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मुक्तिवाद! गड्ढों का गला मत घोंटिए सरकार

गड्ढे अब कुरूपता के परिचायक नहीं, विकास के जनसुलभ और सहज मानक के प्रतिरूप हो गए हैं

Shivaji Rai Updated On: Apr 24, 2017 06:49 PM IST

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मुक्तिवाद! गड्ढों का गला मत घोंटिए सरकार

उत्तर प्रदेश का शासन तंत्र 'मुक्तिवाद' की राह पर चल पड़ा है. भ्रष्‍टाचार मुक्‍त, कुपोषण मुक्‍त, अपराध मुक्‍त जैसे जुमले यत्र-सर्वत्र सुनाई दे रहे हैं. इन मुक्‍त कदमों की मुक्‍त कंठ से प्रशंसा भी हो रही है.

प्रशासनिक अधिकारी भी खुद को गुट और दल से मुक्त बताते हुए पूरे मनोयोग से सीएम योगी के मुक्‍तक गा रहे हैं. पर गड्ढा मुक्‍त सड़कों के फरमान से सभी गमजदा हैं.

समझ नहीं पा रहे हैं कि सड़कों के गड्ढे अगर भर गए तो फिर सरकार और सत्‍ताधारी दल के गड्ढों का क्‍या होगा. उन कागजी नावों का क्‍या होगा जो हर बरसात के बाद जनहित के नाम पर सरकारी फाइलों में चलती हैं और पेचवर्क के नाम पर तिजोरियां भरती हैं.

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गड्ढों को मिल चुकी सामाजिक स्‍वीकृति

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जनता का तो कभी इन गड्ढों से परहेज नहीं रहा. वह तो इन गड्ढों को सामाजिक‍ स्‍वीकृति दे चुकी है. सूबे की जनता बिना हीला-हवाली के खुद को गड्ढों के हवाले कर चुकी है. जैसे देश हवाला के हवाले है. गड्ढों के प्रति जनता का नजरिया सकारात्‍मक हो चुका है.

गड्ढे अब कुरूपता के परिचायक नहीं, विकास के जनसुलभ और सहज मानक के प्रतिरूप हो गए हैं. जो आम आदमी को बिना गुणा-गणित के विकास का अर्थशास्‍त्र बड़ी सहजता से समझा देते हैं. वैसे भी यूपी में गड्ढा सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं है.

यहां गड्ढों का क्षेत्र बहुआयामी और व्‍यापक है. राजनीतिक और प्रशासकीय हर क्षेत्र में गड्ढे पाए जाते हैं. ये कहना गलत नहीं होगा कि इन गड्ढों के आगे सड़क के गड्ढों की कोई बिसात भी नहीं होती.

कुछ विभागों में तो चेचक की तरह पूरे चेहरे पर गड्ढे ही गड्ढे दिखते हैं. कई विभागों में तो गड्ढा संस्‍कृति गाजर घास की तरह हो गई है. लिहाजा गड्ढे ज्‍यादा और सड़कें कम दिखने पर भी न जनता अचंभित होती है न नेता शर्म के मारे दांतों तले अंगुली काटता है.

फिर पता नहीं क्‍यों सीएम योगीजी गड्ढों को लेकर इतने संवेदनशील क्‍यों हो गए हैं. गड्ढे कहां नहीं पाए जाते. चंद्रमा से लेकर मंगल ग्रह तक हर जगह गड्ढे पाए जाते हैं.

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गड्ढे समृद्ध‍ि के प्रतीक बन चुके हैं

साइबेरिया में तो गड्ढे समृद्ध‍ि के प्रतीक बन चुके हैं. मिरमाइन इलाके में बने विशालकाय गड्ढे का तो नाम बकायदा 'डायमंड सिटी' रखा गया है.

वैसे भी सड़क का गड्ढा कोई फिल्‍मी हीरोइन के आंख के नीचे पड़ रहा काला गड्ढा थोड़े ही है जो ढलती जवानी को दर्शा रहा है. यह गड्ढा तो हेमामालिनी के गालों पर उभरे डिंपल के जैसा है. जिसे देख कभी लालू यादव फिसल गए थे और उसी तरह की सड़कें बनाने का सपना पाल बैठे थे.

लोकतांत्रिक गड्ढों से सड़कों का सौंदर्य ही बढ़ता है. तभी तो अल्‍पसंख्‍यक श्रेणी में होते हुए भी गड्ढे बहुसंख्‍यक सड़कों पर भारी पड़ते हैं. गड्ढे खोदना हमारी सभ्यता का प्रतीक है. मिली भगत से खोदे गए गड्ढे हमेशा ही लाभदायक सिद्ध हुए हैं.

गड्ढा भरना कभी इंसानी फितरत नहीं रहा. आदिकाल से दूसरों की राह में गड्ढा खोदना ही इंसान की फितरत रही है. जनता भी जानती है कि सड़कें बनती ही हैं बारिश में बहने के लिए. कागजी नाव चलाने के लिए. पेचवर्क से क्रमिक पूर्णता पाने के लिए.

अगर सड़कों पर गड्ढे ही नहीं रहे तो पीडब्लूडी का औचित्य क्‍या रह जाएगा. सच कहें तो सत्‍ताधारियों के पेट व पेट की जेब के उन्‍नति में सड़क के गड्ढों का बहुत योगदान है.

योगीजी को गड्ढों का सृजनात्‍मक पक्ष पर भी गौर करना चाहिए. सड़कों के गड्ढे अल्‍पकालिक शिक्षक की तरह जीवन का पाठ सहज पढ़ा देते हैं. ये सजगतापूर्वक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं.

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गड्ढों ने तो हमें संभल कर चलना सिखाया है

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गड्ढों से बच-बचाकर चलने वाले जीवन में विकटताओं से बचकर निकलने का सबक स्‍वतः ही सीख लेते हैं. इन गड्ढों के बीच चलना और वाहन चलाना किसी कला से कम नहीं है.

यह वाहन चालक के प्रयोगधर्मी कलाधर्म को प्रदर्शित करता है. कुछ वाहन चालक तो गड्ढों के बीच वाहन ऐसे चलाते हैं जैसे मकबूल फिदा हुसैन ब्रश से कैनवास पर टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से गजगामिनी को उकेर रहे हों.

पाकिस्‍तान के कराची के रहने वाले चित्रकार आलमगीर खान तो बकायदा सड़कों पर बने गड्ढों के आसपास ही चित्र उकेरते हैं. बकौल आलमगीर गड्ढे दुनिया की सबसे खूबसूरत कृति है.

गड्ढों के बीच चलता हुआ शख्‍स विज्ञान के कई जटिल सिद्यांतों को बड़ी सहजता से व्‍यावहारिक जीवन में उतार लेता है. इन गड्ढों की वजह से कभी गुरुत्‍वाकर्षण, तो कभी गति के सिद्यांत से रूबरू होता है. क्रिया-प्रतिक्रिया के ज्ञान में तो खुद न्‍यूटन न्‍यून पड़ जाएं.

पग-पग पर अवतरित होने वाले गड्ढे किसी भौगोलिय चुनौती से कम नहीं होते. इन चुनौतियों के बीच सड़कों पर चलने के लिए रोज नए आविष्‍कार ईजाद करने होते हैं. लेकिन इसका मतलब कतई नहीं कि गड्ढों ने भ्रष्‍टाचार की तरह लोगों की रफ्तार रोक ली है. लोग इतने सिद्धहस्‍त हो गए हैं कि गड्ढों से भरी सड़कों पर भी स्‍कूटर ऐसे चलाते हैं जैसे दिल्‍ली की सड़कों पर ब्‍लूलाइन.

अवधू गुरू तो योगीजी के गड्ढा भरने के फरमान से काफी दुखी हैं. बीते दिनों की घटनाओं को याद कर सेंटी हो रहे हैं. न जाने कितनी बार इन गड्ढों ने उनके दिल-दिमाग को रंगीन किया. गड्ढों की वजह से हिचकोले खाती बसों में न जाने कितनी बार कमसिन हसीनाओं के बदन से टकराने का सौभाग्‍य प्राप्‍त हुआ.

इन दचकों ने कई बार मन की मुराद बिना हरे-फिटकरी के पूरी की. लंबी यात्रा से कमर में दर्द भले उभर आया लेकिन दिल की कसक मिट गई. खुद श्रीमतिजी के स्‍पर्श का पहला सुख भी इन गड्ढों की वजह से रोडवेज बस में मिला था.

अवधू गुरू समझ नहीं पा रहे हैं कि योगीजी को वोट देकर सही किया या गलत. मन ही मन सोच रहे हैं कि किसी ने सच ही कहा है कि. 'आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूंक'

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