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रजिया की तरह गुंडों में मत फंसिए ‘सरकार’

सीएम योगी ने गुंडों को यूपी से ही दूर रहने की हिदायत दे डाली है

Shivaji Rai Updated On: Apr 11, 2017 12:35 PM IST

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रजिया की तरह गुंडों में मत फंसिए ‘सरकार’

उत्तर प्रदेश का पूरा शासन तंत्र आजकल 'वैराग्‍य मोड' पर है. योगीजी के सीएम बनते ही विभाग दर विभाग विरक्ति के आदेश जारी हो रहे हैं. कोई गोमांस से दूर रहने की, तो कोई रोमांस से दूर रहने की हिदायत दे रहा है. कोई नेताओं को सरकारी ठेकों से. तो कोई छात्रों को नकल से दूर रहने को कह रहा है.

आए दिन जारी हो रही हिदायतों से जीत का रोमांच मिट्टी में मिल रहा है. सबसे परेशानी में तो 'गुंडे' आ पड़े हैं... जिन्‍हें सीएम योगी ने यूपी से ही दूर रहने की हिदायत दे डाली है.

उन्‍हें समझ नहीं आ रहा है कि योगीजी की सरकार में किस किस चीज से विरक्ति लें. कुछ तो अचेतन की दशा में आ चुके हैं. अब तक सरकार बदलते ही अपना रुख बदलकर सरकार की गुडबुक में आ जाते थे. पार्टी के शुद्ध‍ीकरण संस्‍कार से गुजरकर माननीय तक बन जाते थे. लेकिन इस बार तो योगी सरकार अवैध बूचड़खानों की तरह गुंडई के कुटीर उद्योग को ही खत्‍म करने पर तुली है.

कानून-व्‍यवस्‍था का हवाला देकर फलफूल रहे रोजगार को मिटाने में लगी है. राजनीतिक पंडित भी इसे गलत मान रहे हैं. उनका भी कहना है कि जब गुंडों के बीच रजिया नहीं फंसना चाहती तो उसमें योगीजी का पैर फंसाना किसी भी लिहाज से ठीक नहीं है.

गुंडा है तो क्या हुआ

उत्तर प्रदेश में गुंडा शब्‍द कभी घृणा का पर्याय नहीं रहा है. यहां तो यह माननीय बनने का शुरुआती पायदान सा रहा है. मुख्‍तार, अतीक, ब्रजेश, अमरमणि और राजा भैया जैसे ना जाने कितने स्‍वनाम धन्‍य माननीय कल तक 'गुंडे' ही तो कहे जाते थे. वैसे भी तो नाम वाले पहले बदनाम ही तो रहे हैं.

बात अगर गुंडे की ही है तो वह किसके साथ नहीं जुड़ा. नेतागण तो आए दिन एकदूसरे को गुंडा शब्‍द से नवाजते रहे हैं. आजम खान और अबू आजमी ने अमित शाह को गुंडा कहा. तो बेनी प्रसाद ने तो मुलायम और पीएम मोदी को, . फिल्‍म निर्देशक शिरीष कुंदर ने तो खुद सीएम योगी को ही गुंडा कह डाला था. लेकिन कहने सुनने से अपराध थोड़े ही सिद्ध हो जाता है. हुकूमत जिसे गुंडा कहती है. लोकतंत्र की हिमायती जनता उसे ही सिर आंखों पर बैठाती है.

पिछले चुनाव पर ही नजर दौड़ाए तो, मणिपुर की शर्मिला इरोम 90 वोट पर ही सिमट गईं और मुख्‍तार अंसारी ने 90 हजार से अधिक वोट हासिल कर लिए. इसे सामाजिक स्‍वीकृति नहीं तो क्‍या कहेंगे. जिस राजा भैया को पूर्व सीएम कल्‍याण सिंह ने 'कुंडा का गुंडा' कहा,. उसी राजा भैया के बाहुबल को देखते हुए उन्‍हीं की बीजेपी ने अपने कैबिनेट में मंत्री पद दे डाला.

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हाल के दौर में तो खुद को गुंडा कहने का प्रचलन सा चल पड़ा है. क्‍या आम, क्‍या खास सभी अपनी छवि को दमदार बताने के लिए खुद को गुंडा कह रहे हैं. कुछ दिन पहले जस्टिस मार्केंडेय काटजू ने खुद को इलाहाबादी गुंडा कहा था. तो एमपी के बीजेपी के पूर्व मंत्री अनूप सिंह ने खुद को खादी वाला गुंडा बताया था.

गुंडे केवल गुंडे नहीं हैं

साहित्‍य की नजर में भी गुंडा नकारात्‍मक नहीं रहा है. कथाकर जयशंकर प्रसाद का 'गुंडा' तो राष्‍ट्रवाद का प्रतीक था. उनके 'गुंडा' को जिसने भी पढ़ा वह राष्‍ट्रीय भावना और देश प्रेम से भर गया. यूपी में तो आदिकाल से गुंडई पुरातन और स्‍वस्‍थ परंपरा रही है. यूपी में तो गुंडई यह एक उपासना जैसी रही है..जिसमें विनम्रता थी, तपस्‍या थी,. जिसमें संस्‍कार था, सत्‍यवादिता थी..जो फक्‍कड़ होता था, जो अलमस्‍त होता था. जो विनयी था, धार्मिक और सहृदयी था. .जो सिर्फ शरीर सौष्‍ठव का प्रदर्शन करता था. लेकिन 'वर्दी वाले गुंडे' की तरह हफ्ता वसूली नहीं करता था. जो किसी आसाराम की तरह किसी के आस्‍था से नहीं खेलता था. जो पैसा लेकर किसी बेगुनाह को हवालात में नहीं डालता था.

वैसे भी सोशल मीडिया के दौर में ऑनलाइन गुंडागर्दी का दौर शुरू हो चुका है. अब सरेराह नहीं, सोशल साइट्स पर लोगों का चरित्र हनन हो र‍हा है. अब 'गुंडों' का नया नामकरण 'ट्रोल' हो गया है. जो विरोध और असहमति को दबाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. जो बगैर सामने आए हफ्ता वसूली कर सकता है. जो इज्‍जत तार-तार कर सकता है.

लिहाजा योगीजी हाशिए पर पड़े इन निरीह गुंडों को समाज की मुख्‍यधारा में लाइए. राज्‍यबदर नहीं, पार्टी में जगह दिलाइए. सबके साथ उनका भी विकास कराइए. फिर आपको भी 2019 की चिंता में रात-रात भर जागना नहीं पड़ेगा.

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