Co Sponsor
In association with
In association with
S M L

World Heart Day: दिल दा मामला है... कहीं फेल न हो जाए

साल 1990 से 2013 के बीच हार्ट फेल्यर के मामलों में करीब 140 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है. जीवनशैली में बदलाव एवं तनाव के कारण युवा भी तेजी से इसकी चपेट में आ रहे हैं

Bhasha Updated On: Sep 29, 2017 03:48 PM IST

0
World Heart Day: दिल दा मामला है... कहीं फेल न हो जाए

कम उम्र के लोगों में ह्रदय रोगों पर डॉक्टरों एक विशेषज्ञों ने चिंता जाहिर की है. डॉक्टरों ने इन लक्षणों के नजरअंदाज न करने और अपनी जीवनशैली में सुधार लाने की सलाह दी है.

भारत में मृत्यु का एक मुख्य कारण हृदय से जुड़ी बीमारियां हैं. इसकी वजह दिल संबंधी बीमारियों के इलाज की सुविधा न मिलना या पहुंच न होना और जागरूकता की कमी है.

हालिया आंकड़ों के अनुसार 99 लाख लोगों की मृत्यु गैर-संचारी रोगों (नॉन कम्युनिकेबल बीमारियों) के कारण हुई. इसमें से आधे लोगों की जान हृदय रोगों के कारण हुई.

हार्ट फेल्यर को समझना जरूरी

दूसरी ओर हृदय रोगों में, हार्ट फेल्यर (दिल का कमजोर हो जाना) भारत में महामारी की तरह फैलता जा रहा है जिसकी मुख्य वजह हृदय की मांसपेशियों का कमजोर हो जाना है.

29 सितंबर को ‘वर्ल्ड हार्ट डे’ के मौके पर विशेषज्ञों ने कहा कि अब तक हार्ट फेल्यर की समस्या पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता था. इसलिए लोग इसके लक्षणों को पहचान नहीं पाते थे. इस समस्या के तेजी से प्रसार का एक कारण यह भी है.

‘कार्डियोलोजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया’ के अध्यक्ष डॉ. शिरीष (एम. एस.) हिरेमथ ने बताया, 'भारत में तेजी से हार्ट फेल्यर के बढ़ते मामलों को देखते हुए, इस पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत भी बढ़ती जा रही है. हम सभी हितधारकों को सामुदायिक स्तर पर बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है.' उन्होंने बताया कि हार्ट फेल्यर को अमूमन हार्ट अटैक ही समझ लिया जाता है.

डॉ शिरीष ने कहा, 'हार्ट फेल्यर को समझना जरूरी है, अक्सर लोगों को लगता है कि हार्ट फेल्यर का तात्पर्य दिल का काम करना बंद कर देने से है जबकि ऐसा कतई नहीं है. हार्ट फेल्यर में दिल की मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं जिससे वह रक्त को प्रभावी तरीके से पंप नहीं कर पाता. इससे ऑक्सीजन व जरूरी पोषक तत्वों की गति सीमित हो जाती है.'

हार्ट फेल्यर के मामलों में 140 फीसदी बढ़ोतरी हुई है

दिल्ली ‘एम्स’ के कार्डियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. संदीप मिश्रा ने कहा, 'पश्चिमी देशों के मुकाबले भारत में यह बीमारी एक दशक पहले पहुंच गई है. बीमारी होने की औसत उम्र 59 साल है. बीमारी की जानकारी न होना, ज्यादा पैसे खर्च होना और बुनियादी ढ़ांचे की कमी के कारण हार्ट फेल्यर के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है.'

डॉ मिश्रा के अनुसार, साल 1990 से 2013 के बीच हार्ट फेल्यर के मामलों में करीब 140 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है. जीवनशैली में बदलाव एवं तनाव के कारण युवा भी तेजी से इसकी चपेट में आ रहे हैं.

डॉ मिश्रा ने कहा कि जीवनशैली में बदलाव कर इस बीमारी से बचा जा सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि इस बीमारी के लक्षणों को नजरअंदाज न करने और समय रहते बीमारी का पता लगा कर इलाज शुरू करने एवं जीवनशैली में बदलाव से इस बीमारी का खतरा दूर हो सकता है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
जो बोलता हूं वो करता हूं- नितिन गडकरी से खास बातचीत

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi