब ‘ना’ में था. उनका कहना था कि हमें इस पद से कोई लाभ(वेतन आदि) हासिल नहीं होता. बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक लाभ कमाने का अर्थ सिर्फ नकदी हासिल करने तक सीमित नहीं. लाभ सत्ता, पद, कई किस्म की सुविधा वैगरह के शक्ल में भी हो सकता है. यहां तक कि अगर दफ्तर की तरफ से कार मिली हो या दफ्तर के काम के लिए फर्निचर खरीदा गया हो तो इसे भी आमदनी के रूप में गिना जाएगा. ऑफिस ऑफ प्रॉफिट तय करने के लिए इन सारी बातों का ध्यान रखा जाता है.

चुनाव आयोग के पांच सवाल

चुनाव आयोग ने पांच प्रश्न तैयार किए और इन्हीं की बुनियाद पर 20 विधायकों को परखकर आयोग ने एलान किया कि ये विधायक लाभ के पद पर हैं.

1. क्या विधायक जिस पद पर हैं वह लाभ का पद है? (चुनाव आयोग ने दर्ज किया- ‘हां’).

2. क्या इन विधायकों ने पद के जरिए लाभ कमाया? ( आयोग ने लिखा ‘हां’)

3. क्या सुविधाएं ली गई थीं? (आयोग ने लिखा ‘हां’).

4. क्या विधायकों को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के दायरे में होने से कोई छूट दी गई? ( कोई छूट नहीं दी गई)

5. क्या इन विधायकों के लिए काम तथा दायित्व का निर्णय संसदीय सचिव के रूप में किया गया? ( चुनाव आयोग ने लिखा कि ऐसा कोई निर्णय नहीं हुआ).

इन पांच मुद्दों के आधार पर चुनाव आयोग ने फैसला किया कि 20 विधायकों को हासिल पद ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के दायरे में आता है.

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मामले में याची प्रशांत पटेल के सलाहकार रह चुके संविधान विशेषज्ञ एस के शर्मा का कहना है, 'ये विधायक संसदीय सचिव की हैसियत से संबद्ध मंत्रालय की बैठकों में भाग लेते थे. यहां तक कि मंत्री मौजूद ना हो तो भी संसदीय सचिव के रुप में ये विधायक मंत्रालय के अधिकारियों के साथ बैठक करते थे. ये विधायक अधिकारियों को निर्देश देते थे और इनके निर्णय कार्यपालिका के कामकाज के बारे में होते थे.'

एस के शर्मा ने यह भी बताया, 'दफ्तर से मिली कार का इस्तेमाल, दफ्तर के लिए फर्निचर की खरीद तथा संसदीय सचिव के रुप में अधिकारियों के साथ बैठक करना और निर्देश जारी करना इस बात की दलील है कि इन्हें शक्तियां हासिल थीं. ये सारी बातें ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के दायरे में आती हैं. ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का मतलब मात्र यहीं तक सीमित नहीं कि किसी को पद पर रहते हुए वेतन मिल रहा है या नहीं. सो, विधायकों के लिए मामले में बच निकलने का कोई रास्ता नहीं है.'

क्या कह रही है आम आदमी पार्टी ?

आदर्श शास्त्री द्वारका इलाके से आम आदमी पार्टी के विधायक हैं. ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में अयोग्य करार दिए गए 20 विधायकों में उनका नाम भी शामिल है. उन्होंने मसले पर फर्स्टपोस्ट से कहा, 'हमने ये मसला उठाया था कि हमारी बातें मौखिक सुनवाई के मार्फत सुनी जानी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हुआ. चुनाव आयोग अब जाकर उचित तरीके से सुनवाई करेगा. वहां हम अपने हिस्से की सच्चाई बयान करेंगे. अदालत के सामने मामले में दिए गए फैसले को दरकिनार करने के अलावे कोई विकल्प ही नहीं था. मामला एकदम ही खोखला है. कोर्ट ने इंसाफ किया है. इससे हम विधायकों को अपने निर्वाचन क्षेत्रों में नई ऊर्जा के साथ काम करने में मदद मिलेगी.'

जहां तक रणनीतिक मोर्चे पर तैयारी का सवाल है, आम आदमी पार्टी अब इस दिशा में काम कर रही है कि चुनाव आयोग अगर फिर इन 20 विधायकों को अयोग्य करार देता है तो क्या कदम उठाना ठीक होगा ?

आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव पंकज गुप्ता का कहना है, 'मामले में न्याय अपनी स्वाभाविक रीति से नहीं हुआ. पहले हमें मौखिक सुनवाई के जरिए अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया. हमारे विधायकों को यह खबर भी ना दी गई कि सीईसी(मुख्य चुनाव आयुक्त) ओपी रावत ने मामले से अपने को मुक्त कर लेने के बाद कार्यवाही में फिर से अपने को शामिल कर लिया है. अब हाईकोर्ट ने मामले को फिर से चुनाव आयोग को सौंप दिया है. लेकिन सुनवाई के बाद आयोग क्या फैसला देगा इसके बारे में अभी से कुछ भी नहीं कहा जा सकता. अगर फैसला हमारे खिलाफ आता है तो हमारी पार्टी मसले को हाईकोर्ट मे ले जायेगी. लेकिन बीच के वक्त में जो राहत हासिल है उससे हमारे विधायकों को यह मसला दिल्ली की जनता के बीच ले जाने का मौका मिलेगा.'

तो अब गेंद आम आदमी पार्टी के पाले में है और देखने वाली बात होगी कि वे इस गेंद के साथ किस बारीकी से खेलते हैं क्योंकि पार्टी की मांग थी कि मौखिक सुनवाई का मौका दिया जाय और यह मौका उसे अब हासिल हो गया है.

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