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1984 Riots: ‘आप’ का कांग्रेस विरोध कहीं 2019 के लिए मोलभाव तो नहीं है?

1984 सिख दंगों को लेकर आम आदमी पार्टी भी कांग्रेस पर हमला कर रही है पर आगामी लोकसभा चुनाव में गठबंधन की संभावनाओं के बीच कुछ गुजाइंश भी बचा कर रखना चाहती है

Updated On: Dec 18, 2018 09:58 PM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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1984 Riots: ‘आप’ का कांग्रेस विरोध कहीं 2019 के लिए मोलभाव तो नहीं है?

दिल्ली हाईकोर्ट ने 1984 सिख दंगा मामले में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार सहित चार लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई है. हाईकोर्ट के इस फैसले ने दिल्ली की राजनीतिक फिजा में एक बार फिर से गर्माहट ला दी है. दिल्ली की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी की तुलना में बीजेपी, कांग्रेस पार्टी पर कुछ ज्यादा ही हमलावर हो गई है. 1984 सिख दंगों को लेकर आम आदमी पार्टी भी कांग्रेस पर हमला कर रही है पर आगामी लोकसभा चुनाव में गठबंधन की संभावनाओं के बीच कुछ गुजाइंश भी बचा कर रखना चाहती है?

2019 लोकसभा चुनाव को देखते हुए जहां कुछ दिनों पहले तक आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की चर्चाएं आम थीं. चर्चाएं हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद कुछ दब सी गई हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वाकई में आम आदमी पार्टी ने सिख दंगे की आड़ में कांग्रेस पार्टी पर सख्त रुख अख्तियार कर लिया है या फिर आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए मोलभाव करने में लग गई है.

पिछले दो दिनों से आम आदमी पार्टी के नेताओं के द्वारा कांग्रेस पार्टी पर हमला तो हो रहा है पर असरदार तरीके से नहीं. ऐसे में जानकारों का मानना है कि दिल्ली में आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए आप की यह एक रणनीतिक चाल है.

आप नेता और पंजाबी अकादमी के उपाध्यक्ष जरनैल सिंह ने मंगलवार को मीडिया से बात करते हुए कहा, ‘कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को बहुत पहले ही सिख दंगों के आरोपी सज्जन कुमार को पार्टी से निकाल देना चाहिए था. सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी को सिख दंगों से जुड़े 232 केसों को दोबारा खोलकर उनकी जांच करनी चाहिए. देश की संसद में इस प्रकार के नरसंहार के खिलाफ एक सख्त कानून बनना चाहिए.’

sajjan kumar

जरनैल सिंह ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा सज्जन कुमार को सजा सुनाए जाने के बाद सज्जन कुमार के इस्तीफे का इंतजार करने की बजाय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को तत्काल सज्जन कुमार को पार्टी से बाहर निकाल देना चाहिए था. यह सोचकर बड़ा दुख होता है कि सिख दंगों में हजारों निर्दोषों की हत्या करने वाले सज्जन कुमार जैसे लोगों को कांग्रेस ने तीन बार सांसद के टिकट से नवाजा. अगर कांग्रेस सच में सिखों के प्रति हमदर्दी का भाव रखती है तो राहुल गांधी को उनकी पार्टी कांग्रेस और उनके नेताओं द्वारा 1984 में किए गए सिख नरसंहार के लिए माफी मांगनी चाहिए.

आम आदमी पार्टी नेताओं का कहना है कि मोदी सरकार को हाईकोर्ट द्वारा दिए गए इस आदेश पर वाहवाही बटोरने की जरूरत नहीं है. हाईकोर्ट के इस फैसले में मोदी सरकार का कोई योगदान नहीं है, क्योंकि कोर्ट में चार्जशीट 2010 में दाखिल की गई थी जबकि मोदी सरकार 2014 में अस्तित्व में आई. सिखों के इस दुख के लिए कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही बराबर के जिम्मेदार हैं. सिख नरसंहार के 26 साल बाद चार्जशीट दाखिल की गई, जबकि इस दौरान केंद्र में एक बार बीजेपी की सरकार भी रही है, परंतु उन्होंने भी सिखों के लिए कुछ नहीं किया.

आम आदमी पार्टी का कहना है कि बीजेपी ने 12 फरवरी 2015 को आनन-फानन में एक एसआईटी का गठन कर दिया जो कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार बनने के 2 दिन पहले बनाई गई. आप का आरोप है कि यह सब एक सोची-समझी साजिश के तहत किया गया, क्योंकि अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के सिख संप्रदाय के लोगों से वादा किया था कि सरकार में आते ही एक स्वतंत्र एसआईटी का गठन करके 1984 के सिख दंगों की जांच करवाएंगे. आप नेताओं का कहना है कि मोदी सरकार द्वारा बनाई गई एसआईटी दरअसल केजरीवाल को 1984 के दंगों की जांच करने से रोकने के लिए आनन-फानन में बनाई गई थी.

आप नेताओं का कहना है कि मोदी सरकार ने भी एसआईटी केस का रिव्यू करने में 2 साल लगा दिए और 2 साल बाद सिख दंगों में दायर किए गए 241 केसों में से 232 केसों को बंद करने की सहमति जताई. जब सुप्रीम कोर्ट ने बंद किए गए इन 232 केसों पर पुनर्विचार करने के लिए एक एसआईटी का गठन किया तो जांच में पता चला कि 232 में से 186 केसों में कुछ किया ही नहीं गया है.

आम आदमी पार्टी का ताजा रुख बताता है कि पार्टी कांग्रेस की तुलना में बीजेपी पर ज्यादा आक्रमक है. आप नेता दिल्ली पुलिस के रवैये को बहाना बना कर केंद्र सरकार पर जोरदार हमला बोल रहे हैं. आप नेताओं का आरोप है कि दिल्ली पुलिस ने केवल अपराधियों को बचाने का काम ही नही किया बल्कि दिल्ली पुलिस के आला अधिकारी खुद सिखों के इस कत्लेआम में बराबर के हिस्सेदार थे.

आप का कहना है कि सिख दंगों में दिल्ली पुलिस की भूमिका की जांच कर रही कुमकुम लता मित्तल कमेटी ने खुद माना है कि सिख दंगों में दिल्ली पुलिस का  पूरा योगदान रहा है. कमेटी की रिपोर्ट में 72 पुलिस वालों का जिक्र किया गया है, जिसमें 6 आईपीएस अधिकारी भी शामिल थे. यह बड़े ही दुख की बात है कि इनमें से किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई, उल्टा 2013 के कोर्ट के ट्रायल में 6 पुलिस वालों ने सज्जन कुमार के समर्थन में बयान दिए. दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश साफ तौर पर कहता है कि इस तरह के अमानवीय कृत्यों के खिलाफ एक कानून बनना चाहिए.

17 दिसंबर 2018 को दिल्ली हाईकोर्ट ने 1984 सिख विरोधी दंगों के मामले में लोअर कोर्ट का फैसला पलटते हुए कांग्रेस नेता सज्जन कुमार सहित चार लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई है. हाईकोर्ट ने सज्जन कुमार पर 5 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है. इसके अलावा हाईकोर्ट ने बलवान खोखर, कैप्टन भागमल और गिरधारी लाल की लोअर कोर्ट द्वारा दी गई उम्र कैद की सजा बरकरार रखी है. हाईकोर्ट ने पूर्व विधायक महेंद्र यादव और किशन खोखर की सजा को भी बढ़ाते हुए 10-10 साल कर दिया है.

कई सिख संगठनों, जांच आयोग की रिपोर्ट्स और गैरआधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली, कानपुर, राउरकेला और देश के अन्य शहरों में दिन दहाड़े 15,000 सिखों की हत्या कर दी गई थी. अकेले दिल्ली में ही दिन दहाड़े 6 से 7 हजार निर्दोष लोगों की हत्या कर दी गई थी. 3200 से अधिक दंगा पीड़ितों के परिजन आज भी इंसाफ की राह देख रहे हैं. इस दंगे से प्रभावित परिवारों की संख्या 8000 से भी ज्यादा है.

Delhi High Court

दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद उम्रकैद की सजा पाने वाले सज्जन कुमार ने कांग्रेस पार्टी की प्राथमिकता सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है. या यूं कहें कांग्रेस पार्टी ने सज्जन कुमार को इस्तीफे देने का दबाव बना कर इस्तीफा ले लिया है. सज्जन कुमार के इस्तीफे के बाद कांग्रेस पार्टी अपनी छवि सुधारने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहता है. आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस पार्टी महागठबंधन की संभावना को कम करना नहीं चाहती है. शायद इसी का नतीजा है कि आम आदमी पार्टी भी कांग्रेस के खिलाफ बोल तो रही है पर इतना गुंजाइश जरूर छोड़ रखी है, जिससे आगामी लोकसभा चुनाव के दौरान कुछ समीकरण बन जाए.

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