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केजरीवाल सरकार पर फिलहाल खतरा नहीं, लेकिन बवाल तो हो ही गया है

70 में से 66 सीटों पर अभी भी आम आदमी पार्टी का ही कब्जा है. लेकिन, चुनाव आयोग के फैसले बाद बीस विधायकों के गंवाने का खतरा आम आदमी पार्टी के सिर पर आ खड़ा हुआ है

Amitesh Amitesh Updated On: Jan 19, 2018 06:41 PM IST

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केजरीवाल सरकार पर फिलहाल खतरा नहीं, लेकिन बवाल तो हो ही गया है

चुनाव आयोग ने ऑफिस ऑफ प्राफिट मामले में आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों के खिलाफ अपनी सिफारिश राष्ट्रपति के पास भेजी है. खबर सामने आते ही देश की राजधानी दिल्ली की सियासत में भूचाल आ गया. हालांकि दिल्ली में 70 में से 66 सीटों पर अभी भी आम आदमी पार्टी का ही कब्जा है. लेकिन, चुनाव आयोग के फैसले बाद बीस विधायकों के गंवाने का खतरा आम आदमी पार्टी के सिर पर आ खड़ा हुआ है. राष्ट्रपति की मुहर के बाद आप के बीस विधायक अपनी सीट गंवा देंगे.

लेकिन, सवाल है कि इस फैसले के बाद अब क्या होगा ? क्या दिल्ली की सियासत में कोई नया मोड़ आएगा ? क्या दिल्ली में केजरीवाल सरकार पर खतरा मंडराएगा या फिर दिल्ली की सियासत के सिकंदर फिर से अरविंद केजरीवाल ही होंगे ? यह चंद सवाल हैं जिनको लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म रहने वाला है.

आम आदमी पार्टी के तेवर से तो यही लग रहा है कि फिलहाल वो इस लड़ाई को और आगे लेकर जाने वाली है. इस फैसले के बाद आप की तरफ से जिस अंदाज में मुख्य चुनाव आयुक्त ए के ज्योति पर हमला हुआ, उससे साफ है कि आप और उसके मुखिया अरविंद केजरीवाल इस फैसले के बाद तिलमिला गए हैं.

आप की तरफ से विधायक सौरभ भारद्वाज ने सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त के बैकग्राउंड पर हमला करते हुए कहा कि 23 जनवरी 2018 को वो 65 साल के हो रहे हैं. यानी उसके बाद वो मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से रिटायर हो रहे हैं. इसके पहले उन्होंने यह बड़ा फैसला दे दिया है.

भारद्वाज का आरोप था कि हमारी बात सुनी नहीं गई है और एकतरफा फैसला दे दिया गया है. गुजरात में ब्यूरोक्रेट के तौर पर ए.के ज्योति के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रिश्ते को लेकर भी आप की तरफ से टिप्पणी की गई. जाहिर है कि आप इस फैसले को सीधे बीजेपी सरकार के दबाव में लिया गया फैसला बताने की कोशिश कर रही है.

एक संवैधानिक संस्था और संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के बारे में की गई टिप्पणी को लेकर भी बहस होगी कि यह कदम सही है या नहीं. लेकिन, इससे आप के तेवर का पता चलता है जो अपने बीस विधायकों की सदस्यतता गंवाने के बाद किस तरह परेशान है. उधर, बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने इस फैसले के बाद अब मुख्यमंत्री अरविंद के जरीवाल के इस्तीफे की मांग कर दी है.

बीजेपी ने मांगा केजरीवाल का इस्तीफा

बीजेपी के दिल्ली अध्यक्ष मनोज तिवारी का कहना है,'यह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की नैतिक हार है वह इसकी जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा दें.’ बीजेपी प्रवक्ता संबित मात्रा ने भी अरविंद के जरीवाल के इस्तीफे की मांग करते हुए कहा कि दिल्ली में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रह गया है. लेकिन, नैतिकता और केजरीवाल में दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है लिहाजा केजरीवाल इस्तीफा देंगे ऐसा नहीं लगता.

दरअसल एमसीडी चुनाव में जीत के बाद से ही बीजेपी काफी उत्साहित है. बीजेपी को लगता है कि इस वक्त दिल्ली में उसके पक्ष में माहौल है. खासतौर से गुजरात और हिमाचल प्रदेश की हालिया जीत ने भी बीजेपी का मनोबल बढ़ा दिया है. बीजेपी के रणनीतिकारों को भी मालूम है कि इस वक्त केजरीवाल इस्तीफा नहीं देंगे लेकिन, अपनी तरफ से कोशिश है कि अरविंद केजरीवाल को बैकफुट पर रखा जाए, जिससे वो इस मुद्दे को जनता की सहानुभूति के तौर पर अपने पक्ष में ना भूला लें.

Manoj-Tiwari

यही वजह है कि बीजेपी केजरीवाल पर दबाव बनाने में लगी हुई है. एमसीडी चुनाव के वक्त बवाना से आप के विधायक वेदप्रकाश ने इस्तीफा देकर बीजेपी का दामन थाम लिया था. लेकिन, बवाना उपचुनाव में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने के बाद वेदप्रकाश की हार हो गई थी. इस उपचुनाव में बीजेपी बवाना की जनता को उपचुनाव के औचित्य को बताने में फेल हो गई थी.

बीजेपी को लगता है कि बीस विधायकों की सदस्यता जाने के बावजूद केजरीवाल सरकार पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला. क्योंकि 66 में से 20 सीटों के कम होने के बावजूद उसके पास 46 विधायक हैं. हालांकि इनमें से भी कपिल मिश्रा समेत 6 विधायक हैं जो इस वक्त आप से नाराज हैं और खुलकर अपना विरोध भी कई मौकों पर जता चुके हैं.

ऐसे में इन 6 विधायकों को भी आप की तरफ से हटा दिया जाए तो भी 40 विधायक आप के साथ हैं.

ऐसे में मौजूदा फैसले का केजरीवाल सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. लेकिन, आप के भीतर अगर कुमार विश्वास और कपिल मिश्रा के समर्थन में कुछ और विधायक आ जाते हैं तो फिर खेल खराब हो सकता है. लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यही है कि कुमार विश्वास क्या इस वक्त पार्टी में अपने अपमान का बदला लेने की कोशिश करेंगे. बीजेपी का कदम भी आप के अंदरूनी समीकरण पर ही निर्भर करेगा.

अगर ऐसा हो गया तो फिर दिल्ली की सियासत में एक बड़ा मोड़ आ सकता है. वरना, दिल्ली में बीस सीटों पर उपचुनाव के लिए तैयार होना पड़ेगा. अगर इन बीस सीटों पर उपचुनाव होता है तो आप के लिए बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि यह सभी सीट उसी की होंगी और हारी हुई एक-एक सीट को अरविंद केजरीवाल की गिरती लोकप्रियता और साख से जोड़कर प्रचारित किया जाएगा.

हालांकि अभी भी यह मामला कानूनी लड़ाई और पचड़े में कुछ दिनों के लिए फंस सकता है. लेकिन, ऑफिस ऑफ प्राफिट के इस मामले में अरविंद केजरीवाल को लगा झटका उनको लंबे वक्त तक याद रहने वाला है. इस फैसले ने केजरीवाल के कदम पर सवाल खड़ा कर दिया है जिससे उबरना इतना आसान नहीं होगा.

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