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'कैंसर पैदा करने वाली खेती' को अलविदा कह रही हैं पंजाब की ये महिलाएं

पंजाब के बरनाला जिले में कैंसर के बढ़ते मामलों को कम करने के लिए यहां की महिलाओं ने ऑर्गेनिक खेती का रास्ता चुना और आज इससे सबको लाभ हो रहा है

Updated On: Aug 24, 2018 07:23 AM IST

Sukhcharan Preet

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'कैंसर पैदा करने वाली खेती' को अलविदा कह रही हैं पंजाब की ये महिलाएं

अमरजीत कौर (45 साल) काफी तड़के ही बिस्तर छोड़ देती हैं. जब वह सुबह-सुबह उठती हैं, तो उस वक्त अंधेरा ही रहता है और उनके परिवार के बाकी सदस्य गहरी नींद में सोए रहते हैं. उठने के कुछ ही समय बाद वह अपने घर के बाहर रखे स्प्रिंकलर (पानी छिड़कने वाली मशीन) से अहाते में लगी सब्जियों में पानी देती हैं. इसके बाद अपनी जमीन के एक हिस्से में गोबर का खाद डालती हैं. पंजाब के बरनाला जिले के भोतना गांव की रहने वाली अमरजीत पिछले 11 साल से नियमित रूप से ऐसा कर रही हैं.

उनका कहना है कि इस जिले में कैंसर के बढ़ते मामलों को कम करने का एकमात्र तरीका ऑर्गेनिक खेती ही था. कीटनाशकों और रासायनिक खाद के अनियंत्रित इस्तेमाल को कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी का कारण माना जाता रहा है. अमरजीत भोतना में 2,000 महिलाओं के उस समूह का हिस्सा हैं, जिन्होंने 'कैंसर फैलाने वाले खेती के तौर-तरीकों' के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है. पंजाब के मालवा इलाके को अक्सर भारत की कैंसर राजधानी कहा जाता है.

आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 10 साल में इस जानलेवा बीमारी के 42,000 मामले सामने आ चुके हैं. मालवा इलाके में पंजाब के दक्षिण पश्चिम जिले मसलन भटिंडा, मुक्तसर, फिरोजपुर, फरीदकोट, मनसा, मोगा, बरनाला, संगरूर आदि शामिल हैं. कैंसर की बीमारी इन इलाके के किसानों के घरों में प्रवेश कर चुकी है, जिससे हरित क्रांति की सफल कहानियां खौफनाक हकीकत में बदल चुकी हैं. हालात इतने खराब हैं कि जोधपुर-भटिंडा पैसेंजर ट्रेन को 'कैंसर ट्रेन' भी कहा जाने लगा है. दरअसल, इस ट्रेन से बड़ी संख्या में मुसाफिर इलाज के लिए राजस्थान के बीकानेर पहुंचते हैं.

अहातों और आंगन में हरियाली फैलाने का अभियान

देश में गेहूं का कटोरा कहे जाने वाले इलाके में मिट्टी और पानी की गुणवत्ता में लगातार हो रही गिरावट और लोगों की सेहत पर इसके असर से चिंतित भोतना की साहसी महिलाएं खेती-बाड़ी के खतरनाक तौर-तरीकों के खिलाफ आक्रामक अभियान चला रही हैं. उनके मुताबिक, मालवा क्षेत्र में तकरीबन 75 फीसदी कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. इस इलाके में मौजूद सघन हरियाली से भरे खेतों में जहरीले माहौल, बीमारी और तकलीफ की कहानियां मौजूद हैं.

प्रतीकात्मक

प्रतीकात्मक तस्वीर

यहां की महिलाओं ने पाया कि जमीन को पट्टे पर लेना उनकी जेब पर काफी भारी पड़ रहा था. ऐसे में उन्होंने ऑर्गेनिक तरीके से सब्जियां उगाने के लिए अपने घर के बाहर की खुली जमीन का इस्तेमाल करने का फैसला किया. इन महिलाओं के मुताबिक, इसका मकसद भूजल स्तर को फिर से बेहतर बनाना और पर्यावरण को बचाना था.

अमरजीत कहती हैं, 'भोतना गांव में ऑर्गेनिक (जैविक) खेती के तौर-तरीके अपनाने वाले लोगों में मैं अग्रणी थी. साल 2007 में मैंने अपने घर के बाहर मौजूद जमीन को इसके लिए तैयार करना शुरू किया. अब मैं खेती के इस तरीके को बड़े खेतों में भी अपना रही हूं. मैं कीटनशाक दवाओं के इस्तेमाल के बिना एक एकड़ में गेहूं की खेती करती हूं. हममें से कुछ लोग अपना उत्पाद स्थानीय बाजारों और फूड फेस्टिवल में भी बेचते हैं.'

ऑर्गेनिक खेती का चलन अब इलाके के 25 से भी ज्यादा गांवों में अपनाया जा रहा है, जहां पुरुष और महिलाएं दोनों अपने छोटे और हरेभरे भूभाग से सफलतापूर्वक अपनी किचन की जरूरतें पूरी कर रही हैं. महिलाओं के इन समूह का दावा है कि कीटनाशकों, रासायनिक खाद और फसलों का उत्पादन बढ़ाने के अन्य पारंपरिक तौर-तरीकों को छोड़कर उन्होंने तकरीबन 1.5 करोड़ रुपए सालाना की बचत की है.

पंजाब में इस तरह की खेती को बढ़ावा देने वाले गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) 'खेती विराट मिशन' ने सबसे पहले भोतना में महिलाओं को ऑर्गेनिक खेती के तौर-तरीकों को लेकर जानकारी मुहैया कराई थी. एनजीओ के सदस्यों ने इन महिलाओं को अगले सीजन में बुआई के लिए बीजों के संरक्षण के तौर-तरीकों के बारे में भी बताया था.

खेती विराट मिशन की जिला कोऑर्डिनेटर कमलजीत कौर ने बताया, 'सेहतमंद खाने के बारे में जागरूकता में हो रही लगातार बढ़ोतरी के कारण लोग कीटनाशकों की मदद से उगाई जाने वाली सब्जियां अब नहीं खाना चाहते हैं. भोतना के लोगों (प्रत्येक परिवार) को हर महीना सब्जी खरीदने पर तकरीबन 1,500 रुपए खर्च करना पड़ता था. अब कुछ महिलाओं द्वारा खुद से सब्जी उगाने की मुहिम में जुटने में यह रकम भी बच रही है.'

A farm worker looks for dried plants to remove in a paddy field on the outskirts of Ahmedabad, India

प्रतीकात्मक तस्वीर

कौर ने बताया, 'हमने कुछ समय पहले बरनाला के सैकड़ों लोगों से बात की थी और उनका कहना था कि ऑर्गेनिक सब्जियां खाने के बाद उनकी सेहत में काफी सुधार हुआ है. अब वे अक्सर बीमार नहीं पड़ते.' उनका यह भी कहना था कि एनजीओ ने ऑर्गेनिक खेती के तरीकों को सिखाने के लिए शुरू में भोतना गांव की सिर्फ 7 महिलाओं को लक्ष्य बनाया था.

अनाज का कटोरा कहा जाता है इस इलाके को

सेहत के खतरों से जूझ रहा खाद्यानों का कटोरा कहा जाने वाला इलाका पंजाब का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 50.36 लाख हेक्टेयर है. यह सिंचाई और जुताई के मामले में देश के अग्रणी इलाकों में से एक है. इसका तकरीबन 84 फीसदी भौगोलिक क्षेत्र (42.68 लाख हेक्टेयर) खेती के इस्तेमाल के दायरे में है. हालांकि, आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि कीटनाशकों और रासायनिक खादों के अनियंत्रित इस्तेमाल के कारण खेती वाले 39 फीसदी क्षेत्रफल में मिट्टी की गुणवत्ता में किसी न किसी रूप में गिरावट आई है. कटाव, जल स्तर संबंधी गड़बड़ियां और खारापन इन चीजों के कुछ खराब परिणाम के तौर पर सामने आए हैं.

'इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंजीनियरिंग रिसर्च एंड एप्लिकेशन' नामक जर्नल में छपे रिसर्च पेपर में यह बताया गया है कि मालवा इलाके का भूजल काफी प्रदूषित हो चुका है और यह पीने और अन्य मकसदों के लिहाज से ठीक नहीं है. जर्नल में छपे रिसर्च पेपर को तैयार करने के लिए जिन इलाकों में काम किया गया, उनमें भटिंडा, मुक्तसर, फिरोजपुर, फरीदकोट, मनसा, मोगा, बरनाला और संगरूर शामिल हैं.

रिसर्च पेपर में कहा गया है, 'मालवा क्षेत्र में हर साल प्रति 10 लाख लोगों पर 1,089 कैंसर के मामले पाए जाते हैं. मालवा के 11 में से 4 जिले विभिन्न तरह की घातक बीमारियों से प्रभावित हैं. इन बीमारियों के सबसे ज्यादा मामले मुक्तसर में पाए गए. इसके बाद मनसा, फरीदकोट और भटिंडा में पाए गए. अध्ययन इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि पीने का पानी (विशेष तौर पर मालवा क्षेत्र में) शरीर में फ्लोराइड और कीटनाशक समेत हेवी मेटल प्रवेश करने का जरिया बन सकता है.'

राज्य सरकार के साथ मिलकर पंजाब कृषि विश्वविद्यालय रासायनिक खादों के अनियंत्रित इस्तेमाल और इस इलाके में कैंसर के बढ़ते मामलों को लेकर जागरूकता अभियान चला रहा है.

ज्यादा से ज्यादा उत्पादन की कोशिश में हो रहा प्रकृति का दोहन

मिट्टी और पानी के संरक्षण को लेकर राज्य सरकार के संबंधित विभाग की तरफ से की गई एक अन्य स्टडी के मुताबिक, 'ज्यादा से ज्यादा खाद्यान उत्पादन करने की कोशिश के तहत बारी-बारी से सिर्फ गेहूं और धान जैसी फसलों की खेती किए जाने के कारण इस इलाके में मिट्टी और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का स्तर खराब हुआ है. अगर यह सिलसिला जारी रहता है, तो इससे खाद्यानों के उत्पादन स्तर में भी कमी आ सकती है, जो हरित क्रांत के बाद हासिल किए गए थे.

रासायनिक खादों, कीटनाशकों आदि के ज्यादा इस्तेमाल ने मिट्टी की गुणवत्ता को खराब कर दिया है और पानी को रोक कर रखने की इसकी क्षमता भी कम हो गई है. इसके अलावा मिट्टी की संरचना भुरभुरी और ढीली भी हो गई है.' रिसर्च में यह भी बताया गया है कि रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल के कारण मिट्टी से संबंधित सूक्ष्म वनस्पति और सूक्ष्म जीवों पर बुरी तरह से प्रभाव पड़ा है. ये वनस्पति और जीव मिट्टी में पोषक तत्वों को बनाए रखने में मददगार होते हैं, जो खेती-बाड़ी की बेहतरी के लिहाज से बेहद जरूरी है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

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पिछले कुछ वर्षों में मिट्टी की ऊर्वरक शक्ति और उपज के मामलों में गिरावट आई है. इसके कारण पौधों में लवणता और जैविक संबंधी दिक्कतों में बढ़ोतरी हुई है. नतीजतन, खेतों में रोगाणु और घास-फूस की समस्या का प्रचलन भी देखने को मिल रहा है. इन तमाम वजहों के कारण उपज में भारी कमी आई है. बाजार में ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थों की मांग काफी तेज होने के कारण पंजाब के किसानों को फसलों के अपने उत्पादन के तरीकों में अहम बदलाव करना होगा. राज्य के प्रमुख कृषि-अर्थशास्त्री जी सिंह ने बताया, 'पंजाब में भूजल का प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है. ऐसी तकनीक को विकसित करने की सख्त जरूरत है, जो हालात में बदलाव ला सके.'

हरे-भरे भविष्य की खातिर अभियान

आज भोतना की महिलाएं अपने घर और खेतों दोनों जगहों पर भिंडी, बैंगन, गाजर, मूली, सरसों आदि फसल ऑर्गेनिक तरीके से उपजा रही हैं. इस गांव की रहने वाली एक और महिला सतविंदर कौर गेहूं के सीजन के दौरान अपने खेतों में काम करती हैं और अपने घर के बाहर छोटी सी जगह पर सब्जियां उगाती हैं. उन्होंने बताया, 'यहां कैंसर से पीड़ित लोगों की संख्या में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी की खबरों से मुझे लगा कि अब हमें खेती में रासायनिक खादों का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए. हम नहीं चाहते कि हमारे आसपास के लोग मर जाएं.'

(लेखक पंजाब में स्वतंत्र पत्रकार और 101Reporters.com के सदस्य हैं. यह पोर्टल जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का देशभर का नेटवर्क है)

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