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आम आदमी पार्टी: संघर्ष, मुश्किलों और सफलता भरे 5 साल

आम आदमी पार्टी ने अनुभवहीनता के चलते कई गलतियां की हैं मगर परंपरागत राजनीति को एक चुनौती भी दी है

Updated On: Nov 25, 2017 01:19 PM IST

Ashutosh Ashutosh

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आम आदमी पार्टी: संघर्ष, मुश्किलों और सफलता भरे 5 साल

वैसे तो पांच साल किसी भी राजनीतिक दल के जीवन में एक लंबा अंतराल नहीं होता. ज़्यादा से ज़्यादा एक नन्ही सी यात्रा ही मानी जाती है. पर ये यात्रा उसी तरह से है जैसे नील आम्रस्ट्रांग ने चांद पर उतरते समय कही थी, ‘इंसान का ये एक छोटा सा कदम, मानवता की एक लंबी छलांग है.’ आम आदमी पार्टी के पांच साल भारतीय राजनीतिक जीवन में एक लंबी छलांग हैं.

भारतीय राजनीति पिछले सत्तर सालों में अपनी जड़ों से कट गई है. हवा में लटक रही है. राजनीतिक दल प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन कर रह गए हैं. जड़ से जुड़े नेताओं की जगह, करोडों रूपये के बल पर टिकट खरीदने वालों की जमात ने ले ली है. पैसा पानी की तरह बहा कर चुनाव जीतने का मंसूबा और हर प्रकार का फरेब करके राजनीति में बने रहने का जुगाड़ ही इस राजनीति की पहचान है जहां जन सेवा और आदर्शवाद मज़ाक का विषय बन गये हैं. ऐसे में ‘आप’ ने राजनीति के इस मिथक को ध्वस्त करने का काम किया है कि राजनीति सिर्फ पैसों और विचारहीनता के बल पर ही की और जीती जा सकती है.

2013 में जब ‘आप’ ने पहली बार चुनाव लड़ा तो सबने मज़ाक उड़ाया. किसी ने गंभीरता से नहीं लिया पर आदर्श से ओतप्रोत और नया हिंदुस्तान बनाने का सपना लेकर आए हज़ारों कार्यकर्ताओं ने असंभव को संभव कर दिखाया. कांग्रेस जैसी जमी जमाई पार्टी दिल्ली में ख़त्म हो गई और उठान पर खड़ी बीजेपी को सरकार बनाने से रोक दिया गया. यानी भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक्ता दोनों की नाक में नकेल डालने का काम ‘आप’ ने कामयाबी से किया. बीजेपी कसमसा कर रह गई. हालांकि लोकसभा की सारी सीटें आम आदमी पार्टी दिल्ली में हार गई. मगर विधानसभा में वो हुआ जो इतिहास में कभी-कभी ही होता है. जब मोदी जी के अश्वमेध के घोड़े को रोकने की ताक़त किसी में नहीं थी तो दिल्ली में ‘आप’ ने 70 में से 67 सीटें जीत कर अजूबा कर दिया.

ये जीत तीन चीज़ों का प्रमाण थी. एक, देश परंपरागत राजनीति से ऊब चुका है. उसे नए विकल्प की तलाश है. दो, आर्थिक विकास ने समऋद्धि के नए द्वार खोले पर जनता को विकास के साथ भ्रष्टाचार से भी मुक्ति चाहिये. वो आर्थिक भ्रष्टाचार के साथ साथ राजनीतिक भ्रष्टाचार से भी निजात पाने के लिये तड़प रहा है. तीन, अगर नया ईमानदार विकल्प मिले तो नया मध्य वर्ग नयी राजनीति में उतरने से गुरेज़ नहीं करेगा. ‘आप’ ने ‘अराजनीतिक’ लोगों की एक नई फ़ौज को ‘राजनीति’ में आने का अवसर दिया. ये शुभ संकेत हैं.

इस नई राजनीति की एक सीमा है

इस राजनीति की एक सीमा है. ये उम्मीदों का हिमालय खड़ा कर देती है. आकांक्षाओं का नया आसमान बड़ा अधीर होता है. बेसब्री इसका तकिया कलाम है. नयी सूचना क्रांति की तरह हर मसले का हल चुटकी में चाहती है. आप को पहले ही दिन से इस कसौटी पर कसा जाने लगा. चूंकि ‘आप’ ने ऊंचे मानदंड स्थापित करने का प्रयास किया था इसलिये मामूली सी देरी या मामूली सी फिसलन सवालों का तूफ़ान खड़ा करने लगी.

लोगों ने ये तो महसूस किया कि ‘आप’ ने धन की राजनीति को धत्ता बताया, उसने राजनीति में ईमानदारी को पुनर्स्थापित किया, गुड़ चना लेकर प्रचार करने वाले कार्यकर्ताओं को केंद्र में लेकर आई और तमाम राजनीतिक दलो में ये सुगबुगाहट शुरू हुई कि दाग़ी लोगों को टिकट देने से फजीहत हो सकती है, पर वो ये भी चाहने लगे कि आप फौरन उनकी समस्याओं का हल खोजे. इन उम्मीदों पर खरा उतरना आसान नहीं है.

आप की कामयाबी ने परंपरागत राजनीति को सकते में ला दिया. स्थापित दलों को लगने लगा कि अगर आप सफल हो गई तो उनके दिन थोड़े रह जायेंगे. लिहाजा परंपरागत राजनीति का नया गठबंधन बनने लगा और आप को घेरकर मारने का काम शुरू हुआ. मीडिया भी इसमें कूद पड़ा. महाभारत के अभिमन्यु की तरह आप को घेरने का प्रोग्राम बन गया. केंद्र की बीजेपी सरकार ने आप सरकार के पर कतरने शुरू कर दिये, सारे अधिकार छीनने लगी, सरकार चलाना मुश्किल हो गया, सरकार की बर्ख़ास्तगी की आशंका तक जताई जाने लगी. आप का मनोबल तोड़ने के लिये आप के पंद्रह विधायकों को गिरफ़्तार किया गया.

aap hoarding

आम आदमी पार्टी, दिल्ली के फेसबुक वाल से साभार

कठिन रहा सफर

पार्टी के नेताओं पर झूठे केस लगा बदनाम करने की साज़िश की गई, मुख्यमंत्री के कार्यालय पर छापा मारा गया, वरिष्ठ अधिकारियों को धमकियां दी गई कि वो आप सरकार के साथ सहयोग न करे, उपराज्यपाल और पुलिस कमिश्नर के दफ़्तर राजनीति का अखाड़ा बन गये. कांग्रेस ने इस मे बीजेपी की पूरी मदद की. पर शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी पर जो बुनियादी काम हो रहा है उसकी तारीफ आज पूरे देश में हो रही है. शिक्षा और स्वास्थ्य पर अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली.

इस दौरान दिल्ली की तरह पंजाब में भी आप को लेकर गजब का उत्साह दिखा. लोग ये तक कहने लगे कि पंजाब में पार्टी भारी बहुमत से जीतेगी पर ऐसा हो न सका. पार्टी को 20 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल हुयी जो एक नयी पार्टी के लिये बड़ी उपलब्धि है. दिल्ली में इस बीच पार्टी एमसीडी का चुनाव हार गई. पंजाब के बाद इस हार ने मनोबल तोड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. पार्टी के लिये ये मुश्किल दौर था. आलोचकों ने फिर आप को ख़ारिज करने का काम शुरू कर दिया. हमारे कुछ साथी भी इस जाल में फंस गये पर बवाना उपचुनाव की भारी जीत ने इन अटकलों को फ़िलहाल विराम लगा दिया है.

आज पार्टी गुजरात विधानसभा की कुछ सीटों के साथ साथ यूपी में स्थानीय निकाय का चुनाव मज़बूती से लड़ रही है. केरल के पालघाट से लेकर महाराष्ट्र के अमरावती तक, रांची से लेकर पटना, राजकोट तक पार्टी का आकर्षण बरकरार हैं. आज पार्टी के सामने सबसे बडी चुनौती है इस राष्ट्रीय भावनात्मक लगाव को सांगठनिक ढांचे में तब्दील करना, दिल्ली में वैकल्पिक प्रशासनिक मॉडल को सफल बनाना. ये सच है कि पिछले पांच सालों में हमसे कुछ साथी बिछडे़ हैं पर लाखों की संख्या में नए साथी पार्टी के साथ जुड़े भी हैं.

AAP supporter at election road show

पार्टी नई है, अनुभवहीन है ऐसे में गलतियां भी होंगी, और हुई भी हैं, पर इतना साफ कि आप ने परंपरागत राजनीति के सामने एक नई चुनौती खड़ा करने का काम किया है. विकास का एक नया ‘मानववादी’ मॉडल बनाने की कोशिश की है. ये मॉडल इस बुनियाद पर खड़ा है कि विकास सिर्फ हाई वे और मॉल बनाने से नहीं होता, बुलेट ट्रेन की बातें बेमानी है अगर अधिसंख्यक जनता उचित शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है. सबका साथ, सबका विकास, का नारा देना आसान है पर जब तक हिंदुस्तान के आम नागरिक को बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य नहीं मिलेगा तब तक भारत विश्व गुरू नहीं बन सकता.

आज देश पर फासीवाद का खतरा मंडरा रहा है. देश को धर्म के नाम पर बांटने की साज़िश की जा रही है. ऐसे में पार्टी को अगले पांच साल में अपने को नए सिरे से परिभाषित करने की और बदले परिप्रेक्ष्य में नए शत्रुओं की पहचान करने की ज़रूरत पड़ेगी. ये काम आसान नहीं है पर आप भविष्य की पार्टी है. हमेशा उसने लकीर से हट के सोचा है. वो पिछले पांच साल की तरह आगे भी मुसीबतों का सामना करते हुए बढ़ेगी.

(लेखक आम आदमी से जुड़े नेता, प्रवक्ता और लेखक हैं)

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