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गांधी जयंती: दहेज और बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई शुरू करेंगे नीतीश कुमार

नीतीश कुमार के सामने कानून बनाने से बड़ी चुनौती समाज में जागरुकता लाना है

Alok Kumar Updated On: Oct 01, 2017 04:18 PM IST

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गांधी जयंती: दहेज और बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई शुरू करेंगे नीतीश कुमार

2 अक्टूबर, मतलब महात्मा गांधी जयंती के मौके पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नए ही अवतार में नजर आते हैं. उन्होंने दहेज-प्रथा, बाल-विवाह तथा अन्य सामाजिक बुराइयों से लड़ने का ऐलान किया है. इसके पीछे सोच यह है कि सूबे के विकास में सामाजिक पिछड़ापन बाधक है.

नीतीश कुमार अपने दल के लोगों को कह चुके हैं कि जिस शादी के बारे में शक हो कि उसमे दहेज का लेन-देन हुआ है उसमें शिरकत ना करें. बाल-विवाह के खिलाफ भी वे जंग छेड़ने वाले हैं. सूबे में बाल-विवाह की कुप्रथा खत्म नहीं हो पाई है. हाल की एक रिपोर्ट में आया है कि सूबे में होने वाली कुल शादियों में 39 फीसदी बाल-विवाह की श्रेणी में आते हैं और यह राष्ट्रीय औसत से बहुत ज्यादा है.

मुख्यमंत्री रहते नीतीश कुमार ने हर जाति और समुदाय की महिला आबादी को अपने पक्ष में लामबंद करने में कामयाबी हासिल की है. अपने पहले कार्यकाल (2005-2010) में उन्होंने स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों को साइकिल और स्कूल की पोशाक देने की योजना चलायी. यह योजना बड़ी कामयाब रही और स्कूलों में नामांकन की संख्या में खूब इजाफा हुआ.

महिला मतदाताओं पर फोकस

महिला मतदाताओं से तार जोड़ पाने में नीतीश कुमार को जैसी कामयाबी मिली है वैसी पहले किसी मुख्यमंत्री को नहीं. मुख्यमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल (2010-15) में उन्होंने यात्राएं की. इन यात्राओं के दौरान बहुत सी महिलाओं ने शिकायत की कि आपने तो गांव-गांव में शराब की दुकान चलाने की अनुमति दे रखी है. मजबूरन नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) को इस पर यू-टर्न लेना पड़ा.

2015 के चुनावों में नीतीश कुमार ने वादा किया कि जीत हुई तो शराब की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगेगा. उस वक्त नीतीश कुमार राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे थे. चुनाव जीतने के बाद उन्होंने 5 अप्रैल 2016 को अपना वादा निभाया. इस फैसले से सूबे की महिला मतदाताओं के बीच नीतीश कुमार की लोकप्रियता और ज्यादा बढ़ी.

सामाजिक बुराइयों से लड़ाई ठान चुके नीतीश कुमार अब कानून बनाने का रास्ता चुन सकते हैं और इसके लिए जरुरत पड़ी तो अपने नए मकसद को हासिल करने के लिए पार्टी का संविधान भी बदल सकते हैं. उन्होंने फैसला किया है कि अपराध और भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेन्स (एकदम बर्दाश्त नहीं) की नीति के नई ऊंचाई तक ले जाया जाएगा.

नीतीश के करीबी सहयोगी और पार्टी के महासचिव संजय झा कहते हैं कि 'शराबबंदी के कानून की तरह हमलोग दहेज और बाल-विवाह को रोकने वाले कानून को भी सख्त बना सकते हैं जो कि इन सामाजिक बुराइयों को रोकने का साधन साबित हो सकता है. सरकार कई विकल्पों पर विचार कर रही है जिसमें दहेज के लेन-देन में शामिल सरकारी अधिकारियों को पद से हटाना तथा बाल-विवाह पर रोक के कानून का पालन ना करने वालों की जेल की अवधि बढ़ाना शामिल है.'

खर्चीले विवाह समारोह में शामिल होने या बाल-विवाह में भागीदार बनने वाले पार्टी के नेताओं को दंडित किया जा सकता है और उन्हें पार्टी से बाहर का भी रास्ता दिखाया जा सकता है. संजय झा की बातों का एक संकेत यह भी था.

मुख्यमंत्री के कदमों की प्रशंसा करते हुए संजय झा ने कहा, 'सामाजिक बुराइयों को मिटाने के लिए कई सुधारकों ने अथक मेहनत की लेकिन तमिलनाडु के प्रथम मुख्यमंत्री अन्नादुरै को छोड़कर किसी और मुख्यमंत्री ने तकरीबन आधी आबादी की राह रोकने वाली सामाजिक प्रथाओं के खिलाफ लड़ाई ठानने की नहीं सोची. नीतीश जी ने दोतरफा रणनीति तैयार की है-जनता के कल्याण की योजनाओं को गति दी जा रही है और आगे बढ़कर सामाजिक जागरुकता फैलाने का काम हो रहा है.'

सामाजिक सूचकांकों के लिहाज से बिहार पीछे

यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड, विमेन डेवलपमेंट काउंसिल तथा बिहार सरकार से आर्थिक सहायता प्राप्त जेंडर अलायंस ने बाल-विवाह के बारे में बड़े आश्चर्यजनक आंकड़े पेश किए हैं. इन आंकड़ों के मुताबिक बिहार बाल-विवाह के मामलों में देश के सबसे पिछड़े राज्यों में एक है.

जेंडर अलायंस की स्टेट मैनेजर प्रशांति तिवारी ने न्यूज 18 को बताया कि सूबे में बाल-विवाह की तादाद 39 फीसद है. हमने 354 प्रखंडों के सामाजिक परिवेश का अध्ययन करके एक सामाजिक सूचकांक बनाया है. मार्के की एक बात यह है कि जिन प्रखंडों में आर्थिक सूचकांक ऊंचे और सामाजिक सूचकांक नीचे हैं वहां बाल-विवाह की संख्या ज्यादा है. इसकी एक वजह यह है कि जिन प्रखंडों में सामाजिक सूचकांक नीचे हैं वहां परिवार-जन जन्म के आधार पर भेदभाव करते हैं.

यह भेदभाव किशोरावस्था तक जारी रहता है और लड़कियों को सीमांत कार्यबल (मार्जिनल वर्कफोर्स) में शामिल कर लिया जाता है. लड़कियों के सीमांत कार्यबल में शामिल होने से आर्थिक सूचकांक तो ऊंचे चढ़ते हैं लेकिन कुल मिलाकर देखें तो पूरी स्थिति महिलाओं के साथ भेदभाव की सूचना देती है.

बिहार में शराब बंदी अलग-अलग कारणों से चर्चा में रही है

बिहार में शराब बंदी अलग-अलग कारणों से चर्चा में रही है

नीतीश कुमार के गृहनगर नालंदा के हिल्सा प्रखंड का सामाजिक सूचकांक (0.909 अंक) कहीं ज्यादा नीचे है. सामाजिक सूचकांक के लिहाज कुल 534 प्रखंडों का औसत अंकमान 0.9406 है. जाहिरा तौर पर हिल्सा प्रखंड में बाल-विवाह भी 59.78 प्रतिशत है. यह सूबे के कुल औसत (39.85 प्रतिशत) से ज्यादा है. आर्थिक सूचकांक के लिहाज से हिल्सा प्रखंड का अंकमान 0.591 यानी ऊंचा है.

बंधन तोड़ आंदोलन

बाल-विवाह तथा दहेज के मसले से समग्रता में निपटने के लिए बंधन तोड़ आंदोलन के नाम से एक व्यापक रणनीति बनायी गई है. जेंडर एलायंस ने 'बंधन तोड़' नाम से एक मोबाइल एप्लीकेशन भी बनाया है. इस एप्लीकेशन की एक खास बात यह है कि गांव की किशोर लड़कियां इसके सहारे मददगारों के एक नेटवर्क से जुड़ सकती हैं जो उन्हें बाल-विवाह से बचने में सहायता पहुंचाएगा.

सूबे की सामाजिक कल्याण एवं महिला विकास मंत्री मंजु वर्मा ने कहा है कि उनका मंत्रालय नीतीश कुमार के सपने पर अमल करने के लिए तैयार है. मंजु कुमार ने न्यूज 18 से कहा कि 'बिहार की खुशनसीबी है जो महिला सशक्तीकरण के लिए बिना रुके काम करने वाला मुख्यमंत्री मिला है. नोडल डिपार्टमेंट होने के नाते हमारा मंत्रालय उन्हें लक्ष्य हासिल करने में मदद कर रहा है. 2 अक्तूबर से एक नयी सुबह की शुरुआत होनी है.'

शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से राज्य के राजस्व में 5000 करोड़ रुपए की कमी आई है लेकिन सूबे की महिलाओं से नीतीश कुमार का यह सबसे बड़ा वादा था और उन्होंने वादा पूरा किया है. वादे को पूरा करना एक बड़ी चुनौती थी लेकिन सूबे की सरकार ने कमर्शियल टैक्स की वसूली बढ़ाकर अपना वित्तीय भार कम करने में कामयाबी हासिल की है.

शराबबंदी से परिवार-जन की आमदनी में बचत का हिस्सा बढ़ा है. इससे उनकी खरीद की क्षमता में इजाफा हुआ है, कामकाज के घंटे बढ़ गए हैं, घरेलू हिंसा मे कमी आयी है और आर्थिक क्षमता में बढ़ोत्तरी हुई है. मंजु वर्मा के मुताबिक 'घरेलू हिंसा की मार हमेशा ही महिलाओं पर पड़ती है, शराब के नशे में पति या परिवार का कोई और उन्हें मारता-पीटता है. शराबबंदी से इसपर रोक लगी है. अब महिलाएं अपना जीवन गरिमा के साथ जीने लगी हैं.'

चुनौती: नहीं हो रहा महिलाओं की योजनाओं के फंड का इस्तेमाल

मंजु वर्मा के मुताबिक नीतीश कुमार ने सूबे की आधी आबादी (महिलाओं) के लिए चार खास कार्यक्रम शुरू किए हैं. बाल-विवाह को रोकने के मकसद से कन्या विवाह योजना शुरु की गई है. जिन परिवारों की सालाना आमदनी 60 हजार रुपए से कम हैं उन्हें बेटी के विवाह में सहायता के रुप में 5000 रुपए दिए जाते हैं. ऐसी अन्य योजनाओं के नाम हैं मुख्यमंत्री कन्या सुरक्षा योजना और मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना.

कन्या सुरक्षा योजना के तहत राज्य सरकार दो बच्चियों के जन्म तक 2000 रुपए की राशि बैंक में जमा करती है. नारी शक्ति कार्यक्रम सामुदाय के सहारे चलने वाला कार्यक्रम है. इसमें महिला विकास निगम की ओर से स्व-सहायता समूहों को वित्तीय सहायता दी जाती है.

लेकिन ये कार्यक्रम ज्यादा सफल नहीं हो पाए हैं. साल 2017-18 के लिए सरकार ने नारी शक्ति योजना के अंतर्गत 6152 लाख रुपए खर्च के लिए दिए थे लेकिन विभाग अभी तक(सितंबर) 175 लाख रुपए ही बांट सका है. कन्या सुरक्ष योजना के अंतर्गत 100 लाख रुपए बांटे गए हैं और वित्तवर्ष का आधा हिस्सा बीत चुका है जबकि इस योजना का बजट 7627 लाख रुपए तय किया गया था. अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा देने की योजना भी इसी नियति की शिकार है. सरकार ने इस योजना के मद में 700 लाख रुपए दिए हैं लेकिन 3.5 लाख रुपए ही इस्तेमाल हो पाए हैं.

योजनाओं की सुस्त रफ्तार को ध्यान में रखकर सरकार ने महिला सशक्तीकरण की सात योजनाओं को एक छतरी के नीचे लाने का सोचा है. इस बात की पुष्टी करते हुए मंजु वर्मा ने कहा कि इस साल रफ्तार के सुस्त रहने की वजह वह सियासी अनिश्चितता रही जिसके नतीजे में नयी सरकार बनी. भारी बाढ़ के कारण भी योजनाओं की रफ्तार रुकी. लेकिन हम छह योजनाओं को एक साथ करने की अपनी कोशिश जारी रखेंगे.

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बहरहाल, प्रशांति का कहना है कि सरकारी सहायता के ये कार्यक्रम लोगों के बीच में रुपए बांटने की योजना बनकर रह गए हैं. हमारी कोशिश ऐसी स्थिति तक पहुंचने की होनी चाहिए कि मदद देने की जरूरत ना रह जाए. यह स्थिति तभी आ सकती है जब आर्थिक उत्पादन में महिलाओं की भागीदारी बढ़े. अफसोस की बात है कि बिहार में महिलाओं का आर्थिक गतिविधियों में योगदान महज 9 प्रतिशत है.

नीतीश इस स्थिति को बदलना चाहते हैं और इसके लिए एक हद तक सामाजिक जागरुकता लाना जरूरी है क्योंकि सूबे की आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए बेटी के हाथ पीले करना कहीं ज्यादा बड़ी प्राथमिकता है. ज्यादातर परिवार सोचते ही नहीं कि बेटी का आर्थिक रुप से अपने पैरों पर खड़ा होना भी समान रूप से जरुरी है.

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