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यूपी में अधिकारियों को अर्दली बनाने की कोशिश जारी है

यूपी सरकार का नया आदेश अधिकारियों के मनोबल को तोड़ने वाला है. जनप्रतिनिधियों के सामने उठकर सलाम करने का आदेश ब्यूरोक्रेसी के राजनीतिकरण और हवा ही देगा

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Oct 21, 2017 02:25 PM IST

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यूपी में अधिकारियों को अर्दली बनाने की कोशिश जारी है

बीते मई महीने में यूपी गोरखपुर के विधायक राधामोहन अग्रवाल ने पुलिस अधिकारी चारू निगम को सार्वजनिक रूप सें डांट दिया था. यकबयक आए इस रिएक्शन की वजह से चारू की आंखों से आंसू बाहर आ गए. पूरा मामला सार्वजनिक था इसलिए थोड़ी ही देर बाद घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. खबरें बनने लगीं. राधामोहन पर एक ऑन ड्यूटी ऑफिसर के साथ बदतमीजी की क्या कार्रवाई हुई पता नहीं चल पाया.

ये तो हुई एक बात. अभी ज्यादा समय नहीं बीता जब समाजवादी पार्टी की सरकार थी. एक सीनियर आईपीएस अधिकारी को तत्कालीन एसपी मुखिया मुलायम सिंह यादव द्वारा धमकाए जाने का ऑडियो अभी सार्वजनिक तौर पर मौजूद है. अधिकारी एक तरफ से जी सर जी सर कर रहा था और दूसरी तरफ से मुलायम सिंह यादव उसे धमकाए जा रहे थे.

ऊपर के दोनों घटनाएं महज बानगी हैं. उत्तर प्रदेश का राजनीतिक इतिहास जानने वाले ये अच्छी तरह से जानते हैं कि अधिकारियों और नेताओं के बीच का क्या संबंध होता है? सत्ता में मौजूद जनप्रतिनिधि अधिकारियों को किस तरह ट्रीट करते हैं, ये कोई दबी-छिपी बात नहीं है.

अब यूपी सरकार का नया निर्देश आया है कि जनप्रतिनिधि अगर किसी अधिकारी से मिलने जाता है तो वह उसके दाखिल होने पर खड़ा हो और जाने पर भी. इस निर्देश की मूलभावना ये बताई गई है कि अधिकारी जनप्रितिनिधियों का सम्मान करें. बेहतर होता कि सीएम योगी अपने फरमान में उस घटना का जिक्र भी कर देते जिसमें किसी अधिकारी मंत्री, विधायक या सांसद की बात न सुनी हो क्योंकि सामान्य रूप से तो यही देखने में आता है कि नेताओं की बात सबसे पहले सुनी जाती है.

भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने देश की ब्यूरोक्रेसी को 'स्टील फ्रेम' करार दिया था. उनका मानना था कि देश के उत्तरोत्तर विकास में अराजनीतिक ब्यूरोक्रेसी का बहुत बड़ा योगदान है. अराजनीतिक इसलिए क्योंकि अगर ब्यूरोक्रेसी का राजनीतिकरण होता जाएगा तो वो स्टील फ्रेम लचीला होता जाएगा. जिसके भरोसे ये उम्मीद की जा रही थी कि देश में अहम रोल अदा करेगा.

हमारे सामने पहले से ब्यूरोक्रेसी के कोई बहुत अच्छे उदाहरण मौजूद नहीं हैं. सरदार पटेल के समय से लेकर अभी तक हमारे समाज में कई बड़े बदलाव आ चुके हैं. अब अधिकारियों के सामने नेताओं के कई तरह के प्रेशर ग्रुप भी होते हैं. इसके अलावा आर्थिकी का महत्व सबसे ज्यादा हो जाने के कारण अब समाज के हाशिये पर पड़े लोगों का भी अधिकारियों को बेहद ध्यान रखना होता है. सोशल मीडिया वायरल की मौजूदगी जरा सी बात को भी तूल दे सकने में सक्षम है.

साक्षरों की संख्या बढ़ने की वजह से अपने अधिकारों को लेकर लोग भी ज्यादा सहज हो गए हैं. ऐसे में एक अधिकारी को कई स्तरों पर खुद में सुधार करने की जरूरत होती है. ऐसे में योगी सरकार का ये फरमान उसे एक टीम लीडर और बेहतर कनेक्शन स्थापित कर सकने वाले की बजाए एक फरमान वाले अर्दली के रूप में ज्यादा विकसित करेगा.

उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझने वाले ये जानते हैं कि वहां आखिरी बार अगर ये सुना गया किसी अधिकारी का दबदबा रहा है तो राजनाथ सिंह की बीजेपी सरकार ही याद आती है. इसके खुद पीएम मोदी के बारे में कहा जाता है कि गुजरात का मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्होंने अधिकारियों पर खूब भरोसा दिखाया. ठीक ऐसा ही बिहार में बीजेपी की नीतीश कुमार के साथ गठबंधन वाली सरकार के बारे में कहा जाता है कि अधिकारियों को फ्री हैंड देने का ही नतीजा था कि राज्य में अपराध को बेहद कम किया जा सका.

Yogi Adityanath

लेकिन शायद योगी आदित्यनाथ के लिए अपनी ही पार्टी की इन सरकारों सीख लेने जैसी कोई बात मौजूद नहीं है क्योंकि उन्हें शायद ऐसी सरकार नहीं चलानी जिसमें अधिकारियों का सहयोग हो. वो अपने एक निर्णय से सामंतवाद को पुन: जीवित करना चाहते हैं. जिससे अधिकारी सिर्फ सिर झुकाए दिखाई दें.

दूसरी एक बात यह भी है कि जिले में डीएम और एसएसपी सिर्फ एक ही होते हैं और माननीयों की संख्या ज्यादा. ऐसे में नेताओं की जी हुजूरी करने के चक्कर में ये अधिकारी अपने रोजमर्रा का कामकाज भी पूरी तरह से कर पाएं, ये भी इस आदेश के बाद काफी मुश्किल होगा. क्योंकि जनप्रतिनिधि सामान्य तौर पर अपने इलाके की कई छोटी-मोटी समस्याओं के पुलिस और दूसरे अधिकारियों को फोन करते हैं.

यूपी में आजम खान की भैंस ढूंढने का मामला तो लोगों के जेहन में बिल्कुल ताजा है. इसके अलावा सिर्फ हफ्तेभर हुए होंगे जब दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की कार सिर्फ दो दिनों के भीतर बरामद हो गई, जबकि आम आदमी को इसी के लिए न जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं.

योगी सरकार द्वारा दिए गए सरकारी निर्देश में इस बात का भी जिक्र है कि नेताओं ने कई बार ऐसी शिकायत की थी कि अधिकारी उनकी बात को ज्यादा तवज्जो नहीं देते हैं. शायद सीएम योगी को अपने नेताओं की बात सुनकर वो प्रकरण याद आ गया होगा जब एक बार गोरखपुर के डीएम ने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया था. तब योगी गोरखपुर के सांसद हुआ करते थे और मामला प्रदेश स्तर पर सुर्खियों में आया था.

dr hari om

गोरखपुर के तत्कालीन डीएम डॉ. हरिओम

2007 में गोरखपुर में सांप्रदायिक तनाव था. योगी आदित्यनाथ तनावग्रस्त इलाके में धरना देने जा रहे थे. जिले के डीएम डॉ. हरिओम ने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया था. तब यूपी में मायावती की सरकार थी और योगी 11 दिनों तक जेल में थे. कहा जाता है कि इसी वजह से योगी आदित्याथ संसद में रोए भी थे, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल रहता है और रह-रह कर सामने आता है.

अब सरकार का हालिया निर्णय दिखाता है यूपी में आगामी सालों में योगी के नेताओं के सामने अधिकारी बात कह-सुन सकने की स्थिति में नहीं रहेंगे. सरदार वल्लभ भाई पटेल का स्टील फ्रेम अब पिघल चुका है. उसका राजनीतिक इस्तेमाल होता रहा है. यूपी में अब आगे और भयावह स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए.

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