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चुनावों में बीजेपी की कितनी मदद कर पाएंगी क्रेडिट एजेंसियों की रेटिंग?

मोदी सरकार के पास बताने को एक और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक रेटिंग हो गई बताने के लिए आलोचकों को कि विश्व बैंक की शाबाशी के बाद मूडीज की शाबाशी भी मोदी सरकार को मिली है

Updated On: Nov 17, 2017 06:40 PM IST

Alok Puranik Alok Puranik
लेखक आर्थिक पत्रकार हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय में कामर्स के एसोसिएट प्रोफेसर हैं

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चुनावों में बीजेपी की कितनी मदद कर पाएंगी क्रेडिट एजेंसियों की रेटिंग?

प्रख्यात इंटरनेशनल क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारतीय अर्थव्यवस्था की रेटिंग बीएए3 से बढ़ाकर बीएए2 कर दी. मोटे तौर पर इसका मतलब यह हुआ जैसे किसी बच्चे की ग्रेडिंग सेकंड डिवीजन में पचास परसेंट से बढ़कर बावन परसेंट हो जाए, उस बच्चे के बारे में लोगों का विचार बदल जाता है. लोग मानने लगते हैं कि भले ही सेकंड डिवीजन ही हो, पर अब बच्चा पहले के मुकाबले ज्यादा बेहतर कर रहा है. कुछ ऐसा ही अर्थव्यवस्थाओं के बारे में होता है.

ज्यादा विश्वसनीयता

रेटिंग के बढ़ने का मतलब होता है कि अंतराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से अर्थव्यवस्था पहले के मुकाबले बेहतर काम कर रही है. ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं, जिनसे भविष्य में और ज्यादा सुधार होने की संभावना है. मूडी, स्टैंडर्ड एंड पुअर ऐसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां हैं, जिनकी विश्वव्यापी विश्वसनीयता है. इनकी रेटिंग के आधार पर तमाम ग्लोबल निवेशक निवेश या विनिवेश का फैसला करते हैं.

यानी अगर किसी अर्थव्यवस्था की रेटिंग बढ़ जाती है, तो उसमें और ज्यादा निवेश आने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. विदेशी निवेश बढ़ने की संभावनाएं बढ़ती हैं. विदेशों से भारत में आनेवाले फंड में बढ़ोतरी की उम्मीदें बढ़ जाती हैं. इसी उम्मीद में रेटिंग में सुधार आने की खबर के बाद मुंबई शेयर बाजार का सूचकांक सेंसेक्स तीन सौ से भी ज्यादा बिंदुओं से ज्यादा उछला. शेयर बाजार उम्मीदों और आशंकाओं पर चलता है. बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र की कंपनियों के शेयरों के भावों को मापनेवाला सूचकांक बैंक निफ्टी तो इस खबर के आने के बाद 400 बिंदुओं से भी ज्यादा उछल गया. शेयर बाजार के बढ़ने का मतलब है कि इसे रेटिंग से बाजार में और ज्यादा निवेश आने की उम्मीदें हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

रेटिंग बढ़ने से एक फायदा यह होता है कि तमाम संसाधन आसान शर्तों पर मिलने लगते हैं. यानी किसी देश को ऐसे भरोसमंद कर्ज लेनेवाले के तौर पर चिन्हित किया जाता है, जिसमें रकम वापस करने की पूरी क्षमताएं हैं. किसी भरोसेमंद कर्ज लेनेवाले को कर्ज आसानी से मिलता है और सस्ती ब्याज दर पर मिलता है. यानी अब भारतीय कंपनियों के लिए भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में संसाधन उगाही आसान और सस्ती हो जाएगी.

रेटिंग में सुधार करीब चौदह सालों बाद आया है. इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली के बयानों का आशय है कि भारत द्वारा उठाए गए सकारात्मक कदमों पर यह विलंबित रुख है यानी भारतीय अर्थव्यवस्था की रेटिंग पहले ही बेहतर कर दी जानी चाहिए थी.

रेटिंग में सुधार की वजहें

जीएसटी लागू होना, नया दिवालिया कानून-इस सबके चलते कारोबारी माहौल में लगातार सुधार दर्ज किया गया है. हालांकि हाल के महीनों में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी विकास दर गिरकर 5.7 प्रतिशत हो गई, पर इसके विकास की संभावनाओं पर अभी सवाल नहीं खड़े हुए हैं. तमाम आर्थिक सुधारों के चलते विकास दर के और बेहतर होने की उम्मीदें हैं.

गौरतलब है कि कुछ समय पहले आई विश्व बैंक की कारोबारी-आसानी रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार दर्ज किया गया था. विश्व बैंक की 2018 की रिपोर्ट में भारत की रैकिंग में तीस बिंदुओं का इजाफा हुआ है. विश्व के करीब दो सौ देशों में से भारत में कारोबार करने के लिए आसान सौ नंबर का देश है. 2018 रिपोर्ट में भारत का नंबर 100 है, 2017 में भारत का नंबर 130 था. जिन वजहों से कारोबारी आसानी रिपोर्ट में स्थिति बेहतर हुई है, कमोबेश उन्ही वजहों से क्रेडिट रेटिंग में भी सुधार हुआ है. ये वजहें लगातार मजबूत होती रहेंगी तो कारोबार करना और आसान होगा और क्रेडिट रेटिंग भी और बेहतर होगी.

ग्लोबल संदर्भ

पूरे विश्व में निवेशक दुनिया भर में उन अर्थव्यवस्थाओं की तलाश करते रहते हैं जहां निवेश करना सुरक्षित हो. अंतराष्ट्रीय स्तर पर कई निवेशक रिटर्न से ज्यादा अपने धन की सुरक्षा की चिंता करते हैं. क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों का काम यही है कि वह दुनिया भर के तमाम देशों की अर्थव्यवस्थाओं का विश्लेषण करके बताती रहें कि कौन सी अर्थव्यवस्था तुलनात्मक तौर पर बेहतर है.

यहां यह नोट किया जाना चाहिए कि चीन की अर्थव्यवस्था की क्रेडिंट रेटिंग में हाल के महीनों में गिरावट दर्ज की गई है. मोटा-मोटा आशय यह है कि चीन यूं तो फर्स्ट डिवीजन का स्टूडेंट है, पर उसकी फर्स्ट डिवीजन अब 72 परसेंट वाली ना रहकर 65 परसेंट वाली हो गई. और भारत भले ही सेकंड डिवीजन का स्टूडेंट है, पर उसकी परफॉरमेंस में सुधार हो रहा है. अर्थव्यवस्था, बाजार के आकलन में उम्मीदों या आशंकाओं की बड़ी भूमिका होती है. तो यह रेटिंग में बढ़ोतरी का अर्थ हुआ कि ग्लोबल बाजार में भारतीय अर्थव्यवस्था की विश्वसनीयता चीन की अर्थव्यवस्था की विश्वसनीयता के मुकाबले बेहतर मानी जाएगी.

जमीनी सच्चाइयां

रेटिंग में सुधार का मतलब यह नहीं है कि स्थितियां एकदम सुधर गई हैं समस्याओं का निदान हो गया है. रेटिंग बढ़ोतरी का आशय यह नहीं है. जमीनी हकीकतें अपनी जगह बनी हुई हैं. बेहतरी की मंजिल की ओर सफर चल रहा है, खत्म नहीं हुआ है. अभी मंजिल दूर है. यह समझा जाना चाहिए. रेटिंग से यह समझना चाहिए कि अर्थव्यवस्था की बेहतरी की कोशिशों की तारीफ की जा रही है, पर अभी परिणाम आने बाकी हैं.

Narendra Modi

महंगाई दोबारा सिर ना उठाए, देश की बड़ी नौजवान आबादी के लिए रोजगार की व्यवस्था दुरुस्त हो. राजकोषीय घाटा सीमाएं ना तोड़े. औद्योगिक जगत की सुस्ती दूर हो, ऐसी कोशिशें लगातार चलनी चाहिए.

राजनीतिक निहितार्थ

मोदी सरकार के पास बताने को एक और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक रेटिंग हो गई बताने के लिए आलोचकों को कि विश्व बैंक की शाबाशी के बाद मूडीज की शाबाशी भी मोदी सरकार को मिली है. गुजरात चुनावों से लेकर तमाम दूसरे चुनावों में ये शाबाशियां नैरेटिव बनाने में, राजनीतिक कथ्य बनाने में मदद करती हैं.

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