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क्या सियासी 'अछूत' बनती जा रही है आम आदमी पार्टी?

अरविंद केजरीवाल की भाषा पूरी तरह बदल चुकी है. पार्टी की राजनीति भी पूरी तरह से तब्दील हो गई है और तलाश आगे जाने के रास्ते की है

Aparna Dwivedi Updated On: Jun 09, 2018 07:50 PM IST

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क्या सियासी 'अछूत' बनती जा रही है आम आदमी पार्टी?

भ्रष्टाचार को खत्म करने और व्यवस्था को साफ करने के आंदोलन करके अरविंद केजरीवाल जब आम आदमी पार्टी के रूप में सक्रिय राजनीति में घुसे तो लोगों ने हाथों-हाथ ले लिया. दिल्ली में सत्ता हासिल करने के बाद भी अरविंद केजरीवाल ने अपने ही सरकार में विपक्ष की भूमिका जमकर निभाई. निशाने पर पहले यूपीए सरकार और बाद में मोदी सरकार थी.

हर मुद्दे पर ट्वीट और बयानबाजी करते आप अध्यक्ष और उनके पार्टी के नेता जमकर तूफान मचा रहे थे. आलम ये था कि केंद्र सरकार को निशाना बनाते हुए आंदोलन भी कर रहे थे. पहले कांग्रेस और बाद में बीजेपी पर आरोपों के तोप के गोले मारे जा रहे थे, लेकिन फिर अचानक सब थम गया.

अरविंद केजरीवाल का ईमानदार मॉडल

अरविंद केजरीवाल के राजनैतिक सफर पर नजर डाले तो राजनीति में भ्रष्टाचार को दूर करने के नाम पर अरविंद केजरीवाल ने अन्ना हजारे के आंदोलन में काम किया. इस आंदोलन का चेहरा अन्ना हजारे का था, लेकिन आंदोलन के संगठन और दिमाग अरविंद केजरीवाल का था और धीरे-धीरे आंदोलन का चेहरा अरविंद केजरीवाल बन गए. उन्होंने नए मॉडल के साथ राजनीति में कदम रखा. उनका मानना था कि राजनीति में अगर ईमानदार लोग होंगे तो व्यवस्था अपने आप ईमानदार हो जाएगी और यहीं पर वो गलत साबित हुए. राजनीति में बिना अनुभव के कूदे अरविंद केजरीवाल ने आंदोलन स्टाइल में राजनीति में कदम रखा. केजरीवाल और उनकी पार्टी से जुड़े योगेंद्र यादव ने एक बार कहा था कि अरविंद केजरीवाल एनजीओ स्टाइल में राजनीति करते हैं. मुद्दा प्रोजेक्ट की तरह उठाते हैं और आंदोलन करते हैं, जनता को अपने साथ जोड़ते हैं लेकिन वो ये भूल जाते हैं कि जनता को समाधान चाहिए और वो समाधान की उम्मीद सरकार से करती है.

कम होता जनाधार

ध्यान देने वाली बात ये है कि 2013 में आप ने दिल्ली विधानसभा का चुनाव जीता और दो महीने में इस्तीफा दे दिया. 2014 के लोकसभा चुनाव में आप के सारे उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई लेकिन 2015 में जब दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और 70 में से 67 सीटों पर कब्जा किया. अरविंद केजरीवाल ने अपनी पार्टी का विस्तार करने की भी कोशिश की. 2014 में तो वो मोदी के खिलाफ खड़े हुए लेकिन वहां पर मुंह की खाई. और फिर पंजाब, गोआ और हाल फिलहाल कर्नाटक में उनके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई. दिल्ली में जहां आम आदमी पार्टी ने 54.3 फीसदी वोट भी हासिल किए थे. वहीं दो साल बाद एमसीडी चुनाव में आप का जनाधार गिरा.

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दिल्ली नगर निगम चुनाव में तीसरे स्थान पर रहने वाली कांग्रेस को साल 2015 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले एमसीडी चुनाव में 11 प्रतिशत ज्यादा वोट मिले हैं. दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी (आप) का वोट प्रतिशत विधानसभा चुनाव के मुकाबले आधा रह गया है. 2015 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रतिशत 9.7 प्रतिशत था. वहीं, एमसीडी चुनाव में यह प्रतिशत बढ़कर 21.28 हो गया है. आम आदमी पार्टी का वोट प्रतिशत विधानसभा चुनाव के मुकाबले 26 प्रतिशत कम हुआ था. दिल्ली पर कब्जा करने के बाद आप की महत्वकांक्षा तो बढ़ी लेकिन चुनाव में उन्हें लगातार हार का सामना करना पड़ा. और यहीं उनके लिए सदमा था.

दिल्ली की सरकार पर खतरा

राजनीति में नौसिखिए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया था, जो लाभ का पद है. पंजाब चुनाव के दौरान एक ने इस्तीफा दे दिया था. लेकिन 20 विधायकों पर तलवार लटक रही है. कायदे से कानून कहता है कि संसद या फिर किसी विधानसभा का कोई भी सदस्य अगर लाभ के किसी भी पद पर होता है, उसकी सदस्यता जा सकती है. हालांकि फिलहाल उन्हें हाईकोर्ट ने अपना पक्ष रखने का मौका दिया है लेकिन मामाल गंभीर है. हालांकि आप की सरकार को खतरा नहीं है लेकिन उनकी छवि पर ये बहुत बड़ा झटका है.

केजरीवाल का माफीनामा

अरविंद केजरीवाल ने सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी और बीजेपी और मोदी पर लगातार निशाना साधा. आरोप की झड़ी लगाते चले गए लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं किया. लेकिन ये सारे आरोपों की झड़ी ने उन पर कोर्ट केस की झड़ी लगा दी. केसों के निबटारा करने के लिए अरविंद केजरीवाल ने लोगों से माफी मांगनी शुरू की. पंजाब में अकाली दल के नेता बिक्रम मजीठिया को ड्रग्स माफिया कहने पर हुए मानहानि केस में माफी मांगने के बाद केजरीवाल अब तक नितिन गडकरी, वित्त मंत्री अरुण जेटली और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल से माफी मांग चुके एक समय पर केजरीवाल नें भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए उन्होंने इन नेताओं के खिलाफ आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ने का दावा किया था.

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अब ये सवाल उठता है कि आखिर केजरीवाल की वह पुरानी धार कहां गई? कांग्रेस-बीजेपी की नेतृत्व पर ताल ठोक आरोप लगाने वाले केजरीवाल माफीनामे के बैकफुट पर कैसे आ गए? बताया जाता है कि सुप्रीम कोर्ट ने नेताओं के केस की फास्टट्रैक सुनवाई का आदेश दिया है. ऐसे में आपराधिक मानहानि का केस झेल रहे केजरीवाल को चिंता है कि अगर उन्हें इस चक्कर में सजा मिल गई तो उनकी भविष्य की राजनीति प्रभावित होगी.

लोकपाल की अनदेखी

सबसे मजे की बात ये थी कि जिस राजनीति को साफ करने के लिए ये पार्टी उतरी थी और लोकपाल के मुद्दे पर तूफान मचा रही थी अब वो मुद्दे और वो राजनीति दोनों ही गायब सी हो गई है और तो और जिनके विरोध में उतरे थे उनके साथ गठबंधन की बात भी करने लगे.

पिछले कुछ दिनों में ये बात खबरों में आने लगी कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दिल्ली में लोकसभा सीटों के लिए गठबंधन की तैयारी में है, लेकिन जैसे ये खबर आई उतने ही तेजी से खत्म भी हो गई. दिल्ली कांग्रेस के नेता अजय माकन ने इस गठबंधन पर सख्ती से मना कर दिया. उन्होंने तो केजरीवाल पर ही सवालिया निशान लगा दिया- 'सबसे पहले, केजरीवाल धर्मनिरपेक्ष है? वह वह व्यक्ति है, जिसने अन्ना हजारे के साथ बीजेपी और संघ का सहारा लिया और कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन शुरू किया. दिल्ली में कांग्रेस की छवि को खराब करने के लिए अकेले जिम्मेदार हैं.'

माकन का गुस्सा वाजिब भी है. अरविंद केजरीवाल ने शुरू से ही अलग रहकर ही राजनीति की है. आज भी राजनीति में उनके दोस्तों के नाम पर दो ही नाम आते हैं– एक ममता बनर्जी और दूसरा सीताराम येचुरी. इन दोनों से उनके संबंध बाकियों के मुकाबले थोड़े बेहतर हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि उनको और उनकी पार्टी को गंभीरता से लिया जाता है.

कर्नाटक चुनाव में एच डी कुमारास्वामी के शपथ समारोह में उन्हें बुलाया तो गया क्योंकि वो दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं और प्रोटोकॉल के हिसाब से सभी मुख्यमंत्रियों को न्योता जाता है. लेकिन मंच पर जगह मिलना और सभी नेताओं के साथ बैठना वो अलग बात थी. कुमारस्वामी के शपथ समारोह में विपक्ष के सभी नेता एक साथ मंच पर दिखे लेकिन विपक्ष एका की मिसाल वाली एक भी तस्वीर में वो नहीं दिखे.

अब आगे क्या?

अब ये सवाल आप और अरविंद केजरीवाल दोनों के सामने है. आप पार्टी को ये समझ आ गया है कि जिस स्टाइल से उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया उसके हिसाब से वो सफल हो चुके हैं पर अब वो आगे का रास्ता तलाश रहे हैं. 2013 और 2015 की सफलता ने उन्हें ये तो बता दिया कि स्थानीय मुद्दे उठाकर वो सफल रहे लेकिन 2014 में राष्ट्रीय मुद्दों पर उन्हें सफलता नहीं मिली.

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कभी लगातार हर मुद्दे को उठाने वाले केजरीवाल अब एक दम चुप हैं. मामला चाहे किसानों का हो, मंहगाई का हो और अन्य मुद्दे. केजरीवाल की तरफ से कोई भी प्रतिक्रिया नहीं आ रही. अरविंद केजरीवाल को ये तो समझ आ गया है कि अगर वो राष्ट्रीय राजनीति में कूदना चाहते हैं तो उनको एक राष्ट्रीय पार्टी का सहारा चाहिए होगा. बीजेपी की तरफ तो वो जा नहीं सकते क्योंकि उन्होंने मोदी पर गहरे आरोप लगाए थे और बीजेपी उन्हें घास भी नहीं डाल रही. दूसरा विकल्प कांग्रेस है लेकिन प्रदेश कांग्रेस ने इस राजनीति पर विराम लगा दिया है.

अरविंद केजरीवाल की भाषा पूरी तरह बदल चुकी है. अब वो दिल्ली में भ्रष्टाचार खत्म हो जाने का कोई दावा नहीं करते. पार्टी की राजनीति भी पूरी तरह से तब्दील हो गई है और तलाश आगे जाने के रास्ते की है. पर क्या राष्ट्रीय स्तर पर उनका वनवास खत्म होगा- ये तो वक्त बताएगा.

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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