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जन्माष्टमी पर योगी का बयान: सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नीति गर्त में ही ले जाएगी

जन्माष्टमी की बात पर नमाज का जिक्र यूपी की राजनीति को सिर्फ सांप्रदायिक रास्ते पर ही आगे बढ़ाएगा

Updated On: Aug 18, 2017 03:13 PM IST

Nilanjan Mukhopadhyay

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जन्माष्टमी पर योगी का बयान: सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नीति गर्त में ही ले जाएगी

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि वो अगर ईद पर लोगों को सड़क पर नमाज पढ़ने से नहीं रोक सकते, तो, उन्हें थानों में जन्माष्टमी मनाने से रोकने का भी नैतिक और प्रशासनिक अधिकार नहीं है. आदित्यनाथ का ये बयान किसी प्रशासक का नहीं एक बड़बोले नेता का लगता है.

उन्होंने ये बयान लखनऊ में प्रेरणा जनसंचार एवं शोध संस्थान के कार्यक्रम में दिया. उनके इस बयान का कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने तालियां बजाकर स्वागत किया. योगी ने इसके अलावा भी कई ऐसे ही बयान दिए. लेकिन योगी आदित्यनाथ ये भूल गए कि सड़क आम लोगों के इस्तेमाल की चीज है. वहीं पुलिस स्टेशन सरकारी संपत्ति है.

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रायटर इमेज

मस्जिद में जगह न होने पर लोगों का सड़क पर नमाज पढ़ना अलग बात है. वहीं, पुलिस थानों में जन्माष्टमी मनाया जाना अलग बात है. थाने में जन्माष्टमी मनाना संविधान के खिलाफ है. क्योंकि संविधान में लिखा है कि सरकार धर्मनिरपेक्ष है. ऐसे में उन थानों में किसी एक धर्म का त्योहार कैसे मनाया जा सकता है? आखिर पुलिस पर ही तो संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी है.

उत्तर प्रदेश के पुलिस थानों में जन्माष्टमी मनाने को हरी झंडी देकर योगी आदित्यनाथ ने राज्य के अल्पसंख्यकों को ठेंगा दिखाया है. योगी ने उन लोगों को भी चिढ़ाया है जो उनकी सरकार का समर्थन नहीं करते है. मुख्यमंत्री ने आदेश दिया था कि राज्य के तमाम थानों में भव्य तरीके से जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाए. योगी ने अल्पसंख्यकों के किसी त्योहार को लेकर तो ऐसा आदेश नहीं दिया. साफ है कि वो बहुसंख्यक समुदाय का पक्ष लेते हैं और अल्पसंख्यकों से पक्षपात करते हैं.

यूपी के पुलिस महानिदेशक सुलखान सिंह ने निर्देश जारी किया था कि सभी पुलिस थानों में जन्माष्टमी का त्योहार धूमधाम से मनाया जाए. सुलखान सिंह के इस फरमान को जायज ठहराने के साथ-साथ योगी ने कई और बातें भी कहीं. उन्होंने ये भी बताया कि क्यों उन्होंने अधिकारियों के सुझाव की अनदेखी करके कांवड़ यात्रा पर कोई पाबंदी लगाने से इनकार कर दिया.

अधिकारियों ने सहारनपुर में हिंसा को देखते हुए कहा था कि कांवड़ यात्रा पर कुछ पाबंदियां लगा दी जाएं, ताकि माहौल न बिगड़े. इसमें लाउडस्पीकर, डीजे और शोर मचाने वाले म्यूजिक सिस्टम पर पाबंदी के सुझाव प्रमुख थे.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

मई महीने में सहारनपुर में हिंसा भड़क उठी थी. तब राजपूत समुदाय के युवा तेज आवाज में संगीत बजाते हुए दलितों की बस्ती से गुजर रहे थे. दलितों ने ये कहकर इस पर ऐतराज जताया था कि ये उनकी भावनाओं के खिलाफ है. ऐसे माहौल में भी योगी आदित्यनाथ की सरकार ने कांवड़ियों के शोर मचाने पर पाबंदी लगाने से इनकार कर दिया.अधिकारियों को उन्होंने निर्देश दिया कि कांवड़ यात्रा को पूरी भव्यता के साथ होने दिया जाए.

योगी आदित्यनाथ ने कार्यक्रम में कहा कि, 'मैंने अधिकारियों से पूछा कि ये कांवड़ यात्रा है या शव यात्रा. यात्रा के दौरान अगर वो संगीत नहीं बजाएंगे, ड्रम नहीं बजाएंगे, डमरू नहीं बजाएंगे, चिमटा नहीं बजाएंगे. नाचेंगे-गाएंगे नहीं. माइक का इस्तेमाल नहीं करेंगे, तो ये कांवड़ यात्रा कैसे होगी. इसीलिए मैंने ऐलान किया कि कांवड़ यात्रा के दौरान यूपी में किसी तरह की पाबंदी नहीं लगेगी'.

साफ है कि योगी आदित्यनाथ से लिए अमन और सौहार्द से ज्यादा सांप्रदायिक पहचान की अहमियत है. उन्होंने एक बार फिर मस्जिदों में अजान के लिए लाउडस्पीकर इस्तेमाल होने की तुलना कांवड़ यात्रा में लाउडस्पीकर इस्तेमाल होने से करके पुराना सांप्रदायिक कार्ड खेला है. योगी आदित्यनाथ को याद नहीं रहा कि बरसों से गुरुद्वारों और मंदिरों में भी धार्मिक संगीत को लाउडस्पीकर पर बजाया जाता रहा है. त्योहारों के दौरान मंत्रोच्चार का लाउडस्पीकर से प्रसारण होता रहा है.

मौजूदा सरकार से फायदा लेने की जुगत में हो सकता है कि कुछ लोग ऐसे भड़काऊ बयान देते हों. ये जायज तो नहीं पर फिर भी इसे समझा जा सकता है. चुनाव प्रचार के दौरान भी ऐसे भड़काऊ बयान को समझा जा सकता है. मगर एक राज्य का मुख्यमंत्री ऐसा बयान दे तो लगता है कि वो प्रचार अभियान के मोड से बाहर नहीं आया. वो अभी भी सरकार चलाने की जिम्मेदारी नहीं समझ रहा है.

योगी आदित्यनाथ कांवड़ यात्रा जैसे निजी धार्मिक अभियान को समर्थन देकर बहुसंख्यक समुदाय की दादागीरी को ही बढ़ावा दे रहे हैं. मुख्यमंत्री को याद रखना चाहिए कि अक्सर सांप्रदायिक दंगे ऐसी ही यात्राओं के दौरान भड़क उठते हैं.

RSS Volunteers Organise Shakha In Varanasi

1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना भी ऐसे ही फसाद के बाद हुई थी. नागपुर में उस साल हिंदुओं के जुलूस के मुस्लिम बहुल इलाके से गुजरते वक्त दंगा भड़क उठा था. इसी के बाद आरएसएस की स्थापना हुई.

योगी आदित्यनाथ के बयान से साफ है कि वो अब तक चुनाव प्रचार के आक्रामक दौर से बाहर नहीं निकल पाए हैं. उनके बार-बार दिए जा रहे ऐसे भड़काऊ बयानों से साफ है कि वो समाज में तनातनी का माहौल बनाए रखना चाहते हैं. इस वक्त जब उनका शहर गोरखपुर सेहत के भयंकर संकट से गुजर रहा है, तो उस पर ध्यान देने के बजाय वो भड़काऊ बयान दे रहे हैं. साफ है कि वो असल मुद्दों को दबाकर रखना चाहते हैं.

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योगी आदित्यनाथ को बाकी उम्मीदवारों पर तरजीह देकर मुख्यमंत्री बनाया था, तो उन्होंने अपनी ही नीति से किनारा किया था. 2014 में पीएम बनने के बाद बीजेपी ने जितने भी राज्यों में चुनाव जीते, वहां मोदी ने कम चर्चित नेताओं को ही मुख्यमंत्री बनाया था. योगी के मामले में उन्होंने अपनी इस नीति के उलट फैसला किया.

मार्च में मुख्यमंत्री बनने तक योगी की पहचान एक भड़काऊ भाषण देने वाले नेता की ही रही थी. जब वो मुख्यमंत्री बने थे तो मैंने फ़र्स्टपोस्ट में ही अपने लेख में ये कहा था कि योगी को मोदी से सीख लेनी चाहिए. उनके हाथ ये सुनहरा मौका लगा है कि वो अपनी नई पहचान बनाएं. वो हिंदूवादी नेता के बजाय अच्छे प्रशासक की छवि बना सकते हैं.

योगी जिस वक्त मुख्यमंत्री बने उस वक्त हालात ठीक वैसे ही थे जैसे 2002 के दंगों के बाद मोदी के सामने थे. मोदी को अंदाजा हो चुका था कि वो हिंदुत्व की राजनीति के सहारे बहुत आगे नहीं बढ़ सकते. इसलिए उन्होंने इमेज मेकओवर की कोशिश की और खुद को जनता के सामने विकास पुरुष के तौर पर पेश किया.

2002 के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मोदी ने आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति को दफन कर दिया. लेकिन योगी आदित्यनाथ ऐसा करने को तैयार नहीं दिखते. उन्होंने बहुत से लोगों की उम्मीदें तोड़ी हैं. यूपी में धार्मिक ध्रुवीकरण के जरिए बीजेपी को भारी जीत हासिल हुई थी. लेकिन लोगों को ये भी उम्मीद थी कि जैसा मोदी ने वादा किया था वैसा योगी की सरकार करेगी. वो यूपी के विकास के लिए काम करेगी.

Yogi Adityanath

लोगों की उम्मीदें पूरी करने के बजाय योगी आदित्यनाथ अभी भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और तुष्टीकरण की राजनीति ही कर रहे हैं. मोदी को योगी से ये उम्मीद तो होगी ही कि वो सरकार चलाने की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पर ध्यान देंगे. भले ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भी बीजेपी के एजेंडे में हो. लेकिन सिर्फ इसी रास्ते पर चलकर योगी आदित्यनाथ अपने लिए ही मुश्किलें खड़ी करेंगे, किसी और के लिए नहीं.

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