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राजस्थान में फैली अफवाह: रात में पाकिस्तानी चोर काट कर ले जाते हैं महिलाओं के बाल

राजस्थान के कई इलाकों में महिलाओं के बाल रात में काट लिए जा रहे हैं

Updated On: Jul 19, 2017 11:35 AM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान में फैली अफवाह: रात में पाकिस्तानी चोर काट कर ले जाते हैं महिलाओं के बाल

राजस्थान में पाकिस्तान से लगती सीमा से जुड़े जिलों की महिलाओं में शुरू हुआ खौफ अब राजधानी जयपुर के आसपास के गांवों तक पहुंच चुका है. खौफ भी इतना भयंकर कि कई इलाकों में महिलाएं दिन में भी घर से बाहर निकलते डरने लगी हैं तो रात को पुरुष बाहर पहरेदारी को मजबूर हैं.

हालात ये हैं कि महिलाएं लहसुन की माला बनाकर जूड़े में बांधने लगी हैं. उन्हें सयाने लोगों ने उम्मीद बंधाई है कि इससे वो खौफ काबू में रहेगा, जो आजकल महिलाओं के ही पीछे पड़ा है.

इसी खौफ को खत्म करने के लिए किसी ने अपने घर की बाहरी दीवार को मेहंदी से लीप दिया है तो किसी ने कुल देवी की तस्वीर बना दी है. लेकिन भय है कि खत्म होने की बजाय नए नए शिकार बनाता जा रहा है.

किससे खौफ में हैं महिलाएं?

rajasthan

दरअसल, पिछले कुछ दिन से जैसलमेर जिले में लगातार ऐसी घटनाएं हो रही थी जिसमें सोती हुई महिलाओं के बाल कट गए थे. कुछ मामलों में शरीर पर सिंदूर से त्रिशूल भी बना दिया गया था.

लेकिन बात सिर्फ इतनी सी नही है बल्कि पीड़ित महिला घटना के बाद से लगातार बीमार भी रहने लगती है. तमाम प्रयासों के बावजूद न पुलिस, न प्रशासन और न ही कोई और ये पता लगा पाया है कि महिलाओं के बाल काटने वाले आखिर हैं कौन?

ऐसी घटनाएं जैसलमेर जिले में शुरू हुईं लेकिन जल्द ही व्हाट्सएप्प ने बाड़मेर, जालोर, जोधपुर, बीकानेर, नागौर यानी पूरे पश्चिमी राजस्थान तक इन अफवाहों को पहुंचा दिया. पाकिस्तान बॉर्डर से लगते इस इलाके के लोग इतने ज्यादा खौफ में हैं, जितने कि कभी वो पड़ोस से होने वाली घुसपैठ, फायरिंग और युद्ध के दौरान भी नही हुए.

हालात काबू में आने से पहले ही शिकारी शायद राजधानी जयपुर पर भी धावा बोल चुका है. जुलाई के इन शुरुआती तीन हफ्तों में ही जयपुर के पास चौमूं, शाहपुरा, कोटपूतली और सीकर के अजीतगढ़ के आसपास दर्जन भर से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं जिनमें कथित रूप से महिलाओं की लटें काट दी गईं और शरीर पर सिंदूर से त्रिशूल बना दिया गया.

आखिर इन घटनाओं के पीछे है कौन?

ये सवाल लगातार एक अनसुलझी पहेली सा बना हुआ है. कोई कहता है कि इन सबके पीछे कोई चुड़ैल है तो कोई इसे पारिवारिक दुश्मनी निभाने का एक तरीका बता रहा है. किसी-किसी ने तो इन घटनाओं में पाकिस्तानी हाथ की खबर भी फैला दी है.

कुछ लोगों का कहना है कि भारतीयों से बदला लेने के लिए पाकिस्तान की तरफ से एक झुंड अचानक रात को धावा बोलता है और घटना को अंजाम देकर रफूचक्कर हो जाता है.

अफवाहें तो ये भी हैं कि बाल काटने वाला शख्स कभी मोर बनकर आता है तो कभी कुत्ता या बिल्ली बनकर. व्हाट्सएप्प पर एक मैसेज ये भी फैल रहा है कि फलां विशेष पूजा नहीं की गई तो बाल कटने वाली महिला की कुछ ही दिन में मौत हो जाएगी.

ऐसी अफवाहें लोगों में डर बढ़ा रही हैं तो कुछ बाबाओं की दुकानें भी चमक गई हैं. किसी दूसरे उपाय के बजाय लोग झाड़ फूंक करने वाले 'भोपा' पर अधिक भरोसा कर रहे हैं.

बाड़मेर के गुढ़ा मालानी में एक पीड़ित परिवार से बात की गई तो उन्होंने घटना के बारे में हामी भरी. ये भी दावा किया कि पीड़ित महिला घटना के बाद से ही बीमार चल रही है और एक झाड़ फूंक वाले बाबा उसका इलाज भी कर रहे हैं. लेकिन पीड़ित से बात कराने से उन्होंने इनकार कर दिया.

क्या कहता है प्रशासन?

लगातार हो रही इन घटनाओं को लेकर पुलिस और प्रशासन भी कुछ समझ नही पा रहा है कि करें तो करें आखिर क्या?

प्रभावित जिलों के कलेक्टर और एसपी अपील कर रहे हैं कि ये केवल अफवाहें हैं और इन पर ध्यान न दिया जाए. जैसलमेर के एसपी गौरव यादव कहते हैं कि जहां-जहां घटना का दावा किया गया वहां पुलिस को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला तो फिर इसे अफवाह नही तो और क्या कहें?

जैसलमेर जिला अस्पताल के डॉक्टरों का भी कहना है कि उनके सामने इस तरह का कोई मरीज अभी तक नहीं आया है.

लेकिन लोग लगातार ये सवाल उठा रहे हैं कि अगर वाकई में ये अफवाहें हैं तो फिर क्या वो झूठ है जो वे प्रत्यक्ष में देख रहे हैं यानी चोटी कटी महिलाएं और शरीर पर सिंदूर से बना त्रिशूल. पिछले कुछ महीनों से न ऐसी खबरें रुक रही हैं और न ही अफवाहों के फैलने का दौर.

महिला आयोग अध्यक्ष सुमन शर्मा ने भी स्वीकार किया कि इस तरह की घटनाओं के बाद लोगों में भय का माहौल है. शर्मा के मुताबिक पश्चिमी राजस्थान के कुछ गांवों से पलायन की खबर तक आई है. इसके बाद आयोग ने संबंधित जिलों के कलेक्टर और एसपी से रिपोर्ट भी भेजने को कहा है.

चोटी काटने वाला भूत है या भूलभुलैया?

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वैसे इस तरह की घटनाएं आमतौर पर पिछड़े समाजों या इलाकों में ही देखने को मिलती हैं. पश्चिमी राजस्थान खासकर जैसलमेर, बाड़मेर, जालौर जैसे जिले विकास की उस मुख्यधारा से लगभग कटे हुए हैं जो आमतौर पर अरावली के इस पार जयपुर, कोटा या अलवर जैसे जिलों में दिखाई देती है.

पश्चिमी राजस्थान में महिला साक्षरता दर काफी कम है. जैसलमेर, जालौर जैसे जिलों में तो 40% से भी कम. ऊपर से महिलाओं के जिम्मे कई-कई किलोमीटर दूर से पानी लाने और संकटपूर्ण हालात में परिवार चलाने की जिम्मेदारी. रेगिस्तान में रोजगार की समस्या है लिहाजा अधिकतर परिवारों के पुरुष सदस्य पूर्वी राजस्थान, गुजरात या महाराष्ट्र में नौकरी करने चले जाते हैं. ऐसे में महिलाओं के साथ अकेलेपन और डिप्रेशन के अलावा कुछ रहता नहीं है.

इन हालात में कई अकेली महिलाएं अपने मन में ही कई तरह के विचारों का तानाबाना बुनने लगती हैं. कुछ ऐसा ही प्रियदर्शन की फिल्म भूलभुलैया में भी दिखाया जा चुका है.

राजस्थान विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की एसोसिएट प्रोफेसर मधु जैन का कहना है कि अकेलेपन की समस्या से ग्रसित लोग आमतौर पर 'भ्रम' के हालात में जीने लगते हैं. ऐसे लोग अपने मन में विशेष तरह की धारणा बना कर उसे ही सच मानने लगते हैं, जैसे उन्हें लगे कि कोई दैवीय शक्ति बिल्ली या मोर रूप में आकर उसकी समस्याओं का अंत कर देगी.

जैन का कहना है कि कई बार अपूर्ण शारीरिक या मानसिक इच्छाएं भी इंसान को कुछ ऐसा करने पर मजबूर कर देती हैं, जहां वह अपनी ही कहानी गढ़ लेता है. महिलाओं में बेहोशी का कारण हिस्टीरिया भी हो सकता है.

यानी अगर चोटी कटने या बेहोशी जैसे मामले अगर सामने आ भी रहे हैं तो इनकी पड़ताल की जानी चाहिए. ये दिमागी बीमारियों के मामले हो सकते हैं या फिर कुछ और, जिनका इलाज झाड़ फूंक तो बिल्कुल नहीं हो सकता.

यह सच भी लगता है. NH-8 पर कोटपूतली में भी एक लड़की की चोटी कटने के मामले की हकीकत कुछ और ही निकली. स्कूल से लौटते वक्त इसने दावा किया था कि अचानक उसके बालों की लट कट गई और वह बेहोश हो गई.

जब मीडिया और प्रशासन ने पड़ताल की तो मामला प्रेम प्रसंग का निकला. प्रेमी अपनी प्रेमिका से मिलने स्कूल ही पहुंच गया. लड़की को जब डांट पड़ी तो डर के मारे 'बेहोश' हो गई और अफवाह फैल गई चोटी कटने की.

सौ बातों की एक बात ये कि खुद ब खुद चोटी कट जाना, शरीर पर सिंदूर से त्रिशूल बन जाना या बेहोशी जैसी घटनाओं का वास्तव में कोई आधार नहीं मिल पाया है. ये मन में दबी अपूर्ण इच्छाओं की अभिव्यक्ति या किसी छिपे मामले के सार्वजनिक हो जाने पर बचाव की कोशिश ही अधिक लगता है.

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