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इथियोपिया की कैबिनेट में 50% महिलाएं, भारत के लिए अब भी मजाक!

भारत में महिला नेताओं के लिए राजनीति में रास्ता बनाना इतना मुश्किल क्यों है?

Updated On: Oct 17, 2018 06:59 PM IST

Tulika Kushwaha Tulika Kushwaha

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इथियोपिया की कैबिनेट में 50% महिलाएं, भारत के लिए अब भी मजाक!
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भारत में महिला रिजर्वेशन बिल का अस्तित्व 1996 यानी लगभग 22 साल पहले आया था. इस बिल में महिलाओं के लिए लोकसभा में 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण की मांग की गई थी. ये बिल राज्यसभा में तो 9 मार्च, 2010 को पास हो गया लेकिन लोकसभा में पहुंच भी नहीं पाया.

आधी आबादी कही जाने वाली महिलाओं की हालत भारतीय राजनीति में ये है कि 542 सदस्यों वाली लोकसभा में उनकी संख्या 11.6% और राज्यसभा में 245 सदस्यों के बीच महिलाओं की मौजूदगी 11% की है. और इसके अलावा कैबिनेट की तो बात मत पूछिए.

अगर फिलहाल की नरेंद्र मोदी की एनडीए सरकार की बात करें तो उनकी कैबिनेट में 26 मंत्री हैं. और इन मंत्रियों में महज 6 महिला मंत्री हैं. हालांकि इन 6 मंत्रियों में से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण सामरिक और रणनीतिक मामलों में अहम पदों पर काबिज हैं. इनके अलावा स्मृति जुबिन ईरानी टेक्सटाइल मंत्री, मेनका गांधी महिला एवं बाल विकास मंत्री, उमा भारती पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री और हरसिमरत कौर फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री मंत्री हैं.

इथियोपियाई कैबिनेट में पहुंची 50 प्रतिशत महिलाएं

ये रहा भारत का हिसाब-किताब. अब मुद्दे की बात सुनिए. ओलंपिक में अपने तेज धावकों की वजह से हर बार चर्चा में रहने वाला अफ्रीकी देश इथियोपिया एक और अच्छी वजह से चर्चा में है. इथियोपिया में पहली बार किसी महिला को रक्षामंत्री चुना गया है. और इसके साथ ही इथियोपिया के कैबिनेट में महिलाओं की मौजूदगी 50 प्रतिशत तक पहुंच गई है. इथियोपिया की कैबिनेट में 20 मंत्री पद हैं, जिनमें से आधे पर महिला मंत्री काबिज हैं.

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इथियोपिया के सुधारवादी प्रधानमंत्री अबिय अहमद ने आइशा मोहम्मद मूसा को इस पद के लिए नॉमिनेट किया था. मंगलवार को यहां सांसदों ने उनके नाम पर मुहर लगा दी. प्रधानमंत्री अहमद ने कहा, 'हमारी महिला मंत्री इस पुरानी धारणा को खत्म कर देंगी कि महिलाएं लीडर नहीं बन सकतीं. ऐसा फैसला इथियोपिया के इतिहास और शायद अफ्रीका के इतिहास में पहली बार लिया गया है.'

बता दें कि इथियोपिया में हमेशा से पितृसत्तात्मक समाज रहा है. जिसकी अपने हिस्से की आलोचना भी होती रही है. यूएन में एक रिपोर्ट में कहा गया था कि इथोपिया में स्वास्थ्य, शिक्षा, नौकरी और मूल मानवाधिकार जैसे क्षेत्रों में भी महिलाओं के खिलाफ बहुत लिंगभेद और असमानता है.

लेकिन 42 साल के प्रधानमंत्री अबिय अहमद के सत्ता में आने के बाद से इथोपिया में राजनीतिक और आर्थिक सुधारों की लहर आ गई है.

इसी तरह कुछ यूरोपीय देश भी हैं, जहां की कैबिनेट में 50 प्रतिशत या उससे ज्यादा महिला मंत्रियों की मौजूदगी है. इस दिशा में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों और कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने अपने-अपने कैबिनेट को 'जेंडर बैलेंस्ड' करने की कोशिश की है. एक दूसरे अफ्रीकी देश रवांडा में भी कैबिनेट में महिला मंत्रियों की मौजूदगी 43 प्रतिशत है और यहां की संसद में तो 61 प्रतिशत महिला सांसद हैं.

इथियोपिया के बहाने इन देशों की बात इसलिए भी क्योंकि इनकी हालत भारत से बहुत बेहतर है. भारत में 26 कैबिनेट मंत्रियों में से बस 6 पद महिला मंत्रियों के पास हैं. वो भी तब जब सदन में महिलाओं के आरक्षण पर बिल तक 20 साल पहले पास हो चुका है.

आखिर क्यों नहीं मिलता महिलाओं को राजनीति में मौका?

भारत में कैबिनेट में महिला मंत्रियों का न होना हैरान नहीं करता है. भारत में पॉलिटिक्स में ही महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाता है. बल्कि ऐसा भी नहीं है कि भारत में शक्तिशाली महिला नेता नहीं हुई हैं. भारत को इंदिरा गांधी के रूप में उसकी पहली प्रधानमंत्री मिल चुकी हैं. भारत में महिला राष्ट्रपति भी रह चुकी हैं. भारत में दो लोकसभा स्पीकर रह चुकी हैं. फिर भी महिला नेताओं के लिए राजनीति में रास्ता बनाना इतना मुश्किल क्यों है?

भारत में राजनीति और प्रशासन पुरुषों के वर्चस्व वाला क्षेत्र माना जाता रहा है, ऐसे में महिलाओं के लिए यहां जगह बनाना वैसे ही मुश्किल है लेकिन फिर भी महिलाओं ने यहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है. लेकिन फिर भी कैबिनेट तक का रास्ता तय करना बहुत मुश्किल है और भारतीय राजनीति में उनका चयन कई फैक्टरों पर निर्भर करता है.

चलते-चलते बात महिला आरक्षण बिल पर भी बात. ये बिल अब से आठ साल पहले राज्यसभा में हुआ है, चूंकि ये लोकसभा तक नहीं पहुंचा है इसलिए ये बिल अभी डेड नहीं है. यानी कि दोनों सदनों से मंजूरी के लिए इस बिल को अब नए सिरे से बनाने की जरूरत नहीं है. लेकिन फिर भी ये कहना मुश्किल है कि ये बिल कब तक दोनों सदनों से पास होकर कानून बनेगा.

इसके अलावा सवाल इस बिल पर भी उठते हैं कि सदन में महिलाओं को आरक्षण क्यों? तो इसका जवाब ढूंढने के लिए हमारे देश की राजनीति में महिलाओं की स्थिति पर नजर डालना ही काफी है. ये काफी बड़ी बहस हो सकती है लेकिन अगर आपको समानता चाहिए तो कम से कम प्रतिद्वंदी को रेस में तो आने दीजिए.

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