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दुनिया के सबसे पुराने गणराज्यों में से एक था वैशाली

फ़ोटो | Manish Shandilya | Jan 26, 2018 05:00 PM IST
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आज भारत अपना 69वां गणतंत्र दिवस मना रहा है. आज ही के दिन भारत 1950 में एक गणराज्य बना. ऐसे में आज के दिन इस बात को याद करना भी रोमांच से भर देता है कि आज के भारत में करीब 2700 साल पहले विश्व के सबसे पहले गणराज्यों में से एक गणराज्य वैशाली में मौजूद था.

आज भारत अपना 69वां गणतंत्र दिवस मना रहा है. आज ही के दिन भारत 1950 में एक गणराज्य बना. ऐसे में आज के दिन इस बात को याद करना भी रोमांच से भर देता है कि आज के भारत में करीब 2700 साल पहले विश्व के सबसे पहले गणराज्यों में से एक गणराज्य वैशाली में मौजूद था.

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बिहार की राजधानी पटना से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर वैशाली स्थित है. यह भगवान बुद्ध के पहले से ही लिच्छवी गणराज्य की राजधानी थी जिसे दुनिया के प्राचीनतम गणराज्य होने का गौरव प्राप्त है. इस गणराज्य का काल खंड सात से छह शताब्दी ईशा पूर्व का है.

बिहार की राजधानी पटना से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर वैशाली स्थित है. यह भगवान बुद्ध के पहले से ही लिच्छवी गणराज्य की राजधानी थी जिसे दुनिया के प्राचीनतम गणराज्य होने का गौरव प्राप्त है. इस गणराज्य का काल खंड सात से छह शताब्दी ईशा पूर्व का है.

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वैशाली के बसाढ़ में राजा विशाल के गढ़ के अवशेष हैं. यह लगभग 480 मीटर लंबा और 230 मीटर चौड़ा है.

वैशाली के बसाढ़ में राजा विशाल के गढ़ के अवशेष हैं. यह लगभग 480 मीटर लंबा और 230 मीटर चौड़ा है.

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वैशाली के ही कोल्हुआ में भी एक अशोक स्तंभ है. स्थानीय लोगों में लाट के नाम से जाने जाने वाला यह स्तंभ बलुआ पत्थर का बना है जो कि करीब 11 मीटर ऊंचा चमकदार स्तंभ है. यह सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए शुरुआती स्तंभों में से एक है जिस पर उनका कोई अभिलेख नहीं है.

वैशाली के ही कोल्हुआ में भी एक अशोक स्तंभ है. स्थानीय लोगों में लाट के नाम से जाने जाने वाला यह स्तंभ बलुआ पत्थर का बना है जो कि करीब 11 मीटर ऊंचा चमकदार स्तंभ है. यह सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए शुरुआती स्तंभों में से एक है जिस पर उनका कोई अभिलेख नहीं है.

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यहां खुदाई में ईशा पूर्व छठी शताब्दी से मुगलकाल तक के साक्ष्य मिले हैं. यहां की सुरक्षा दीवार का निर्माण तीन चरणों, शुंग, कुषाण और गुप्त काल में किए जाने के साक्ष्य मिले हैं.

यहां खुदाई में ईशा पूर्व छठी शताब्दी से मुगलकाल तक के साक्ष्य मिले हैं. यहां की सुरक्षा दीवार का निर्माण तीन चरणों, शुंग, कुषाण और गुप्त काल में किए जाने के साक्ष्य मिले हैं.

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कोल्हुआ में भगवान बुद्ध ने कई वर्ष बिताए थे. यहीं पर उन्होंने पहली बार भिक्षुणियों को संघ में प्रवेश करने की अनुमति प्रदान की. वैशाली की राजनर्तकी आम्रपाली को बुद्ध ने यहीं पर भिक्षुणी बनाया था. कोल्हुआ में ही बुद्ध ने अपने शीघ्र संभावित परिनिर्माण की घोषणा की थी.

कोल्हुआ में भगवान बुद्ध ने कई वर्ष बिताए थे. यहीं पर उन्होंने पहली बार भिक्षुणियों को संघ में प्रवेश करने की अनुमति प्रदान की. वैशाली की राजनर्तकी आम्रपाली को बुद्ध ने यहीं पर भिक्षुणी बनाया था. कोल्हुआ में ही बुद्ध ने अपने शीघ्र संभावित परिनिर्माण की घोषणा की थी.

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वैशाली में बौद्ध रेलिक स्तूप भी है. यह स्तूप भगवान बुद्ध के पार्थिव अवशेषों पर बने आठ मौलिक स्तूपों में से एक है.

वैशाली में बौद्ध रेलिक स्तूप भी है. यह स्तूप भगवान बुद्ध के पार्थिव अवशेषों पर बने आठ मौलिक स्तूपों में से एक है.

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बौद्ध मान्यता के अनुसार बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अस्थि अवशेषों को आठ भागों में बांटा गया जिसमें से एक भाग वैशाली के लिच्छवियों को भी मिला था.

बौद्ध मान्यता के अनुसार बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अस्थि अवशेषों को आठ भागों में बांटा गया जिसमें से एक भाग वैशाली के लिच्छवियों को भी मिला था.

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यह पांचवीं सदी ईशा पूर्व का करीब 8 मीटर व्यास वाला मिट्टी का स्तूप है.

यह पांचवीं सदी ईशा पूर्व का करीब 8 मीटर व्यास वाला मिट्टी का स्तूप है.

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राजा विशाल के गढ़ के अवशेषों से कुछ ही दूरी पर विश्व शांति स्तूप स्थित है. वैशाली स्थित इस विश्व शांति स्तूप का उद्घाटन साल 1996 के 13 अक्टूबर को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने किया था. इस स्तूप को बनने में करीब 13 साल का समय लगा.

राजा विशाल के गढ़ के अवशेषों से कुछ ही दूरी पर विश्व शांति स्तूप स्थित है. वैशाली स्थित इस विश्व शांति स्तूप का उद्घाटन साल 1996 के 13 अक्टूबर को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने किया था. इस स्तूप को बनने में करीब 13 साल का समय लगा.

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