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क्या प्रतीकवाद के सहारे बीजेपी पिछड़े-दलितों के दिल जीत पाएगी?

2019 चुनाव के मद्देनजर बीजेपी ने सामाजिक समीकरण साधने की कवायद तेज कर दी है

Updated On: Aug 13, 2018 01:11 PM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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क्या प्रतीकवाद के सहारे बीजेपी पिछड़े-दलितों के दिल जीत पाएगी?
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एससी/एसटी और ओबीसी शब्द लगातार जिस तरह गूंज रहे हैं, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि चुनावी मौसम नजदीक है. एससी/एसटी-ओबीसी यानी आम बोलचाल की भाषा में पिछड़े और दलित. गैर-बीजेपी शब्दावली में इस विशाल वोटर समूह को बहुजन भी कहा जाता है. देश की सत्ता की चाबी इन्हीं गैर-सवर्ण हिंदू वोटरों के हाथों में है.

2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ ऐसा चमत्कार दिखाया कि अब तक चलते आए तमाम जातीय समीकरण ध्वस्त हो गए और बीजेपी 30 साल में अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली देश की पहली पार्टी बनी. चमत्कार की जरूरत इस बार कहीं ज्यादा है क्योंकि अब हालात अलग हैं. बीजेपी विपक्ष में नहीं बल्कि सत्ता में है. विरोधियों पर उंगली उठाने के बदले उसे यह बताना है कि उसने सरकार में रहते हुए पिछड़ों और दलितों के लिए क्या किया है.

दलित नाराज और पिछड़े भ्रमित

2014 का चुनाव पहला मौका था, जब मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए को पूरे देश में पिछड़ो के साथ दलितों के वोट भी बड़ी तादाद में मिले. दलितों की नुमाइंदगी करने वाली देश की सबसे बड़ी पार्टी बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का खाता तक नहीं खुला, वहीं बीजेपी को भरपूर रिजर्व सीटें मिलीं. एनडीए में शामिल दलित नेता रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) 6 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. इतना ही नहीं, अपना दल और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलडीपी जैसी एनडीए की छोटी पार्टियों तक को शत-प्रतिशत सफलता मिली.

लेकिन 2014 के बाद से राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक हालात बदल चुके हैं. अलग-अलग वजहों से दलित और ओबीसी केंद्र सरकार से खुश नहीं हैं. दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ी हैं. गुजरात, राजस्थान और हरियाणा जैसे बीजेपी शासित राज्यों में घोड़ी चढ़ने से लेकर मूंछ रखने तक जैसी छोटी-छोटी बातों को लेकर कई दलितों को अपनी जान गंवानी पड़ी है. गोरक्षा को लेकर संघ परिवार के आक्रमक अभियान बुनियादी तौर पर मुसलमानों के खिलाफ है लेकिन इसका शिकार दलित भी बन रहे हैं. केंद्र सरकार से दलितों की नाराजगी और बढ़ी जब एक अदालती फैसले के तहत एससी/एसटी एक्ट में बदलाव लाने का एलान हुआ और फैसला सुनाने वाले जज को रिटायर होने के फौरन बाद एक बड़ा सरकारी ओहदा दे दिया गया.

sc-st movement

एससी-एसटी एक्ट में बदलाव का देश भर में कड़ा विरोध हो रहा है

जहां तक ओबीसी वोटरों का सवाल है, उनका एक बड़ा तबका परंपरागत रूप से बीजेपी के साथ रहा है. लेकिन क्या 2019 में ओबीसी का रुख बीजेपी को लेकर वही होगा जो 5 साल पहले हुए चुनाव में रहा था? इस बात को लेकर बीजेपी के नेता भी आश्वस्त नहीं हैं. विपक्ष लगातार यह कहता रहा है कि केंद्र सरकार का रवैया सामाजिक न्याय विरोधी है. ओबीसी कोटे में शामिल किए जाने की मांग को लेकर पश्चिम और उत्तर भारत के अलग-अलग हिस्सों में कई जातियां लगातार आंदोलन कर रही हैं.

नए समीकरणों ने उड़ाई नींद

बीजेपी की असली चिंता राष्ट्रीय स्तर पर मोदी विरोधी गठजोड़ का बनना है. कांग्रेस हर राज्य में गठबंधन साझीदार ढूंढ रही है. यह तय हो चुका है कि 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में एसपी-बीएसपी मिलकर चुनाव लड़ेंगी. इतना ही नहीं इस गठबंधन में कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) भी शामिल होंगे. मौजूदा वोट शेयर के आधार पर आकलन करें तो अकेले यूपी में एनडीए को भारी नुकसान होता दिख रहा है और इसकी एकमात्र वजह दलित-पिछड़ा वोट का एक जगह इकट्ठा होना है.

जाहिर है, मोदी-शाह की जोड़ी की रणनीति का केंद्र बिंदु दलित और पिछड़े वोटरों को अपने पाले में बनाए रखना है. इसके लिए कई स्तर पर कोशिश की जा रही है. अपने परंपरागत ओबीसी वोटरों को एकजुट रखने के लिए केंद्र सरकार ने दो काम किए हैं. एससी/एसटी कमीशन की तरह राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को भी सांवैधानिक मान्यता दी गई है. दूसरा कदम ओबीसी के सब-कैटेगेराइजेशन की कोशिश है. इसकी संभावनाओं का पता लगाने के लिए पिछले साल बनाए गए जस्टिस जी रोहिणी आयोग का कार्यकाल और बढ़ा दिया गया है.

इसी तरह दलितों को खुश करने के लिए एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निरस्त करने के लिए सरकार संसद में बिल लेकर आई जिसे लोकसभा के बाद अब राज्यसभा ने भी पास कर दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दलितों के खिलाफ होनेवाली हिंसा की कई बार निंदा कर चुके हैं. यह अलग बात है कि उनकी निंदा के बावजूद हिंसा की घटनाएं रुकी नहीं हैं.

Monsoon Session of Parliament

लेकिन क्या इस तरह के कदमों एससी/एसटी और ओबीसी की नाराजगी दूर होती दिख रही है? वहीं ओबीसी समुदाय से यह आवाज लगातार उठ रही है कि अलग-अलग हथकंडे अपनाकर आरक्षण को निष्प्रभावी बनाया जा रहा है. मंडल आयोग के लागू होने के 25 साल बाद भी सरकारी सेवाओं में ओबीसी का प्रतिनिधित्व बहुत कम है. शैक्षणिक संस्थाओं का तेजी से निजीकरण हो रहा है, जिसकी वजह से पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए शिक्षा के अवसर कम होते जा रहे हैं.

केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री नितिन गडकरी तक यह स्वीकार कर चुके हैं कि नौकरियां कम हैं, इसलिए कोटा मांग रही नई जातियों को ओबीसी लिस्ट में शामिल कर भी लिया गया तो उन्हें कोई फायदा नही होगा. जाहिर है, काम के आधार पर मोदी सरकार एससी/एसटी और ओबीसी को एक सीमा से ज्यादा खुश नहीं कर सकती है. ऐसे में उसे दूसरे तरीके ढूंढने ही पड़ेंगे.

आइडेंटिटी पॉलिटिक्स की राह पर बीजेपी

दूसरा तरीका है, प्रतीकवाद की राजनीति. क्षेत्रीय दलों के जिस आइटेंडिटी पॉलिटिक्स को बीजेपी जातिवाद करार देती आई है, उसे जोर-शोर से अपनाया जा रहा है. बीजेपी बार-बार यह बता रही है कि रामनाथ कोविंद के रूप में उसने देश को दलित राष्ट्रपति दिया. अंबेडकर जयंती मनाने की होड़ में बीजेपी देश की तमाम दलित पार्टियों और संगठनों से टक्कर लेती दिखाई दे रही है. दिल्ली में अंबेडकर मेमोरियल बनाए जाने की घोषणा से लेकर भीम एप तक बीसियों ऐसे उदाहरण हैं, जहां दलित अस्मिता को तुष्ट करने की कोशिश की गई है.

प्रतीकवाद की राजनीति ने बीजेपी को पहले भी फायदा पहुंचाया है. ओबीसी माइनस यादव और दलित माइनस जाटव वाले अपने फॉर्मूले के तहत पार्टी ने यूपी विधानसभा चुनाव से पहले कई दलित और पिछड़े नायकों की पहचान की थी और उनका जोर-शोर से महिमामंडन किया था. सुहलदेव जयंती बड़े पैमाने पर मनाया जाना इसका उदाहरण हैं. 11वीं सदी के राजा सुहलदेव को पिछड़ा राजभर समुदाय अपना पूर्वज मानता है. कई अन्य पिछड़ी जातियों में भी राजा सुहलदेव पूजनीय हैं.

नरेंद्र मोदी के खिलाफ

2019 के चुनाव से पहले विपक्षी पार्टियां राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ महागठबंधन बनाने के लिए प्रयासरत हैं

सुहलदेव जयंती राजभर समुदाय को करीब लाने का जरिया बनी. इसी तरह अलग-अलग जातियों की रैलियां और गौरव यात्राएं निकालकर बीजेपी अपने जातिगत समीकरण को इस कदर पुख्ता करना चाहती है ताकि यूपी में महागठबंधन का उसे कम से कम नुकसान हो. इस कड़ी की ताजा कोशिश है, बिहार के दिग्गज समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर का महिमामंडन.

कर्पूरी ठाकुर का रिश्ता नाई जाति से था. वो दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे और पिछड़ों के आरक्षण के लिए लागू किए गए अपने `कर्पूरी फॉर्मूले’ की वजह से आज भी पुराने समाजवादियों के बीच याद किए जाते हैं. अब यूपी में बीजेपी कर्पूरी ठाकुर के आदर्शों को अपनाने की बात कह रही है. खबर यह भी है कि योगी आदित्यनाथ की सरकार हर जिले में एक सड़क का नाम कर्पूरी ठाकुर के नाम पर रखेगी. बीजेपी की यह नई कवायद खासी दिलचस्प है, जहां एक अलग विचारधारा वाले नेता को अपना बनाकर उसके जरिए वोटरों की साधने की तैयारी की जा रही है.

दिल जीतने की इस कोशिश के अपने जोखिम भी हैं

दलित और पिछड़े वोटरों का दिल जीतने की इस कोशिश के अपने जोखिम भी हैं. एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संविधान संशोधन के जरिए बदला जाना बीजेपी के कोर वोटरों यानी सवर्णों को रास नहीं आ रहा है. कुछ सवर्ण संगठनों ने इसके खिलाफ बकायदा प्रदर्शन किए जिसमें संविधान जलाने जैसी देश विरोधी घटनाएं तक हुईं.

लेकिन बीजेपी शायद यह मानकर चल रही है कि सवर्ण उसके परमानेंट वोटर हैं जो किसी भी हालत में विपक्ष के पाले में नहीं जाएंगे. दूसरी बात यह कि अगर सवर्णों की नाराजगी की कीमत पर अगर एससी/एसटी वोटर उसकी तरफ झुक जाते हैं तो यह महंगा सौदा नहीं है. बीजेपी की पूरी चिंता हिंदुत्व के व्यापक दायरे में एससी/एसटी-ओबीसी को फिट करने की है. दूसरी तरफ बीजेपी विरोधी पार्टियों की पूरी लड़ाई यह साबित करने की है कि बीजेपी एक ब्राहणवादी पार्टी है जो अपने राजनीतिक फायदे के लिए समाज में तनाव भड़का रही है, और मुसलमानों के खिलाफ सामाजिक पायदान पर नीचे खड़ी जातियों को इस्तेमाल कर रही है.

दोनों राजनीतिक शक्तियां अपने-अपने नैरेटिव को स्थापित करने के लिए हर तरह के तरीके आजमा रही हैं. यानी भारतीय राजनीति में आनेवाले दिन उग्र धार्मिक उन्माद और जातीय उभार के होंगे, इसमें जरा भी शक की गुंजाइश नहीं है.

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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