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2019 में एकजुट विपक्ष: मोदी के सामने 'महागठबंधन' सिर्फ सपना बनकर न रह जाए

कांग्रेस भले ही मजबूरी में क्षेत्रीय दलों के प्रभाव वाले राज्य में उनके सामने आत्मसमर्पण की तैयारी में है, लेकिन, मोदी को रोकने के नाम पर आत्मसमर्पण की इस मजबूरी के बावजूद महागठबंधन मजबूत आकार लेता नहीं दिख रहा है.

Amitesh Amitesh Updated On: Jul 13, 2018 05:07 PM IST

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2019 में एकजुट विपक्ष: मोदी के सामने 'महागठबंधन' सिर्फ सपना बनकर न रह जाए

कांग्रेस के संगठन महासचिव अशोक गहलोत ने अपने बिहार दौरे के वक्त आरजेडी अध्यक्ष लालू यादव से मुलाकात की. लेकिन, उन्होंने जो बयान दिया उससे महागठबंधन के दलों में एकता की कलई खुल गई. गहलोत ने आरजेडी या जेडीयू के साथ बात करने को मजबूरी बताया. अशोक गहलोत ने इस मौके पर कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं को अकेले अपने दम पर सरकार बनाने के कोशिश करने की नसीहत दी.

कांग्रेस के कद्दावर नेता का बिहार दौरा और उस दौरे में पार्टी को मजबूत करने की कोशिश करना किसी भी नजरिए से गलत नहीं है. लेकिन, इस दौरान अपने दो दशकों से भी ज्यादा पुराने दोस्त लालू यादव की पार्टी आरजेडी से बात करने को कांग्रेस की मजबूरी बताकर गहलोत ने कांग्रेस के भीतर सालों से दबे उसे दर्द को हवा दे दी.

यही हकीकत भी है. बिहार में कांग्रेस को ही सत्ता से बेदखल कर नब्बे के दशक में लालू-राबड़ी शासन काल की शुरुआत हुई थी. लेकिन, वक्त ने ऐसे करवट लिया कि वही कांग्रेस सेक्युलरिज्म के नाम पर लालू यादव के पीछे-पीछे चलने पर मजबूर हो गई. मजबूरी भी ऐसी थी कि कांग्रेस का आरजेडी के साथ गठबंधन लालू यादव की शर्तों पर होता रहा.

अब एक बार फिर मोदी को रोकने के लिए बिहार में कांग्रेस गठबंधन की तैयारी कर रही है. डोरे जेडीयू पर भी डाल रही है. भले ही सामने आकर नीतीश के खिलाफ बोल रही है, लेकिन, दिली तमन्ना यही थी कि एक बार फिर से आरजेडी और कांग्रेस के साथ जेडीयू भी आ जाए तो मोदी को बिहार में घेरा जा सकता है.

खैर ये बात तो फिलहाल दूर की कौड़ी ही लग रही है. लेकिन, हकीकत यही है कि कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को बिहार में अपनी चुनावी वैतरणी पार करने के लिए फिर से चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू यादव की चौखट पर हाजिरी लगानी पड़ रही है.

कांग्रेस और आरजेडी में खींचतान

लेकिन, पटना में कांग्रेस के बड़े नेताओं की बैठक के दौरान पार्टी के कई नेताओं ने कांग्रेस को फिर से अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करने पर जोर देते नजर आए. कांग्रेस के राज्यसभा सांसद अखिलेश सिंह ने इस मौके पर अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए बिहार में कम से कम 12 सीटों की मांग कर दी. अखिलेश सिंह ने अशोक गहलोत के सामने यह मांग दोहराई की ‘ऐसा न लगे कि कांग्रेस बिहार में बची हुई सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है.’

कांग्रेस के नेता अखिलेश सिंह और संगठन महासचिव अशोक गहलोत के बयान से महागठबंधन के भीतर की उलझन का पता चल रहा है. इन नेताओं के बयान पर आरजेडी की तरफ से भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली. आरजेडी ने साफ-साफ शब्दों में कहा  बिहार में हमारा बड़ा जनाधार है. आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा ‘क्षेत्रीय पार्टियों की ताकत को कम कर के न आंका जाए.’

मांझी और शरद भी हैं दावेदार

कुछ इसी तरह की प्रतिक्रिया महागठबंधन में शामिल दूसरी पार्टी हम की तरफ से देखने को मिली. हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी की तरफ से यह कहा गया कि ‘हमें मजबूर ना समझा जाए, हमारे पास आठ फीसदी वोट बैंक है.’

उधर शरद यादव ने भले ही अभी चुप्पी साध ली हो, लेकिन, लोकतांत्रिक जनता दल के नाम से नई पार्टी बनाकर उन्होंने भी महागठबंधन में सीटों को लेकर अप्रत्यक्ष तौर पर दावा ठोंक ही दिया है.

मतलब साफ है कि बिहार में मोदी विरोधी महागठबंधन के नाम पर लालू, शरद, मांझी के साथ कांग्रेस आने को तैयार है, लेकिन, सीटों को लेकर यहां भी पेंच फंसने वाला है.

नीतीश की वापसी की कोशिश हुई विफल

हालांकि, कांग्रेस की तरफ से जेडीयू को भी इस महागठबंधन में फिर से एंट्री की कोशिश की जा रही थी. सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस चाहती थी कि हर हाल में जेडीयू 2015 के विधानसभा चुनाव की तरह महागठबंधन का हिस्सा बन जाए. लेकिन, ऐसा हो न सका.

जिस दिन कांग्रेस की बिहार में बैठक हो रही थी, उसी दिन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के साथ नीतीश कुमार की मुलाकात ने तमाम अटकलों को खारिज कर साफ कर दिया कि जेडीयू महागठबंधन के साथ फिर से आने वाली है. ऐसे में बिहार में नीतीश बगैर महागठबंधन मोदी विरोधी मुहिम को कितना धार दे पाएगा इसको लेकर सवाल तो खड़ा होगा ही.

बुआ-बबूआ को लेकर भी कयास

लेकिन, यह सवाल बिहार के बाहर भी है. बिहार के बाहर कई दूसरे राज्यों में भी इसी तरह की तमाम संभावनाएं दिख रही हैं. यूपी को लेकर भी अब भी महज कयास ही लगाए जा रहे हैं. यूपी में बुआ और बबुआ की जोडी के साथ आने को लेकर महज कयास भर ही लग रह हैं. कोई ठोस प्रगति नहीं हो पा रही है. क्योंकि कांग्रेस को साथ लेने पर भी दोनों ही दलों में मतभेद हैं.

सूत्र बता रहे हैं कि कांग्रेस के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ चुके अखिलेश यादव इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को साथ लेने से कतरा रहे हैं. दूसरी तरफ, मायावती कांग्रेस को लेकर थोड़ा नरम हैं. लेकिन, एसपी और बीएसपी के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर भी कोई समझौता अंतिम रूप ले पाएगा ये सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है.

कर्नाटक में नाटक जारी रहने के आसार

कुछ इसी तरह का हाल कर्नाटक में भी है. कर्नाटक में जेडीएस और कांग्रेस दोनों ने बीजेपी को रोकने के नाम पर सरकार तो बना ली है. लेकिन, सरकार बना लेने के बावजूद दोनों दलों के रिश्तों में विरोधाभास देखने को मिल रहा है.

लगातार हो रही खींचतान से आने वाले दिनों में लोकसभा चुनाव के वक्त बनने वाली गठबंधन की संभावना को लेकर भी कयासों को जन्म दे दिया है. अगर इसी तरह विरोधाभास देखने को मिला तो लोकसभा चुनाव में दोनों दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना को झटका लग सकता है.

महागठबंधन को ममता का झटका !

पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में भी टीएमसी के साथ मिलकर कांग्रेस और लेफ्ट का चुनाव लड़ना मुश्किल ही लग रहा है. ममता नहीं चाहती कि उनकी ताकत का फायदा उठाकर कांग्रेस और लेफ्ट फिर से बंगाल में अपनी जड़े मजबूत कर सकें. शायद इस बात का एहसास लेफ्ट को है, तभी तो सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी चुनाव से पहले गठबंधन की संभावना से इनकार कर रहे हैं.

येचुरी ने कहा है कि इस तरह का गठबंधन लोकसभा चुनावों के नतीजे की घोषणा के बाद ही हो सकता है. येचुरी ने कहा ‘मेरा यह मानना है कि भारत में चुनाव के पहले कोई भी महागठबंधन बनाना संभव नहीं है, क्योंकि हमारा देश विविधताओं वाला है.’

उन्होंने कहा, ‘इस बार भी आप वैसा ही देखेंगे, जैसा 1996 में देखने को मिला था जब संयुक्त मोर्चा ने सरकार बनाई थी और 2004 में जब यूपीए-1 सरकार बनी थी.’

येचुरी ने कहा कि देश के लोग केंद्र की ‘जनविरोधी सरकार' से छुटकारा पाना चाहते हैं लेकिन ‘वैकल्पिक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक सरकार’ लोकसभा चुनाव के बाद ही बन सकती है.

सीपीएम महासचिव के बयान से साफ है कि देश भर में  मोदी के खिलाफ विरोधी दलों ने मोर्चा खोल रखा है. लेकिन, इस मोर्चे की एक साथ एक मंच पर दिखने की संभावना काफी धूमिल है.

कांग्रेस भले ही मजबूरी में क्षेत्रीय दलों के प्रभाव वाले राज्य में उनके सामने आत्मसमर्पण की तैयारी में है, लेकिन, मोदी को रोकने के नाम पर आत्मसमर्पण की इस मजबूरी के बावजूद महागठबंधन मजबूत आकार लेता नहीं दिख रहा है. पटना में अशोक गहलोत का बयान महागठबंधन के भीतर की इसी हलचल और परेशानी का प्रतिबिंब नजर आ रहा है.

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