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व्यंग्य: कोर्ट की चिंता में मियां हलकान

केजरीवाल जैसे नेता का और जेठमलानी जैसे वकील का जोड़ तो करेला और नीम चढ़ा जैसा है

Shivaji Rai Updated On: May 31, 2017 07:54 PM IST

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व्यंग्य: कोर्ट की चिंता में मियां हलकान

कल तक केजरीवाल की सौ किलो की मुस्‍कान देखकर विरोधी जल-भुन जाते थे. चेहरे पर ऐसा नूर दिखता था मानो वक्‍त से पहले ही वसंत आ गया हो. या फिर, वसंत ने अपने आने की सबसे पहले सूचना उनके चेहरे पर ही आकर दी हो. सफाईकर्मियों की हड़ताल से दिल्‍ली भले बदरंग होती रही.

लेकिन केजरीवाल का चेहरा रूहअफजा की तरह ऐसा दमदमाता रहा कि योगगुरु रामदेव देख लें तो कपालभाति भूल जाएं. लेकिन आजकल वह चेहरा कांतिविहीन हो गया है. ऐसा लग रहा है, गोया केजरीवाल का चेहरा, चेहरा न हो कोई नोटिस बोर्ड हो.

चेहरे की उतरी रंगत की वजह न उनकी पुरानी खांसी है, और न ही कोई कपिल मिश्रा की बगावत. दरअसल केजरीवाल जी के चेहरे की रंगत कोर्ट-कचहरी के चक्‍कर में पड़ने से उड़ गई है. योग के बल पर ब्‍लडप्रेशर और शुगर पर तो काबू पा लिया था. लेकिन मानहानि का मुकदमा तो ब्‍याहता पत्‍नी की तरह हो गया है जो लाख मनाही के बावजूद भी साथ छोड़ने को तैयार नहीं है.

केजरीवाल को अब समझ आने लगा है कि वकील और पुलिस वाले किसी के सगे नहीं होते. ज्ञानीजनों ने क्‍यों पुलिस, वकील से दोस्‍ती-दुश्‍मनी को निषेध बताया है. दिल्‍ली पुलिस के गृहमंत्रालय के अधीन होने से केजरीवाल पुलिस की संगत से तो बच गए. पर 56 इंच की जीभ की लपलपाहट की वजह से कोर्ट-कचहरी की फांस में फंस गए.

Arvind-Kejriwal

केजरीवाल के लिए कोर्ट कचहरी का चक्कर छिपकली की पूंछी की तरह है

दलदल से उबर ही रहे थे कि प्रख्‍यात एडवोकेट जेठमलानी जी ने एक मामले को तो बतौर गिफ्ट एड कर दिया. अब अरुण जेटली ठहरे वित्‍तमंत्री, पैसे का हिसाब चोखा. सो बिना देर किए एक और दस करोड़ का केस ठोक दिए. जेठमलानी महोदय को लेकर केजरीवाल अब भारी असमंजस में हैं.

समझ नहीं पा रहे हैं कि जेठमलानी जी उनकी तरफ हैं या वित्‍तमंत्री की तरफ. पहले मुफ्त में मुकदमा लड़ने का वादा कर साढ़े तीन करोड़ का बिल भेज दिया, अब वित्‍तमंत्री पर अभद्र टिप्‍पणी कर एक नया मामला जड़ दिया.

केजरीवाल को अब समझ आने लगा है कि कोर्ट-कचहरी का चक्‍कर तो छिपकली की पूंछ की तरह है. जितनी बार काटो, उतनी बार उग जाती है. आज केजरीवाल बहुत संवेदनशील हो गए हैं. सरकारी आंसू तो उन्‍होंने बहुत गिराए थे. सड़क और संसद में रोने-रुलाने का खेल भी बहुत किया था. लेकिन पहली बार उनकी आंखों में आम आदमी की नमी उतर आई है.

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धर्मनिरपेक्ष केजरीवाल समझने लगे हैं कि अनेक धर्मों की तरह कोर्ट-कचहरी और काले कोट वालों का भी एक धर्म है. जागरूक वकील वहीं होते हैं जो न विरोधी को चैन से रहने देते हैं और न अपने मुवक्किल को.

संयोग से केजरीवाल के माननीय जेठमलानी जी में ये सारे गुण इफरात में मौजूद है. लिहाजा केजरीवाल के साथ जो कुछ हो रहा है, उसमें कुछ भी अप्रत्‍याशित नहीं है.

'एक साथ-एक छत के नीचे सभी काम' की वकालत करने वाले केजरीवाल आज एक ऑर्डर की कॉपी हासिल करने के लिए हफ्तों चक्‍कर काट रहे हैं. व्हिसल ब्लोअर और भ्रष्‍टाचार की लड़ाई के सेनापति न्‍यायमूर्ति की नाक के नीचे पेशकार साहब की मुट्ठी गर्म होते चुपचाप देख रहे हैं. न स्टिंग ऑपरेशन कर रहे हैं. न उसके खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं. इतना ही नहीं अभिव्‍यक्ति की आजादी की फुल ऑटोनामी रहते हुए भी होंठ हिलाने से डर रहे हैं.

देश में चहुंओर शक का माहौल है

ऐसा नहीं कि सब कुछ नकारात्‍मक ही है. यहां कई पक्ष सकारात्‍मक भी दिख रहे हैं. देश में चहुओर शक का माहौल है. हर कोई एकदूसरे को शक की निगाह से देख रहा है. जनता नेता को, नेता जनता को, अधिकारी कर्मचारी को, कर्मचारी अधिकारी को.

Arvind Kejriwal

यहां तक भी पति पत्‍नी को और पत्‍नी पति को. पर एक वकील ही है जो फीस लेने के बाद अपने मुवक्किल पर पूरी तरह भरोसा करता है. कभी-कभी तो वह न्‍यूज चैनल बन जाता है अर्थात जो पैसा दे उसी के हित में प्रायोजित कार्यक्रम प्रसारित करने लगता है.

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वैसे भी केजरीवाल जैसे नेता का और जेठमलानी जैसे वकील का जोड़ तो करेला और नीम चढ़ा जैसा है. फिर केजरीवाल पर मुकदमों का बैताल सा हावी होना लाजिमी ही है. अवधू गुरु अपने अनुभव से कहते हैं कि कानून के हाथ को लंबा करने का श्रेय पुलिस से अधिक वकीलों को जाता है.

गुरु कहते हैं कि वफादारी सीखना हो तो कुत्‍ते से सीखो, चालाकी लोमड़ी से, याद करना तोते से, मेहनत करना चींटी से और लक्ष्‍य पर झपटना बाज से. और अगर सब कुछ एक व्‍यक्ति से सीखना हो तो काले कोट वालों से सीखों.

गुरु को उम्‍मीद है कि केजरीवाल को आने वाले दिनों के लिए सीख मिल गई होगी. फिलहाल केजरीवाल के रुलाई का राष्‍ट्रीय प्रहसन देखकर डेंगू, चिकनगुनिया के डर से रोने वाली दिल्‍ली की जनता ने हंसना शुरू कर दिया है.

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