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मुजफ्फरपुर कांड की जांच का हश्र बॉबी हत्या कांड जैसा होगा या चारा घोटाले की तरह ?

मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौन हिंसा कांड की जांच के सिलसिले में सी.बी.आई. बॉबी कांड दुहराएगी या चारा घोटाला प्रकरण ?

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Jul 27, 2018 07:27 AM IST

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मुजफ्फरपुर कांड की जांच का हश्र बॉबी हत्या कांड जैसा होगा या चारा घोटाले की तरह ?

मुजफ्फरपुर बालिका गृह यौन हिंसा कांड की जांच के सिलसिले में सी.बी.आई. बॉबी कांड दुहराएगी या चारा घोटाला प्रकरण ? सी.बी.आई. ने 1983 के बॉबी हत्याकांड को तो उच्चस्तरीय दबाव में रफा-दफा कर दिया लेकिन चारा घोटाले में दो पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित अनेक प्रभावशाली लोगों को अदालतों से सजा दिलवा दी.

बॉबी हत्या कांड और चारा घोटाले की जांच में फर्क यह था कि चारा घोटाले की जांच की सतत निगरानी पटना हाईकोर्ट कर रहा था तो बॉबी हत्याकांड की जांच की देखभाल करने वाला कोई नहीं था. बल्कि बॉबी केस में सी.बी.आई पर इस बात के लिए उच्चस्तरीय दबाव था कि तत्कालीन सत्ताधारी नेताओं को साफ बचा लेना है.

सी.बी.आई ने इस मामले में पालतू तोते की भूमिका निभाई. चर्चित बॉबी हत्या कांड में जहां सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के बड़े-बड़े नेता प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से संलिप्त थे, तो वहीं चारा घोटाला तो सर्वदलीय घोटाला था. सिस्टम के सारे अंग उसमें संलिप्त थे. मुजफ्फरपुर भीषण यौन शोषण कांड में जिन लोगों की संलिप्तता के आरोप हैं, उनमें अफसर, पत्रकार, समाजसेवी और सत्ताधारी नेता तक शामिल बताए जाते हैं. धीरे-धीरे रहस्य से पर्दा हट रहा है. यदि मुजफ्फरपुर कांड की सी.बी.आई जांच की सही ढंग से निगरानी नहीं हुई तो इसकी तार्किक परिणति क्या होगी, यह कहना कठिन है, क्योंकि आरोपी काफी ऊपर तक पहुंच वाले हैं.

ताजा मुजफ्फरपुर यौनशोषण कांड के बहाने बिहार के चर्चित बॉबी हत्याकांड को एक बार फिर याद कर लेना मौजूं होगा. साथ ही यह भी कि जिस केस में महाप्रभु लोग संलिप्त होते हैं, उसमें जांच एजेंसियां किस तरह निर्लज्ज तरीके से केस को खा-पका जाती हैं. कुछ सत्ताधारी नेताओं को बचाने के लिए सी.बी.आई ने 1983 में हुई श्वेत निशा त्रिवेदी उर्फ बॉबी की हत्या को आत्म हत्या करार देकर उसे रफा-दफा कर दिया था. जांच एजेंसी ने उच्चस्तरीय दबाव के कारण ऐसा किया.

उन दिनों के एक कांग्रेसी विधायक ने हाल में यह तर्क दिया है, 'यदि बॉबी सेक्स स्कैंडल को हम तब रफा-दफा नहीं करवाते तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता.' बिहार विधान सभा सचिवालय की अति सुंदर महिला टाइपिस्ट बॉबी को जहर दिया गया जिससे 7 मई 1983 को उसकी मौत हो गई. उस समय यह आम चर्चा थी कि किसने जहर दिया.'

बॉबी बिहार विधान परिषद की सभापति और कांग्रेसी नेत्री राजेश्वरी सरोज दास की गोद ली हुई बेटी थी. हत्या सभापति के पटना स्थित सरकारी आवास में ही हुई.

Shwet nisha trivedi alias bobby

श्वेत निशा त्रिवेदी उर्फ बॉबी की हुई रहस्यमय मौत से बिहार की राजनीति में भूचाल आ गया था

हड़बड़ी में लाश को कब्र में दफना दिया गया. दो डॉक्टरों से निधन के कारणों से संबंधित जाली सर्टिफिकेट ले लिए गए. एक डॉक्टर ने लिखा कि आंतरिक रक्त स्त्राव से बॉबी की मृत्यु हुई. दूसरे ने लिखा कि अचानक हृदय गति रुक जाने से मृत्यु हुई.

इस रहस्यमय हत्या के बारे में दैनिक ‘आज’ और ‘प्रदीप’ में खबरें छपने के बाद तत्कालीन वरीय पुलिस अधीक्षक किशोर कुणाल ने कब्र से लाश निकलवाई. लाश का पोस्ट मार्टम हुआ. बिसरा में मेलेथियन जहर पाया गया. सभापति के आवास में रहने वाले दो युवकों को पकड़कर पुलिस ने जल्दी ही पूरे केस का रहस्योद्घाटन कर दिया. खुद राजेश्वरी सरोज दास ने 28 मई 1983 को अदालत में दिए गए अपने बयान में कहा कि बॉबी को कब और किसने जहर दिया था. हत्याकांड तथा बॉबी से जुड़े अन्य तरह के अपराधों के तहत प्रत्यक्ष और परोक्ष ढंग से कई छोटे-बड़े कांग्रेसी नेता संलिप्त पाए गए थे. एक स्त्री की भावनाओं से अनेक महा प्रभुओं द्वारा खेले जाने और बाद में उसे खत्म कर देने की कहानी बॉबी की संक्षिप्त कहानी रही. उन नेताओं की गिरफ्तारी होने ही वाली थी कि करीब सौ कांग्रेसी विधायकों ने तत्कालीन मुख्य मंत्री डॉ.जगन्नाथ मिश्र का घेराव करके उनसे कहा कि आप जल्द केस को सी.बी.आई को सौंपिए अन्यथा आपकी सरकार गिरा दी जाएगी.

राज्य सरकार ने 25 मई 1983 को इस केस की जांच का भार सी.बी.आई को सौंप दिया. उधर सी.बी.आई पर भी उच्चतम स्तर से दबाव पड़ा और केस अंततः रफा-दफा हो गया. दरअसल दबाव संभव हो सके, इसीलिए सी.बी.आई से जांच करवाई गई. उससे पहले पटना के एस.एस.पी किशोर कुणाल किसी दबाव में नहीं आ रहे थे.

सत्ताधारी नेताओं को बचाने की हड़बड़ी में सी.बी.आई ने बेसिर पैर की कहानी गढ़कर कोर्ट में फाइनल रिपोर्ट लगा दी. हत्या को आत्महत्या का रूप दे दिया गया था.

उससे पहले इस केस के अनुसंधान के सिलसिले में सी.बी.आई की टीम ने कभी पटना पुलिस से संपर्क नहीं किया. सी.बी.आई ने अपने ऑफिस में बैठकर पूरी फाइनल रपट बना दी. उसने किसी फिल्म कथा लेखक से मदद ली होती तो सी.बी.आई को अधिक तार्किक कहानी मिल गई होती.

सी.बी.आई ने फाइनल रिपोर्ट में लिखा कि बॉबी ने सेंसिबल टेबलेट खाकर आत्म हत्या कर ली, क्योंकि उसके प्रेमी ने उसे धोखा दिया था. सी.बी.आई ने यह भी लिखा कि अस्पताल के रास्ते में बॉबी को पतला पखाना हो रहा था. चिकित्सक बताते हैं कि सेंसिबल टेबलेट खाने से भयानक कब्ज होता है. चिकित्सीय इतिहास के अनुसार 84 सेंसिबल टेबलेट खाकर भी मरीज जिंदा बच चुका है, तो क्या बॉबी ने 85 या सौ टेबलेट खाई ?

जब आत्म हत्या के लिए बेहतर आसान तरीके उपलब्ध हैं तो कोई इतने अधिक टेबलेट खाने की जहमत भला क्यों उठाएगा ? पोस्ट मार्टम रिपोर्ट या बिसरा जांच रपट में कहीं भी सेंसिबल टेबलेट का नामोनिशान नहीं मिला था, बल्कि मेलेथियन का अंश पाया गया. सी.बी.आई ने कहा कि पटना फॉरेंसिक लेबोरेटरी में रखे किसी अन्य के बिसरा का मेलेथियन बॉबी के बिसरा में मिल गया होगा. दूसरी ओर पटना फोरेंसिक लेबोरेटरी के अफसर ने लिख कर दिया कि सी.बी.आई को हमारे यहां से किसी ने ऐसी कोई बात नहीं कही. यहां ऐसी लापारवाही नहीं बरती जाती कि एक दूसरे का बिसरा आपस में मिल जाए. बॉबी की आत्महत्या की कहानी को सही साबित करने के लिए सी.बी.आई ने एक ऐसे काल्पनिक पत्र को आधार बनाया जिसका अस्तित्व ही नहीं था. सीबी.आई के अनुसार बॉबी ने 6 मई 1983 की रात में अपने प्रेमी रतन जगवानी के नाम यह पत्र लिखा कि मैंने आत्महत्या के लिए जहर खा लिया है. सी.बी.आई के अनुसार रतन बॉबी से शादी करने के लिए तैयार नहीं था. बॉबी ने यह पत्र निर्भय को इसलिए दिया कि वह यह पत्र जगवानी को दे दे.

निर्भय ने दूसरे दिन यह कथित पत्र रतन को दे दिया. रतन ने यह पत्र पढ़कर निर्भय को लौटा दिया. आश्चर्य है कि यह पत्र निर्भय ने कैसे राजेश्वरी सरोज दास से छिपाए रखा! सी.बी.आई के अनुसार बॉबी की मौत के बाद राजेश्वरी और निर्भय ने मिलकर इस पत्र को बॉबी के अन्य कागजात के साथ जला दिया. यदि आत्महत्या की बात सही होती तो यह पत्र राजेश्वरी के बचाव के काम आ सकता था, फिर उन्होंने इसे क्यों जला दिया ? सी.बी.आई की इस कहानी पर किसी को विश्वास नहीं था. सच्चाई तो यह थी कि वैसा कोई पत्र था ही नहीं.

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याद रहे कि बॉबी की मौत के तीन दिन बाद रतन की शादी होने वाली थी. हालांकि जांच में लगी पटना पुलिस के एक अफसर के अनुसार बॉबी ऐसी लड़की नहीं थी जिसका किसी एक व्यक्ति से स्थायी और भावनात्मक संबंध हो. सवाल यह भी है कि सबूत छिपाने के आरोप में सी.बी.आई ने राजेश्वरी सरोज दास पर केस क्यों नहीं किया? सी.बी.आई की फाइनल रपट में अन्य कई विरोधाभास थे.

इसके बावजूद सी.बी.आई. के जांच अधिकारी के.एन.तिवारी ने पटना के विशेष न्यायिक दंडाधिकारी एच.पी.चक्रवर्ती की अदालत में फाइनल रिपोर्ट लगा दी. अदालत ने 18 मई 1984 को इस केस को बंद कर दिया. पूर्व वी.सी. देवेंद्र प्रसाद सिंह सहित पटना के कुछ गणमान्य व्यक्तियों ने चक्रवर्ती के इस फैसले के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की. हाईकोर्ट ने उसे खारिज कर दिया. याद रहे कि तब तक जनहित याचिका का दौर शुरू नहीं हुआ था.

दूसरी ओर, चारा घोटाले की जांच के सिलसिले में मुख्य जांच कर्ता सी.बी.आई के संयुक्त निदेशक यू.एन.विश्वास पर जब-जब राजीतिक व गैर राजनीतिक दबाव पड़ा, तब-तब पटना हाईकोर्ट की निगरानी बेंच ने विश्वास का बचाव किया. नतीजतन चारा घोटाला केस को तार्किक परिणति तक पहुंचाया जा सका. लोगबाग उम्मीद कर रहे थे कि यदि मुजफ्फरपुर यौन शोषण कांड की सी.बी.आई.जांच की अदालती निगरानी होती तो कोई महापापी बच नहीं पाती. याद रहे कि इस मामले में आरोपियों को मीडिया ने ‘महा पापी’ का दर्जा दे दिया है.

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. )

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