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क्या बदलेगी पश्चिम बंगाल के साढ़े चार लाख चाय मजदूरों की किस्मत?

महज 150 रुपए की दैनिक मजदूरी से गुजारा कैसे चलता होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. 6 अगस्त को इस संबंध में बड़े फैसले की उम्मीद चाय मजदूर लगाए हैं, पर पुराने अनुभवों को देखते हुए संशय भी कम नहीं हैं.

Sarojini Bisht Sarojini Bisht Updated On: Aug 05, 2018 07:34 PM IST

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क्या बदलेगी पश्चिम बंगाल के साढ़े चार लाख चाय मजदूरों की किस्मत?

मजदूर आंदोलन की जमीन कहे जानेवाले पश्चिम बंगाल में चाय मजदूर न्यूनतम मजदूरी तक से वंचित हैं. महज 150 रुपए की दैनिक मजदूरी से गुजारा कैसे चलता होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. 6 अगस्त को इस संबंध में बड़े फैसले की उम्मीद चाय मजदूर लगाए हैं, पर पुराने अनुभवों को देखते हुए संशय भी कम नहीं हैं.

एक आम उत्तर भारतीय की सुबह की शुरुआत बिना चाय के नहीं होती. लेकिन, चाय की चुस्कियों से खुद को तरोताजा करनेवाले लोगों का ध्यान शायद ही उन चाय मजदूरों की बदहाली की ओर जाता होगा, जिनके खून-पसीने से चाय उगती है. भारत में चाय मुख्य रूप से पूर्वी और दक्षिण भारत में उगती है. पूर्वी भारत में दो सबसे बड़े चाय उत्पादक हैं- असम और पश्चिम बंगाल. पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से में स्थित दार्जीलिंग की पहाड़ियां, उसकी तराई और भूटान सीमा तक फैला मैदानी क्षेत्र जिसे डुआर्स कहा जाता है, चाय बागानों से आच्छादित हैं.

दूर-दूर तक फैले चाय बागानों की मनमोहक हरियाली इनमें काम करनेवालों मजदूरों की जिंदगी के अंधेरे को ढक लेती है. अंग्रेजों के जमाने में अच्छे भविष्य की उम्मीद लेकर 150-200 साल पहले आज के झारखंड क्षेत्र से लाखों की संख्या में आदिवासी उत्तर बंगाल आए और इसी इलाके को अपना घर-द्वार मान लिया.

चाय बागानों में कई पीढ़ियां गुजर जाने के बाद अब इनकी स्थिति 'जाएं तो जाएं कहां' वाली हो गई है. बीते कुछ दशकों में बहुत से बागान बंद या बीमार पड़ चुके हैं. इसके अलावा मजदूरी इतनी कम है कि गुजारा चलना मुश्किल है. बीते एक-दो सालों से राज्य सरकार की कोशिशों से चाय बागानों में भुखमरी की घटनाएं काफी हद तक थम गई हैं, लेकिन गरीबी, बदहाली का दंश वैसा ही है.

वेतन समझौता प्रणाली खत्म करने की मांग

यह अपने आप में किसी विडंबना से कम नहीं है कि मजदूर आंदोलन की जमीन कहे जानेवाले पश्चिम बंगाल में चाय मजदूर अभी तक न्यूनतम मजदूरी का हक भी हासिल नहीं कर पाए हैं. बंगाल के चाय बागानों में मजदूर पक्ष, मालिक पक्ष और श्रम विभाग के बीच एक त्रिपक्षीय समझौते के जरिए मजदूरी तय होती है. इस समझौते का आम तौर पर तीन-तीन साल पर नवीकरण किया जाता है. लेकिन अब चाय मजदूर इस व्यवस्था को खत्म करना चाहते हैं.

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इस संबंध में 24 चाय मजदूर यूनियनों के साझा संगठन 'ज्वाइंट फोरम' के संयोजक जियाउल आलम कहते हैं कि अब न्यूनतम मजदूरी व्यवस्था से कम कुछ भी कबूल नहीं किया जाएगा. यानी कि मजदूरी त्रिपक्षीय समझौते की जगह सरकार की ओर से तय हो, जो जीवनयापन के लिए जरूरी खर्च और वर्तमान बाजार दर पर आधारित हो और उससे कम भुगतान को गैरकानूनी माना जाए. लेकिन न्यूनतम मजदूरी लागू होने में देरी को देखते हुए जनवरी, 2018 में एक बार फिर त्रिपक्षीय समझौते के जरिए 17.50 रुपए की अंतरिम बढ़ोत्तरी करते हुए चाय मजदूरों की दैनिक मजदूरी 132.50 से 150 रुपए की गई. इस मजदूरी का साप्ताहिक या पाक्षिक भुगतान किया जाता है.

कोई यह सोच सकता है कि आज के समय में 150 रुपए में गुजर-बसर कैसे होता होगा, पर इसका भी श्रेय लेने की होड़ है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गत 12 जुलाई को सिलीगुड़ी मिनी सचिवालय में चाय उद्योग से जुड़े मसलों पर बैठक के बाद कहा, 'वाम शासन के समय चाय श्रमिकों की मजूदरी मात्र 67 रुपए थी. लेकिन मां-माटी-मानुष की सरकार में मात्र सात वर्षों में (2011 से अब तक) यह तकरीबन ढाई गुना बढ़कर 159 रुपए हो गई है. अब इसे बढ़ाकर 176 रुपए करने का लक्ष्य है. वाम और अन्य विरोधी दलों की ट्रेड यूनियनों के नेता राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं, पर हकीकत यह है कि वाम जमाने में मजदूरी किसी वर्ष एक रुपए तो किसी वर्ष तीन रुपए ही बढ़ती थी.'

ढाई गुना हुई मजदूरी, कितना सच?

अभी चाय मजदूरों की मजदूरी 150 रुपए है, जबकि ममता बनर्जी ने इसे 159 रुपए बताया है. इस बारे में दार्जीलिंग तराई डुआर्स प्लांटेशन लेबर यूनियन के नेता भरत ठकुरी बताते हैं कि दरअसल नौ रुपए राशन के हैं. पहले बागान मालिक राशन उपलब्ध कराते थे, लेकिन अब राज्य सरकार पीडीएस के तहत प्रत्येक परिवार को महीने में 35 किलो चावल दो रुपए किलो की दर से उपलब्ध करा रही है. यानी मालिक पक्ष महज नौ रुपए देकर राशन देने की जिम्मेदारी से मुक्त. अंतरिम वृद्धि से पहले जो पिछला मजदूरी समझौता हुआ था, उसमें न्यूनतम मजदूरी 289 रुपए तय हुई थी. इसमें से 132.50 रुपए का नकद भुगतान होना था. बाकी के 157 रुपए राशन, मेडिकल, जलावनी लकड़ी और अन्य सुविधाओं के बदले में थे. इसमें राशन का हिस्सा 24 रुपए का है. जबकि बागान मालिक नौ रुपए ही दे रहे हैं.

चाय बागान प्लाटेंशन लेबर एक्ट, 1951 के तहत आते हैं. इसमें मालिक-मजदूर संबंध अन्य उद्योगों से अलग किस्म के हैं. यह संबंध कुछ-कुछ जमींदार और उसकी प्रजा जैसा है. यानी श्रमिकों के रहने, खाने-पीने, स्वास्थ्य, शिक्षा सभी कुछ की व्यवस्था करना बागान मालिकों की जिम्मेदारी है. इसलिए अन्य उद्योगों की तुलना में यहां नकद मजदूरी कम होती है. लेकिन, धीरे-धीरे तस्वीर बदलने लगी. मालिकों ने मजदूरों की सुविधाओं में कटौती करना शुरू कर दिया.

उनके आवासों की मरम्मत बंद करवा दी गई. बागानों के अस्पताल खुद बीमार रहने लगे. अंत में नौबत यहां तक आई कि राशन भी बंद कर दिया गया. आज हाल यह है कि चाय बागानों के मजदूर राशन, स्वास्थ्य, शिक्षा के लिए पूरी तरह सरकारी तंत्र पर निर्भर हैं. यानी की मजदूरों की बुनियादी जरूरतें सरकार पूरी कर रही है और उसका खर्च बागान मालिक मजदूरों के वेतन से काट करके अपनी जेब भर रहे हैं. कहने को तो मजदूरी सात सालों में ढाई गुना हो गई है, लेकिन मजदूरों की जरूरतों और सुविधाओं में की गई कटौती इसे बेमानी बना देती है.

11 बैठकों के बाद अब 6 अगस्त को बड़ी उम्मीद

ममता सरकार ने 2015 में चाय बागानों के लिए न्यूनतम मजदूरी सलाहकार कमेटी का गठन किया. तब से लेकर अब तक इस 29 सदस्यीय कमेटी की 11 बैठकें हो चुकी हैं, पर नतीजा शून्य रहा. गत 13 जुलाई को कोलकाता में हुई बैठक में भी बस इतना हुआ कि अगली बैठक की तारीख 30 जुलाई तय कर दी गई. इस बार बहाना यह रहा कि कमेटी के समक्ष राज्य सरकार की ओर 2015 में 158 रुपए न्यूनतम मजदूरी का प्रस्ताव रखा गया था. तब से काफी समय बीत गया है, इसलिए वर्तमान दर के अनुरूप नई गणना करने के लिए अगली बैठक 30 जुलाई तक टाल दी जाए.

अब 30 जुलाई की जगह 6 अगस्त को बैठक रखी गई है. इस दिन सिलीगुड़ी स्थित मिनी सचिवालय में त्रिपक्षीय बैठक बुलाई गई है, जिसमें श्रम मंत्री को भी मौजूद रहना है. इस दिन की बैठक पर बंगाल के लगभग 350 चाय बागानों के करीब साढ़े चार लाख चाय मजदूरों और वहां बसे 12 लाख निवासियों की नजरें टिकी हुई हैं. इस बैठक में न्यूनतम मजदूरी की घोषणा के आश्वासन को देखते हुए चाय श्रमिक संगठनों के ज्वाइंट फोरम ने भी चाय बागानों में घोषित तीन दिवसीय हड़ताल स्थगित कर दी, जो 23 से 25 जुलाई तक होनी थी.

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तस्वीर: सरोजिनी बिष्ट

आर-पार की लड़ाई के मूड में चाय मजदूर

सालों से बदहाली झेल रहे चाय मजदूर अब अपने हक के लिए आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं. हड़ताल भले अभी टल गई हो, पर इसकी तैयारी के लिए जून-जुलाई में जिस तरह हर चाय बागान की गेट मीटिंगों में मजदूरों की गोलबंदी दिखी, उससे इसका संकेत साफ तौर पर मिल गया है. दक्षिण भारत की बात करें तो वहां के प्रमुख चाय उत्पादक राज्य केरल और तमिलनाडु पहले ही न्यूनतम मजूदरी व्यवस्था लागू कर चुके हैं.

हाल ही में पड़ोस के असम में भी न्यूनतम मजदूरी सलाहकार कमेटी ने न्यूनतम मजदूरी 351 रुपए तय कर दी है. इसमें सुविधाओं के रूप में मिलनेवाली रकम भी शामिल है. बागान मालिकों के संगठन की आपत्तियों के निवारण के बाद यह मजदूरी जल्द ही अधिसूचित हो जाने की उम्मीद है. इस बीच अंतरिम रूप से वहां मजदूरी को 137 रुपए नकद से बढ़ाकर 167 रुपए कर दिया गया है. इसे देखते हुए बंगाल के चाय श्रमिक भी अपने हक के लिए बेचैन हो उठे हैं.

राज्य में अन्य क्षेत्रों के मजदूरों की बढ़ती मजदूरी को देखते हुए भी चाय कामगारों में रोष है. बंगाल सरकार ने इसी 1 जुलाई से कृषि क्षेत्र के अकुशल मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी 244 रुपए अधिसूचित की है. ऐसे में, हाथी, तेंदुए, बाइसन जैसे जंगली जानवरों के हमलों को झेलनेवाले, बारिश-धूप से बेपरवाह काम करनेवाले चाय मजदूर जब अपनी मजदूरी को देखते हैं तो ठगा हुआ महसूस करते हैं. आखिर सब्र करें तो भी कब तक!

(लेखिका महिला संगठन  ऑ ल इंडिया प्रोग्रेसिव  वीमेंस एसोसिएशन- ऐपवा की सदस्य और स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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