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बजट 2017: कैसे करेगा आपकी जेब हल्की?

कम उत्पाद शुल्क वाले उत्पादों को अधिक उत्पाद शुल्क के कैटेगरी डाल कर फाइनेंस मिनिस्टर हाथ की सफाई दिखा सकते हैं.

Updated On: Jan 17, 2017 09:06 PM IST

Rajesh Raparia Rajesh Raparia
वरिष्ठ पत्र​कार और आर्थिक मामलों के जानकार

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बजट 2017: कैसे करेगा आपकी जेब हल्की?

ज्योतिष की भाषा में कहें, तो साल 2017 उपभोक्ताओं पर विशेष भारी पड़नेवाला है, क्योंकि कुंडली में जीएसटी गुड्स और सर्विस टैक्स नाम का कालसर्प योग बन रहा है. सितंबर से यह योग अपना रंग दिखा सकता है. पर इससे  फाइनेंस मिनिस्टर अरुण जेटली का बना बनाया गणित गड़बड़ा गया है.

जीएसटी 1 अप्रैल 2017 से लागू होना था पर अब यह 1 जुलाई से लागू होने वाला है. उम्मीद जताई गई है कि जीएसटी लागू होने से सरकार का कर राजस्व दो-तीन लाख करोड़ रुपए से बढ़ जाएगा.

अब फाइनेंस मिनिस्टर की दुविधा यह है कि वित्त वर्ष के शुरू के पांच महीनों में सकल टैक्स रेवेन्यू कैसे बढ़ाया जाए क्योंकि आय कर में छूट देने के संकेत वित्त मंत्री साफ दे चुके हैं.

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फाइनेंस मिनिस्टर का संकट यह भी है कि पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों के ऐन पहले पेश होने वाले बजट में प्रधानमंत्री मोदी की गरीबों के मसीहा वाली छवि गढ़ने के लिए हर संभव कोशिश वित्त मंत्री को करनी है.

इसके लिए बजट में नये लोक लुभावन प्रस्तावों की घोषणाओं को तय माना जा रहा है. इसके लिए भारी भरकम फंड की जरूरत बजट में पड़ेगी. इस वजह से बजट में अधिकाधिक फंड जुटाना उनके लिए जरूरी हो गया है.

सिन टैक्स से पुण्य कमाई

फाइनेंस मिनिस्टर कोई भी ऐसा काम करने से हिचकेंगे जिससे मतदाता बिदक जाए. इस वजह से सर्विस टैक्स से छेड़छाड़ करना उनके लिए मुनासिब नहीं है, क्योंकि इसका असर देश के हर निवासी पर पड़ता है.

consumers wallet

कुल मिलाकर उत्पाद शुल्क से ही ज्यादा टैक्स रेवेन्यू उगाहने की कोशिश फाइनेंस मिनिस्टर कर सकते हैं, क्योंकि इसका असर सर्विस टैक्स जैसा सर्वव्यापी नहीं है. इसके लिए सिन टैक्स (पाप टैक्स) का आसान विकल्प उनके पास है.

सरकार जिन वस्तुओं के उपभोग को समाज के लिए हानिकारक मानती है उन पर लगे उत्पाद शुल्क को सिन टैक्स कहते हैं, जैसे तंबाकू, अल्कोहल, कैंडीज, मादर्क द्रव्य, साफ्ट ड्रिक्स (पेय जैसे कोला कोला, पेप्सी आदि) कॉफी, फास्ट फूड आदि. पर यह हानिकारक वस्तुएं सरकार के लिए कामधेनु गाय हैं.

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किसी भी सरकार को इन वस्तुओं पर उत्पाद शुल्क बढ़ाने में कोई संकोच नहीं होता है. जीएसटी में ऐसे पदार्थों पर सर्वाधिक टैक्स लगाने का प्रावधान है.

सबसे पहले सिगरेट को लेते हैं. पिछले बजट में सिगरेटों पर मामूली टैक्स बढ़ोतरी हुई थी, जो पिछले पांच सालों की सबसे कम टैक्स बढ़ोतरी है. वैसे पिछले 10 सालों में सिगरेट से मिलने वाले राजस्व में 300-400% की वृद्दि हुई है.

सिगरेट खपत से सरकारों को तकरीबन 31 हजार करोड़ रुपये का राजस्व सालाना मिलता है. कुल तंबाकू उपभोग में सिगरेटों की हिस्सेदारी 11% है लेकिन तंबाकू से मिलने वाले राजस्व में सिगरेटों का योगदान 87% है.

बीडी को गरीबों का मान कर इस पर टैक्स बढ़ोतरी करने से प्राय: सरकार बचती है. बीड़ी का इस्तेमाल देश में सिगरेट के इस्तेमाल से कई गुना ज्यादा है. महंगाई के समायोजन के बाद बीड़ी पर उत्पाद शुल्क पिछले दस सालों में 20% कम हुआ. समाज हित के नाम पर वित्त मंत्री सिगरेट, बीड़ी, गुटखा पान मसाले पर उत्पाद शुल्क बढ़ा सकते है, क्योंकि इन मदों में कर वृद्वि का दायरा बढ़ा है.

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कोका, पेप्सी जैसे पेय भी फाइनेंस मिनिस्टर के निशाने पर आ सकते हैं. इन पर पिछले बजट में उत्पाद शुल्क 18 से फीसदी से 21% किया गया था. सरकार इन पेय पदार्थों को भी हानिकारक मानती है और बाबा रामदेव इन पेयों का जबरदस्त विरोध करते हैं.

इस वजह से इन पर उत्पाद शुल्क और बढ़ाने पर सरकार को किसी प्रबल प्रतिरोध की आशंका नहीं है. महंगी गाड़ियों पर भी उत्पाद शुल्क बढ़ाया जा सकता है.

जीएसटी से हल्की होगी आम लोगों की जेब  

सितंबर में जीएसटी लागू होने की स्थिति में उपभोक्ताओं की जेब को भारी चपत लगना तय है. क्योंकि तब सेवा कर 3% से बढ़ कर 15% से 18% हो जायेगा.

आज अधिकांश सुविधाएं सर्विस टैक्स के दायरे में आती हैं. इससे सवा दो लाख करोड़ से ज्यादा का रेवेन्यू सरकार को मिलता है. इसका सर्विस टैक्स में बढोतरी को सबसे ज्यादा प्रतिकूल असर मिडिल क्लास और युवा वर्ग पर पड़ेगा. रेस्टोरेंट में खाना महंगा हो जायेगा. फोन बिल भी अधिक महंगा हो जायेगा.

मान लीजिए अभी यह बिल 1000 रुपए का आता है, तो सर्विस टैक्स लगता है 150 रुपए लेकिन जीएसटी लागू होने के बाद इस पर टैक्स होगा 180 रुपए.

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कोचिंग क्लास, स्कूल बस भी महंगी हो जायेगी. ज्वेलरी खरीदारी भी महिलाओं के लिए ज्यादा महंगी हो जायेगी. अभी ऑनलाइन सेल पर खरीदारी का मौका कोई भी नहीं छोड़ना चाहता है. पर अब यह सुविधा भी जीएसटी के दायरे में आ जायेगी.

इससे ई-कॉमर्स कंपनियों का आए दिन डिस्काउंट और फ्री माल बांटना काफी कम हो जायेगा. कम कीमत के कपड़े छोड़कर ब्रांडेड कंपड़े भी महंगे हो जाएंगे. विलासिता की सामग्री महंगी हो जाने से उनके उपभोक्ताओं को कोई विशेष असर नहीं पड़ता है.

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5 लाख रूपये से कम लागत वाली कारें भी सस्ती हो जाएंगी और एलईडी टीवी भी. क्योंकि इन पर उत्पाद शुल्क घटने की बात है. पर कीमती मोबाइल फोन महंगा हो सकता है.

डॉलर की कीमत बढ़ा सकती है, उपभोक्ताओं का दर्द 

जीएसटी में चार टैक्स दरों को मंजूरी मिली है. 5,12,18 और 28 फीसदी. फाइनेंस मिनिस्टर अरुण जेटली साफ कह चुके हैं कि पेय पदार्थ, पान मसाला तंबाकू उत्पाद और कीमती गाड़ियों पर 28% से ज्यादा कर लगेगा.

इनका महंगा होना इसलिए भी तय है कि राज्यों को होने वाले नुकसान की क्षतिपूर्ति के लिए पहले साल से ही 50 हजार करोड़ रुपये केंद्र सरकार को राज्यों को देने हैं.

इसके लिए कम उत्पाद शुल्क वाले उत्पादों को अधिक उत्पाद शुल्क के कैटेगरी डाल कर फाइनेंस मिनिस्टर हाथ की सफाई दिखा सकते हैं.

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उपभोक्ताओं के दर्द को डॉलर और पेट्रोल-डीजल के दाम और बढ़ा सकते हैं. वैसे पेट्रोल-डीजल जीएसटी के दायरे से बाहर है. यह भी लगभग तय है कि बजट में इनके उत्पाद शुल्क में कोई वृद्वि नहीं की जायेगी. पर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने से पेट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोतरी होना लाजिमी है.

कच्चे तेलों के दामों के दृढ़ रुख को लेकर फाइनेंस मिनिस्ट्री के आला अधिकारी और आरबीआई काफी सतर्क है. यदि रुपए के सापेक्ष डॉलर मजबूत होता है, तब पेट्रोल-डीजल महंगे हो जाएंगे. फिलहाल डॉलर का कीमत 67-68 रुपए के दायरे में चल रही है. पर मुद्रा विनिमय बाजार के विशेषज्ञ का कहना है कि डॉलर 70 रुपये तक जा सकता है.

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ऐसा होने पर केवल पेट्रोल-डीजल ही नहीं बल्कि खाद्य तेल, दवाएं, मोबाइल आदि अनेक वस्तुओं के दाम बढ़ जाएंगे. डॉलर के दाम मूलत: सरकार के आर्थिक प्रबंधन पर निर्भर होते हैं. पर इतना तय है कि बजट के लोक लुभावन खर्चों का भांडा उपभोक्ता सिर पर फूटना है.

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