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हरियाणाः यहां हर 'पारो' कई बार बिकती है , बनती है नौकर, होता है रेप

मूल रूप से पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की सीमा से सटे एक गांव की रहने वाली रेहाना 58 साल की उम्र में ही आठ बार बिक चुकी है

Updated On: Feb 02, 2018 09:34 PM IST

FP Staff

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हरियाणाः यहां हर 'पारो' कई बार बिकती है , बनती है नौकर, होता है रेप

हां हर पारो की दास्तान तकरीबन एक सी है. छोटी सी उम्र में खरीदकर लाई जाती हैं. फिर उनका सौदा किसी और से कर दिया जाता है. जिंदगी जैसे नर्क बन जाती है. कोई खरीदकर लाई गई है तो कोई बहला-फुसलाकर. लेकिन सबके बारे में एक बात सामान्य है. वह है दोयम सामाजिक दर्जा और पहाड़ जैसा दुख. इनमें 15-16 साल की लड़कियां भी भी हैं जिन्हें अधेड़ों या बूढ़ों को बेच दिया गया है.

कौन हैं पारो 

'पारो' का मतलब होता है पार की गई, गायब की गई. हरियाणा में इन्हें कई जगहों पर मोलकी' दुल्हन भी कहते हैं. इसका मतलब होता है खरीदी हुई.

हरियाणा में शादी के लिए बड़े पैमाने पर दूसरे प्रदेशों से लड़कियां खरीदकर लाई जा रही हैं. इन गैर-हरियाणवी महिलाओं को ही यहां 'पारो' नाम दिया गया है. बाहर से लड़कियां उन लोगों के लिए लाई जाती हैं जिन्हें शादी के लिए हरियाणा की लड़कियां नहीं मिलतीं. इन्हें खाना बनाने, घर की सफाई करने और उपले बनाने जैसे काम पर लगाया जाता है. पारो सिर्फ एक नाम भर नहीं बल्कि यातना की दास्तान है. लगभग हर गांव में पारो कहलाने वाली औरतें मौजूद हैं, जो जुल्म का शिकार होती रहती हैं. जुल्म भी ऐसा कि सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएं. ऐसी महिलाओं के लिए उम्मीद और नाउम्मीद की खाई बहुत गहरी है.

क्यों मजबूरी हैं पारो?

हरियाणा, बेटियों को कोख में मारने के लिए कुख्यात है. 2011 की जनगणना के अनुसार हरियाणा में 1000 पुरुषों पर 834 और और 2001 में 819 महिलाएं थीं. सबसे खराब लिंगानुपात वाले देश के 10 में से 6 जिले हरियाणा के हैं. बिगड़ा लिंगानुपात दूसरे राज्यों की लड़कियों के शोषण का कारण बन रहा है. यहां 'पारो' दुल्हनों की मांग के चलते अपराधी लड़कियों का अपहरण करके भी उन्हें हरियाणा के 'जरूरतमंदों' को बेच देते हैं. पुलिस ने अगस्त 2017 में फतेहाबाद जिले के गांव बोदीवाली में असम की एक ऐसी नाबालिग लड़की को बरामद किया था, जिसे यहां पत्नी के तौर पर रखा गया था.

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अधिकांश पारो को अभी घर में कोई अधिकार नहीं है. उनकी उम्र चाहे जो हो, उन्हें 40-50 साल से लेकर 70 साल तक के लोगों को बेचा जाता है. जब इन बुजुर्गों की मौत हो जाती है तो इन महिलाओं को फिर से किसी दूसरे व्यक्ति को बेच दिया जाता है. वो कई बार बिकती हैं मगर तब भी कोई उनका पक्का ठौर ठिकाना नहीं होता. कई बार हरियाणा के लोग उन्हें सिर्फ सेक्स की इच्छापूर्ति करने और सस्ते श्रमिक के तौर पर यहां लाते हैं.

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इसलिए शादी के लिए असम, पश्चिमी बंगाल के बांग्लादेश से लगते हिस्सों, झारखंड, उडीसा, बिहार और मध्यप्रदेश आदि राज्यों से महिलाओं और गरीब लड़कियों को यहां शादी के लिए खरीदकर लाया जाने लगा है. ज्यादातर लड़कियां बेहद गरीब परिवारों की होती हैं.

सियासी मुद्दा हैं कुंवारे

इस प्रदेश में कुंवारे राजनीतिक मुद्दा भी हैं. हरियाणा के बीजेपी नेता ओम प्रकाश धनखड़ ने 2014 में हरियाणवी लड़कों की शादी को लेकर एक विवादित बयान दिया था. तब वह बीजेपी किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. उन्होंने कहा था कि 'अगर हरियाणा में बीजेपी की सरकार आती है तो यहां के कुंवारे लड़कों की शादी बिहार की लड़कियों से कराएंगे. बिहार में सुशील मोदी मेरा यार है, मैं ढंग से कुंवारों की शादियां करवाऊंगा. हरियाणा में कोई कुंवारा नहीं रहेगा.' आपको बता दें कि धनखड़ अब राज्य में कैबिनेट मंत्री हैं.

दूल्हा बनने के चक्कर में हो गई ठगी

हरियाणा में लड़कियों की इतनी कमी हो गई है कि अब दूल्हे दहेज लेने की बात तो दूर उल्टे पैसे देकर किसी तरह से शादी कर लेना चाहते हैं. दिसंबर 2017 के अंतिम सप्ताह में शादी करवाने के नाम पर हरियाणा के करीब सौ लड़कों से ठगी भी हो चुकी है.

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पत्नी पाने की चाहत में लड़कों ने एक महिला को 45-45 हजार रुपए भी दे दिए. महिला ने कहा था कि सोनीपत के खरखौदा इलाके में लड़कों को शादी के लिए एक बस लेने आएगी. बस से वे दिल्ली लाए जाएंगे जहां एक आश्रम में मौजूद लड़कियों से उनकी शादी करवाई जाएगी. लड़के शेरवानी पहनकर सड़क किनारे पांच घंटे तक खड़े रहे लेकिन बस नहीं आई. जब ठगी का एहसास हुआ तो उन्होंने पुलिस में शिकायत की. यह घटना बताती है कि हालात कितने गंभीर हैं. इसीलिए लोग दूसरे राज्यों की लड़कियों को खरीद रहे हैं.

दोयम दर्जे का जीवन

अभी तक बड़े स्तर पर इनके अधिकारों और सामाजिक, सांस्कृतिक स्टेटस के लिए आवाज नहीं उठी. डर के मारे ये महिलाएं जल्दी बोलती नहीं. बोलती हैं तो पुलिस और यहां के नेता उल्टे उनकी गरीबी का मजाक उड़ाते हैं. सामाजिक कार्यकर्ता जगमति सांगवान कहती हैं 'जब हरियाणा के नेताओं से इनके बारे में बात की जाती है तो वे बोलते हैं कि यहां उन्हें बासमती चावल, दाल...भरपेट भोजन मिल रहा है, क्या यह कम है?'

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जनवादी महिला समिति से जुड़ीं सांगवान पारो की जिंदगी से जुड़ी सच्चाई बताती हैं. वह कहती हैं कि 'पारो की जिंदगी दोयम दर्जे की होती है. वह रोज घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं. खरीदकर लाने वालों की बर्बरता सहती हैं. उन्हें नौकर की तरह रखा जाता है. सिर्फ बच्चा पैदा करने या शारीरिक जरूरतें पूरा करने के लिए इन्हें खरीदकर लाया जाता है. यह एक ही घर में अलग-थलग पड़ी रहती हैं.'

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जनवादी महिला समिति ने सरकार ने कहा था कि 'जब लाखों पारो आ चुकी हैं तो फिर सरकार उस पर व्हाइट पेपर क्यों नहीं लाती. उनका मैरिज रजिस्ट्रेशन हो ताकि उन्हें संपत्ति में अधिकार मिले. क्योंकि अब ये महिलाएं समाज की हकीकत बन चुकी हैं.'

लड़कियों की तस्करी के खिलाफ काम करने वाली शक्ति वाहिनी के संचालक ऋषिकांत कहते हैं कि 'पूरे हरियाणा में यह समस्या है. हर गांव में पारो हैं लेकिन जींद, रोहतक, पानीपत, हिसार, भिवानी, झज्जर में सबसे ज्यादा. मेवात के गांवों में इनकी संख्या ज्यादा है. असम, बंगाल, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा से सबसे ज्यादा लाई जाती हैं. यहां के लोगों की पहली पसंद असम और बंगाल की लड़कियां होती हैं. वो भी 16 से लेकर 25 साल तक की. शक्ति वाहिनी ने 2001 से अब तक हरियाणा में जबरन लाई गईं करीब 500 लड़कियों को छुड़वाया है.'

ऋषिकांत के मुताबिक 'अगर किसी महिला की किसी से शादी हुई है तो उसे उसकी संपत्ति में कानूनी रूप से अधिकार मिलना चाहिए, लेकिन पारो के मामले में ऐसा नहीं है. यदि पारो से लड़का पैदा हो जाए तो उसे शायद मिल जाए, लड़की पैदा हो जाए तो कुछ नहीं मिल सकता. इन्हें भूख और मजबूरी यहां लाती है.'

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इस मसले पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता शफीक उर रहमान कहते हैं, ' हमने 2001 से 2016 तक 86 गांवों को ट्रैक करके पारो के बारे में जानकारी जुटाई. हमने 200 घरों को एक गांव माना और पाया कि हर गांव में शादी के लिए 13 लड़कियां बाहर से लाई गई हैं. यहां लोग अनपेड वर्कर के रूप में भी गरीब लड़कियों को खरीदकर लाते हैं. ज्यादातर लड़कियां चार से दस बार तक बिकी हुई होती हैं.'

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इस फार्मूले पर यकीन करें तो हरियाणा में करीब एक लाख पारो मानी जा सकती हैं. हरियाणा में करीब सात हजार गांव हैं. hindi.news18.com की टीम ने हरियाणा की कुछ पारो से मिलने का फैसला किया. हमने इसके लिए गुड़गांव से सटे मेवात को चुना. इन पारो से बातचीत में हमारे सामने बड़ी दिक्कत ये थी कि उनके घर वालों को यह नागवार गुजरता. फिर भी हमने कोशिश करके बातचीत की.

मुनमुन: चार बार बिकी

हम दिल्ली से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित मेवात जिले के कंसाली गांव पहुंचे. यहां हमारी मुलाकात मुनमुन से हुई. मुनमुन मूल रूप से बिहार के अररिया जिले की हैं. वह याद करती हैं कि लगभग 10 साल की उम्र में उसे बेचा गया था लेकिन यह नहीं पता कि खरीदने वालों ने उसके घर पर कितने पैसे दिए थे. वह कहती हैं कि दो बार किसी और गांव में बिकी थी. इस गांव में भी अब वह दूसरे व्यक्ति के साथ है. चार बार बिकने के बाद जिंदगी कैसी हो जाती है, यह बताने से पहले ही उसके घर की एक महिला आ गई. इसलिए हम उनसे आगे बात नहीं कर पाए. हरियाणा में वह अकेली नहीं है जो ऐसी पीड़ा झेल रही है.

मेहरुन्निसा: आठ बार बिकी

शबनम, जीनत, फौजिया, जरीना और मेहरुन्निसा, ये सब नाम एक ही पारो के हैं. घागस गांव में रहती है. मूल रूप से पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की सीमा से सटे एक गांव की रहने वाली रेहाना 58 साल की उम्र में ही आठ बार बिक चुकी है.

सबसे पहले वह उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ के चौक घंटाघर में एक मजदूर की बीवी बनकर रही. फिर दिल्ली में शकील नाम के एक दिहाड़ी मजदूर ने उसे अपनी बीवी बना लिया. मजदूर ने अपनी बीमारी का इलाज कराने के लिए मात्र 700 रुपए में करीब 35 साल पहले गुड़गांव किसी व्यक्ति को बेच दिया. कुछ साल बाद तलाक मिलने के बाद यह महिला शबनम के नाम से मेवात के गांव किरंज में आ गई.

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इसके बाद इसे गांव बुखाराका में एक ड्राइवर ने अपनी जीवनसंगनी बनाया. फिर उसने घागस गांव के कुतबुद्दीन को बेच दिया. फिर इसे हाजी हिम्मत खां ने खरीदकर निकाह किया. अंतिम बार यह जोरमल के साथ रही, जिसकी मौत हो चुकी है. समाजसेवी राजुद्दीन जंग ने पारो मेहरुन्निसा को विधवा पेंशन, बीपीएल मकान व अन्य सरकारी सुविधाएं दिलाने में मदद की.

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इसके बाद हमने फिरोजपुर नमक नामक गांव में मेहनाज से बात की. उसने सिर्फ यह बताया कि वह धनबाद से खरीदकर लाई गई है. इसके अलावा उसने कुछ नहीं बोला क्योंकि उसे डर था कि कहीं इसकी वजह से उसके घर वाले परेशान न करें.

वाहिदा: बांग्लादेश टू हरियाणा

हम मूलथान गांव में वाहिदा से मिलने पहुंचे. उसने बताया कि वह मूल रूप से बांग्लादेश के खुलना जिले की है. यह पूछने पर कि वह बांग्लादेश से यहां कैसे पहुंची, वह चुप हो गई. उसकी बेबसी साफ दिख रही थी क्योंकि पास में ही उसका पति बैठा हुआ था.

जब हमारी सहयोगी अदरीजा बोस ने उससे बांग्ला में बात की तो उसका दर्द छलक पड़ा. वाहिदा ने कहा, 'उसके भाई की मानसिक हालात ठीक नहीं थी. उसे हावड़ा, कोलकाता में किसी मजार पर लाया गया था. वहां से उसे बहाला फुसलाकर दिल्ली लाया गया. बाद में इसे एक जगह बेचा गया. अब वह बांग्ला भी बोलती है और मेवाती बोली भी.'

बदल जाती है बोली, मिलती है नई पहचान

देश के सबसे खराब लिंगानुपात वाले जिलों में शुमार झज्जर जिले के ढाकला गांव में 15 साल पहले गुवाहाटी की बबिता लाई गई थी. अब वह हरियाणवी बोलती है. पूछने पर कहती है कि 'दिक्कतें तो होती हैं लेकिन क्या करूं. अब तो मेरे पांच बच्चे हो गए हैं. सब ठीक है.' इस इलाके में दूसरे प्रदेशों से लाई गई लड़कियों से शादी करवाने वाले कई एजेंट सक्रिय हैं.

गाय से कम कीमत है पारो की

पारो के अधिकारों के लिए काम करने वाली गौसिया खान मेवात के फिरोजपुर नमक में रहती हैं. उन्हें भी बेचने की कोशिश हुई थी लेकिन उन्होंने दबंगई से इसका विरोध किया. वह कहती हैं कि 'पुलिस बाहर से खरीदकर लाई जाने वाली लड़कियों का सहयोग नहीं करती. वो उड़े-कड़े की भाषा बोलती है और लड़कियां अपनी भाषा में. वह भी उल्टे लड़कियों को ही गलत नजर से देखती है. आज भी लड़कियां बिक रही हैं. लड़कों को लड़की नहीं मिलती इसलिए लाते हैं.

चाहे दुख से रहे चाहे सुख से. उन्हें तो बिकने के बाद रहना ही पड़ता है. कई बच्चों की मां से भी मारपीट होती है. 10, 15, 20 25, 50 हजार रेट है. मर्द की जितनी उम्र होगी उसे उतनी महंगी लड़की मिलती है.'

'यहां वो भी शादी करना चाहता है जिसके पैर कब्र में लटके हैं. पहली बार मैंने सितंबर 2016 में पारो की बेहतरी के लिए एक कार्यक्रम कर उनके अधिकार के लिए आवाज उठाई थी.'

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सर्वखाप पंचायत के कोर्डिनेटर एवं धनखड़ खाप के प्रधान ओपी धनखड़ कहते हैं, 'लड़कों की शादी का संकट आज का नहीं है. यह तो प्राचीन काल से चल रहा है. अब हम ऐसी शादियों को रजिस्टर्ड करवा रहे हैं, ताकि उन्हें सामाजिक स्टेटस मिले. शादी में जो लड़की वाला खर्च करता है, उसे लड़के वाले दे देते हैं. और खुशी से कोई कुछ भी खर्च कर दे उसकी मर्जी. हां, कुछ एजेंट भी शादी के नाम पर जरूरतमंदों से पैसे ऐंठ रहे हैं. वे इसी काम से अपनी कोठियां बनवा रहे हैं.'

कलंक धोने की कोशिश में हरियाणा

ऐसा नहीं है कि हरियाणा में लड़कियों की संख्या बढ़ाने का काम नहीं हो रहा. कुछ लोग संकीर्ण मानसिकता बदलने के लिए काम कर रहे हैं. बेटियों की भ्रूणहत्या की वजह से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' कार्यक्रम की शुरुआत भी 22 जनवरी 2015 को पानीपत (हरियाणा) से की थी.

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जींद जिले के बीबीपुर गांव के पूर्व सरपंच सुनील जागलान ने ‘सेल्फी विद डॉटर’ अभियान से लोगों की मानसिकता बदलने की कोशिश की. जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया.

हरियाणा की कल्पना चावला, साक्षी मलिक, दीपा मलिक और फोगाट बहनें जैसी कई बेटियों ने देश का मान पूरी दुनिया में बढ़ाया है. महिला हॉकी एवं महिला क्रिकेट में तो हमेशा यहां की बेटियों का दबदबा रहा है.

इसे देखकर अब बेटियों के प्रति लोगों का नजरिया बदल रहा है. राज्य सरकार ने दावा किया है कि 2017 में प्रति हजार लड़कों पर 914 लड़कियां हो गई हैं. यदि यह आंकड़ा सही है तो हरियाणा के समाज के लिए शुभ संकेत है. दूसरे राज्यों के बेटियों को पारो बनने से लड़कियों की बढ़ती संख्या ही रोक सकती है.

(न्यूज 18 के लिए ओम प्रकाश की रिपोर्ट) 

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