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ऐसे काम करेगा... तो कैसे बढ़ेगा इंडिया!

देश की महिलाएं पढ़ाई तो खूब कर रही हैं लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद उसके आधार पर नौकरी नहीं कर रही हैं

Saroj Singh Updated On: May 31, 2017 06:53 PM IST

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ऐसे काम करेगा... तो कैसे बढ़ेगा इंडिया!

सोमवार को वर्ल्ड बैंक ने भारत में कामगारों पर एक रिपोर्ट जारी की. इस रिपोर्ट में देश के श्रम बल में भारतीय महिला कामगारों की कम होती हिस्सेदारी को बेहद चिंताजनक बताया गया है.

आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट के मुताबिक महिला कामगारों की संख्या के हिसाब से भारत 131 देशों की लिस्ट में 120वें पायदान पर है. यहां केवल 27 फीसदी महिलाएं ही कमाऊ हैं. जबकि देश की कुल आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी 48 फीसदी है.

‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा बुलंद करने वाली सरकार के लिए ये आंकड़े चिंता का सबब बन सकते हैं.

पढ़ी-लिखी महिलाएं भी नहीं करती नौकरी

वर्ल्ड बैंक की उसी रिपोर्ट के मुताबिक अगर महिला कामगारों की हिस्सेदारी बेहतर हो जाए तो आने वाले दिनों में भारत की विकास दर दहाई का आंकड़ा पार कर सकती है. ऐसा इसलिए हो सकता है, क्योंकि भारत में ग्रेजुएट की पढ़ाई पूरी करने वाली महिलाओं की संख्या तकरीबन 42 फीसदी है.

यानी देश की महिलाएं पढ़ाई तो खूब कर रही हैं लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद उसके आधार पर नौकरी नहीं कर रही हैं. कुल मिलाकर कहें तो महिलाएं अपनी पढ़ाई का फायदा नहीं उठाती. आंकड़ों के मुताबिक 26 से 45 साल की उम्र की हर पांच में से तीन महिलाएं पढ़ाई के बाद घर पर बैठ जाती हैं.

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हालांकि इस रिपोर्ट में इसके पीछे कई वजहें भी गिनाई गई हैं. परिवार में पुरुषों की बेहतर आमदनी भी इसके पीछे एक कारण है. इसके अलावा सामाजिक सुरक्षा की कमी, ऑफिस के साथ साथ घर की जिम्मेदारी और बच्चों की परवरिश भी महिलाओं के कामकाज में रुचि न दिखाने की वजहें मानी गई हैं.

NEW DELHI, INDIA - FEBRUARY 01: An Indian woman greets her children as she arrives to her temporary tent dwelling after a day of labouring on a construction project in front of the Jawaharlal Nehru Stadium on February 01, 2010 in New Delhi, India. The children accompany their parents to the work site, where if they are prepared to work, they will receive money for bread an milk and be provided with dinner by the contractor. The Commonwealth Games are due to be held in the Indian capital from October 3-14, 2010, but concerns remain over construction of its sporting and transport infrastructure. The sheer scale of the project has drawn an enormous population of migrant workers from all over India. This week the High Court of Delhi has sought a response from the Government over the alleged failure to provide all the benefits of labour laws to workers involved in construction work for the coming Commonwealth Games. Workers are being paid below the minimum wage in order to complete these projects whilst also being forced to live and work under sub standard conditions. (Photo by Daniel Berehulak/Getty Images)

महिला कामगारों की हिस्सेदारी जिन देशों में भारत से बेहतर है, जैसे ब्राजील और इंडोनेशिया. वहां की ज्यादातर महिलाएं सिर्फ 12वीं पास हैं इसके बावजूद कमाई के मामले में वो भारत की महिलाओं से आगे हैं. इस वजह से भी भारत के लिए ये आंकड़े चिंता का विषय हैं.

सरकार की तरफ से पहल

भारत सरकार ‘बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ’ जैसे अभियान की शुरुआत कर बेटियों की पढ़ाई के इस आंकड़े को और बेहतर करने में जुटी है.

इसी साल एक अप्रैल से महिलाओं के लिए संशोधित मैटरनिटी बेनिफिट बिल भी सरकार लेकर आई है, जिसमें गर्भवती महिलाओं के लिए ऑफिस में क्रेच की सुविधा के साथ साथ 12 हफ्तों की जगह 26 हफ्तों के मातृत्व अवकाश का प्रावधान रखा गया है.

इस अवकाश के दौरान महिला को उसका पूरा वेतन भी मिलेगा. साथ ही मुद्रा योजना और स्टार्ट अप योजनाओं में महिलाओं को तरजीह दे कर, सरकार उनको रोजगार और कारोबार में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित भी कर रही है.

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सरकार के आंकड़ों के मुताबिक इस साल मुद्रा योजना के तहत छोटे व्यवसाय को बड़ा करने के लिए दिए जाने वाले 7.5 करोड़ रुपए तक के लोन में 70 फीसदी हिस्सेदारी महिलाओं की रही है.

इतना ही नहीं स्टार्ट अप के लिए दिए जाने वाले लोन में हर बैंक को अनिवार्य तौर पर एक महिला को लोन देने की हिदायत दी गई है. सरकार का दावा है कि सिर्फ कपड़ा उद्योग में ही महिलाओं के लिए तकरीबन तीस लाख रोजगार के अवसर पैदा किए गए हैं.

इतना कुछ करने के बाद भी देश के श्रम बल में महिलाओं की हिस्सेदारी घट रही है तो यह चिंताजनक है. वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक 2005 के बाद तो कामकाजी महिलाओं से जुड़े आंकड़े और ज्यादा चितांजनक हो गए.

WORKING WOMEN

पुरुष मार लेते हैं बाजी

पहले ज्यादातर महिलाएं कृषि क्षेत्र में काम करती थी. लेकिन जैसे-जैसे उनकी शिक्षा का स्तर बढ़ा वो कृषि क्षेत्र में कामकाज छोड़कर दूसरी नौकरियों की तलाश में गांवों से निकल पड़ीं. लेकिन कृषि से बाहर दूसरे क्षेत्रों में रोजगार के जो अवसर मिले उसमें बाजी पुरुषों ने मार ली.

आंकड़े बताते है कि 2005 से 2012 के बीच वेतन वाली नौकरियां 0.9 फीसदी बढ़ी. लेकिन इन नौकरियों को पाने में पुरुष महिलाओं से काफी आगे रहे.

सबका साथ सबका विकास

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक जो महिलाएं कमाती है वो परिवारिक मामलों में फैसला लेने में अहम भूमिका भी निभाती हैं. जिसका परिवार की आर्थिक हालत पर सही असर पड़ता है और वो अपना घर बेहतर तरीके से चला पाती है.

इस वजह से महिलाओं का काम करना न सिर्फ परिवार की खुशहाली के लिए बल्कि देश की खुशहाली के लिए भी जरुरी है.

इस वजह से भी महिला और पुरुष कामगारों के बीच श्रम बल की इस दूरी को ज्यादा से ज्यादा और जल्दी से जल्दी पाटने की जरुरत है. तभी सबका साथ सबका विकास का नारा सही मायने में ‘साथ है, विश्वास है, हो रहा विकास है’ में परिवर्तित हो पाएगा.

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