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बिखर रहा है राम रहीम का डेरा साम्राज्य, बड़ी तादाद में अनुयायियों ने की सिख धर्म में वापसी

राम रहीम को रेप के केस में सजा सुनाए जाने और उसके बाद पंचकूला सहित कई जगह हिंसा भड़कने के बाद कई डेरा अनुयायियों का मोहभंग हुआ है

Updated On: Nov 21, 2017 09:00 AM IST

Sat Singh, Vijay Jasuja

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बिखर रहा है राम रहीम का डेरा साम्राज्य, बड़ी तादाद में अनुयायियों ने की सिख धर्म में वापसी
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स्वघोषित संत गुरुमीत राम रहीम सिंह इंसा को जब से दो साध्वियों से बलात्कार के केस में 20 साल जेल की सजा सुनाई गई है, तब से हरियाणा के हिसार स्थित उसका विशाल डेरा सच्चा सौदा साम्राज्य खत्म होना शुरू हो गया है.

डेरा सच्चा सौदा 69 साल पुराना धार्मिक संगठन है. जिसकी सालाना आय 60 करोड़ रुपए से ज्यादा हुआ करती थी. इस आय पर डेरा को टैक्स भी नहीं चुकाना पड़ता था, क्योंकि उसे टैक्स भुगतान से छूट मिली हुई थी. डेरा सच्चा सौदा के मुख्यालय की स्थापना हरियाणा के सिरसा जिले में बहुत सोच समझ कर की गई थी, क्योंकि सिरसा वो जगह है जहां हरियाणा की सीमाएं पंजाब और राजस्थान से मिलती हैं.

डेरा सच्चा सौदा संप्रदाय शाह मस्ताना के नेतृत्व में 1948 में शुरू हुआ था. डेरा में ऊंच-नीच, जात-पात का भेदभाव न होने की वजह से यह संप्रदाय देखते ही देखते बहुत लोकप्रिय हो गया था. उस वक्त डेरा से ज्यादातर वो लोग जुड़े जो ऊंची जाति के सिखों के भेदभाव से नाराज और परेशान थे, क्योंकि ऊंची जाति के सिखों के पास गुरुद्वारों पर एकाधिकार हुआ करता था.

राम रहीम ने साल 1999 में शाह सतनाम से डेरा प्रमुख की गद्दी हासिल की थी, उसके बाद से डेरा की लोकप्रियता और संपत्ति में और इजाफा होना शुरू हो गया.

डेरा खुद को एक आध्यात्मिक संगठन के रूप में प्रचारित करता आ रहा है. इसके अलावा डेरा का यह भी कहना रहा है कि, डेरा का अनुयायी बनने के लिए भक्तों को अपना धर्म त्यागने की जरूरत नहीं है. यानी लोग अपने-अपने धर्म का पालन करने के साथ डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी बन सकते हैं क्योंकि वहां सिर्फ आध्यात्म का ज्ञान दिया जाता है.

धर्म न छोड़ने की सुविधा के चलते डेरा के अनुयायियों की संख्या लगातार बढ़ती रही. डेरा अनुयायियों में समानता की भावना से इसका खूब प्रचार हुआ और इलाके में रहने वाले सिख बड़ी तादाद में डेरा की तरफ आकर्षित होते रहे.

डेरा की गतिविधियों पर सिख संगठन शुरू से ही एतराज जताते आ रहे थे, जिसके चलते दोनों संगठनों के बीच कई बार टकराव भी हुआ. लेकिन साल 2007 में डेरा और सिख संगठनों के बीच टकराव उस वक्त अपने चरम पर पहुंच गया, जब बठिंडा में एक कार्यक्रम के दौरान राम रहीम सिखों के 10वें गुरु गुरु गोविंद सिंह की वेशभूषा में नजर आए.

राम रहीम की इस हरकत से सिख समुदाय भड़क गया, वहीं डेरा के अनुयायी राम रहीम के समर्थन में उतर पड़े. इस टकराव के चलते डेरा समर्थकों और सिखों के बीच कई जगह हिंसक झड़पें हुईं. राम रहीम को जान से मारने की धमकी भी दी गई. जिसके बाद राम रहीम को जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा मुहैया करा दी गई.

Sirsa: Followers of Dera Sacha Sauda chief Gurmeet Ram Rahim Singh gather at his 'ashram' in Sirsa on Thursday, ahead of the verdict in the rape trial of Ram Rahim. PTI Photo by Vijay Verma (PTI8_24_2017_000194B)

समाज में भेदभाव से मिला डेरा को बढ़ावा

वीरेंद्र भाटिया नाम के एक शख्स डेरा के बहुत बड़े आलोचक हैं. वो लंबे अरसे से लोगों को राम रहीम से सचेत रहने और उसके चंगुल में न फंसने के लिए आगाह करते आ रहे हैं. वीरेंद्र का मानना है कि, सिखों के डेरा से जु़ड़ने की सबसे अहम वजह उनके साथ हुआ भेदभाव है. ऊंची जाति के जाट सिखों का बर्ताव तथाकथित छोटी जाति के सिखों के साथ अच्छा नहीं था, यहां तक कि गुरुद्वारों तक में उनके साथ भेदभाव किया जाता था. जिसके चलते बड़ी संख्या में तथाकथित छोटी जाति के सिखों का रुझान डेरा की तरफ बढ़ा.

भाटिया के मुताबिक, 'पंजाब के गुरुद्वारों में ऊपरी जाति के सिखों का प्रभुत्व है, जबकि मजहबी सिख, राय सिख, ओध और रामदासिया समुदाय के साथ हमेशा से भेदभाव होता आया है, जिससे वो खुद को अपमानित महसूस करते थे. डेरा में इन लोगों को सम्मान और समानता का एहसास हुआ, जिसके चलते यह लोग डेरा के अनुयायी बनने लगे.'

सिखों का एक राज्य स्तरीय संगठन है- गुरुग्रंथ साहिब सत्कार सभा, जिसका मुख्यालय कुरुक्षेत्र में है. साल 2004 में गठित हुए गुरुग्रंथ साहिब सत्कार सभा का मकसद ऐसे सिखों को शिक्षित और जागरूक बनाना है, जिनका रुझान डेरा जैसे संप्रदायों की तरफ हो रहा है. इस संगठन के प्रमुख सुखविंदर सिंह खालसा ने बताया है कि, सिखों की सर्वोच्च संस्था अकाल तख्त ने भेदभाव के शिकार हुए लोगों की घर वापसी के लिए एक अभियान चलाया है.

खालसा का कहना है कि पंजाब के मालवा इलाके में सैकड़ों डेरा प्रेमियों ने 'जी आया नू' (वेलकम होम) कार्यक्रम के तहत गुरुद्वारा में 'सिरोपा' स्वीकार कर के सिख धर्म की मुख्यधारा में वापसी की है. खालसा के मुताबिक, 'राम रहीम का पर्दाफाश होने और डेरा सच्चा सौदा का कच्चा चिट्ठा खुलने के बाद उससे जुड़े परिवार सिख धर्म की ओर लौट रहे हैं. डेरा छोड़कर आ रहे लोगों का हम पूरे सम्मान और विनम्रता के साथ स्वागत कर रहे हैं. हम ऐसे लोगों के साथ अतीत में हुई गलतियों को दुरुस्त करना चाहते हैं.'

राम रहीम के जेल जाने के बाद से डेरा प्रेमियों के प्रार्थना स्थल 'नाम चर्चा घर' बंद हैं. जबकि राम रहीम की गिरफ्तारी से पहले डेरा प्रेमी हर रविवार को नाम चर्चा घर में इकट्ठा होकर प्रार्थना किया करते थे.

सिरसा के देसूजोधा गांव के रहने वाले राजिंदर सिंह का कहना है कि उनके परिवार के सभी आठ सदस्यों ने 9 साल तक नियमित रूप से डेरा की रविवार की प्रार्थनाओं में हिस्सा लिया. जबकि उनके बच्चों ने डेरा द्वारा संचालित संस्थानों में पढ़ाई की है.

राजिंदर के मुताबिक, 'हम अपने पड़ोसियों और मीडिया के जरिए पिताजी (राम रहीम को सभी डेरा प्रेमी पिताजी कहते हैं) के खिलाफ लगे आरोपों के बारे में सुना. डेरा में तो हम लोगों का ब्रेन वॉश कर दिया गया था, वहां हमें बताया जाता था कि राम रहीम एक पवित्र संत हैं और उन्हें साजिश के तहत फंसाया गया है.'

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डेरा प्रेमियों की दीवानगी

राजिंदर सिंह ने आगे बताया कि 25 अगस्त यानी जिस दिन राम रहीम को बलात्कार का दोषी ठहराया गया था, डेरा के प्रतिनिधियों ने उन्हें पंचकुला बुलाया था. डेरा के प्रतिनिधियों ने उनसे कहा था कि पंचकुला में एक समारोह होने जा रहा है, जिस पर फिल्म भी बनाई जाएगी, लिहाजा सभी अनुयायियों का उस समारोह में शामिल होना जरूरी है.

लेकिन जब राजिंदर पंचकुला पहुंचे तो उन्हें वहां कोई समारोह होता नजर नहीं आया, बल्कि जगह-जगह डेरा प्रेमी हंगामा और नारेबाजी करते मिले. इसी दौरान राम रहीम को सजा की खबर फैल गई और पंचकुला में हिंसा भड़क उठी. जान बचाने के लिए राजिंदर को एक जगह छिपना पड़ा.

राजिंदर सिंह ने इस बात से साफ इनकार किया है कि पंचकुला में इकट्ठा होने के लिए उन्हें या उनके किसी साथी को डेरा की तरफ से पैसे दिए गए थे. हालांकि हरियाणा पुलिस का दावा है कि, राम रहीम की गोद ली हुई बेटी हनीप्रीत इंसा ने पंचकूला में हिंसा फैलाने के लिए अपने दो विश्वासपात्र लोगों के जरिए डेरा प्रेमियों को 1.25 करोड़ रुपए बांटे थे.

राम रहीम की पोल खुलने के बाद राजिंदर सिंह का डेरा से मोह भंग हो गया. राजिंदर के मुताबिक, 'पंचकुला हिंसा के एक महीने बाद मैं सिख धर्म में वापस लौट आया. अब मैंने सिख धर्म की शिक्षाओं, नीतियों और मूल्यों का हमेशा पालन करने की कसम खाई है.'

सिरसा के दबवाली इलाके की रहने वाली डेरा की पूर्व अनुयायी ममता रानी का कहना है कि पति और बेटे के जबरदस्त विरोध के बावजूद वह डेरा में शामिल हुई थीं, क्योंकि तब कई महिलाओं ने उन्हें राम रहीम के बारे में बढ़-चढ़ कर बताया था. राम रहीम के चमत्कारों की बात सुनकर वो उनसे प्रभावित हो गईं थी.

ममता के मुताबिक, 'मुझे राम रहीम के बारे में जो कुछ बताया गया था, मैं उस पर अंधा विश्वास करने लगी थी. मैं राम रहीम को ईश्वर के समान मानती थी. लेकिन राम रहीम की करतूतों ने उसके हम जैसे भक्तों को बुरी तरह से शर्मिंदा किया'. ममता अब सिख धर्म में वापस लौट आई हैं और स्थानीय गुरुद्वारे में नियमित रूप से जाती हैं.

जबकि सिरसा के रनिया इलाके के निवासी ज्ञान चंद भी राम रहीम के बड़े भक्त हुआ करते थे. ज्ञान चंद धर्म से हिंदू हैं और जाति से ओबीसी की श्रेणी में आते हैं. ज्ञान चंद के मुताबिक, पड़ोसियों और रिश्तेदारों की देखा देखी करीब 12 साल पहले वो डेरा सच्चा सौदा संप्रदाय में शामिल हुए थे.

राम रहीम के समर्थकों ने सजा के फैसले के बाद बहुत हिंसा फैलाई. ये सब अंधभक्ति का नतीजा है.

राम रहीम के समर्थकों ने सजा के फैसले के बाद बहुत हिंसा फैलाई. ये सब अंधभक्ति का नतीजा है.

ज्ञान चंद्र का कहना है कि, जब वो पहली बार डेरा पहुंचे तो उन्हें वहां सम्मान और बराबरी देखने को मिली. जिसके बाद वो अपने परिवार के साथ नियमित रूप से डेरा जाने लगे. लेकिन उनके परिवार को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब उन्होंने बलात्कार केस में राम रहीम को सजा की खबर सुनी. इस खबर ने राम रहीम और डेरा पर ज्ञान चंद के विश्वास को चकनाचूर कर दिया.

ज्ञान चंद के मुताबिक, 'लोग जब डेरा की आलोचना करते थे, तब हम नैतिकता की दलील देकर उन्हें चुप करा देते थे. लेकिन जब देश के कानून ने राम रहीम को बलात्कार का दोषी पाया, तब मेरे जैसे डेरा प्रेमियों के लिए समाज का सामना करना मुश्किल हो गया. अब राम रहीम के सभी उपदेशों ने अपनी प्रासंगिकता खो दी है.'

ज्ञान चंद ने आगे कहा, 'अब हम राम रहीम को कभी पिताजी नहीं पुकारेंगे. हमें नहीं पता था कि ऐसे दिन भी देखने पड़ेंगे'. ज्ञान चंद का कहना है कि उन्होंने अपना एमएसजी लॉकेट और राम रहीम की फोटो को घग्घर नदी में फेंक दिया है.

रोजगार की आड़ में डेरा का प्रचार

डेरा सच्चा सौदा के एमएसजी होटल में बतौर सेल्समैन काम करने वाले राहुल सेतिया ने बताया कि, डेरा होटलों और रेस्तरां की एक श्रृखंला चलाता है. इसके अलावा डेरा के कई कारखाने, शैक्षिक और चिकित्सा संस्थान भी हैं. इन सभी संस्थानों में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के हजारों लोगों को रोजगार मिला.

सिरसा में डेरा के 700 एकड़ में फैले आश्रम में निर्माण कार्य और लगभग 500 एकड़ के खेतों पर काम के लिए हर साल सैकड़ों कुशल और अकुशल मजदूरों की जरूरत पड़ती है. लेकिन अपने यहां रोजगार देने से पहले डेरा लोगों को एक अलिखित समझौता मानने के लिए मजबूर कर देता है. इस अलिखित समझौते के तहत रोजगार पाने वाले लोगों के परिवार का हर हाल में डेरा का अनुयायी बनना अनिवार्य है, साथ ही इन लोगों को डेरा का प्रचार करने के लिए भी मजबूर किया जाता है.

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उत्तर प्रदेश के निवासी सुनील कुमार ने बताया कि, 'मैं अपने राज्य के 20 अन्य लोगों के साथ डेरा में निर्माण का काम करता था, हम रोजाना 18 घंटे की राजगीरी (चिनाई) के काम के लिए प्रति माह 15,000 रुपए कमाते थे. हमारे लिए एमएसजी लॉकेट पहनना अनिवार्य था'. लेकिन राम रहीम को बलात्कार केस में जेल होने के बाद सुनील ने डेरा में काम करना छोड़ दिया है, यही नहीं उन्होंने अपना एमएसजी लॉकेट भी फेंक दिया है.

सत्कार सभा के सदस्य बलजीत सिंह दादूवाल का कहना है कि, डेरा प्रेमियों अपने नाम चर्चा घर में जाने और वहां प्रार्थना करने से कोई नहीं रोक रहा है, लेकिन फिर भी वो वहां नहीं जा रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि उनका डेरा से मोह भंग हो चुका है. अब डेरा प्रेमी धीरे-धीरे गुरुद्वारों की ओर रुख कर रहे हैं.

दादूवाल के मुताबिक, 'रोजगार और वित्तीय लाभ के चलते लोग डेरा की तरफ आकर्षित हुए थे. लेकिन अब डेरा का पूरा तंत्र बिखर गया है, लिहाजा अब अक्ल आने के बाद लोग फिर से सिख धर्म की तरफ लौटने लगे हैं.'

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