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मराठा युवाओं द्वारा आरक्षण के लिए आत्महत्या कहीं 1990 के युवा विरोध जैसा मोड़ न ले ले

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन पिछले कुछ वर्षों में अन्य जातीय अथवा सामुदायिक समूहों के ऐसे ही आंदोलनों के विपरीत क्या अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण के समय 1990 में छिड़े युवा आंदोलन की शक्ल अख्तियार कर रहा है?

Updated On: Aug 02, 2018 07:29 AM IST

Anant Mittal

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मराठा युवाओं द्वारा आरक्षण के लिए आत्महत्या कहीं 1990 के युवा विरोध जैसा मोड़ न ले ले

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन पिछले कुछ वर्षों में अन्य जातीय अथवा सामुदायिक समूहों के ऐसे ही आंदोलनों के विपरीत क्या अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण के समय 1990 में छिड़े युवा आंदोलन की शक्ल अख्तियार कर रहा है? यूं तो मराठा आंदोलनकारी आरक्षण पाने के लिए धरना, प्रदर्शन, गिरफ्तारी देने आदि तमाम लोकतांत्रिक उपाय ही अपना रहे हैं मगर मराठा युवाओं द्वारा आत्महत्या की घटनाएं उसे मंडल वाले युवा आंदोलन के करीब ले जा रही हैं.

फर्क सिर्फ इतना है कि मराठा आंदोलनकारी आरक्षण पाने के लिए भावुक होकर आत्महत्या कर रहे हैं जबकि मंडल विरोधी युवा आंदोलन में देश भर के सवर्ण युवा अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिए जाने के डिप्रेशन में आत्महत्या कर रहे थे. मराठा आरक्षण आंदोलन के समर्थन में 31 जुलाई को छठे शख्स ने आत्महत्या करके राज्य और केंद्र सरकार को कड़ी चेतावनी दी है.

आत्महत्या करने वाले सभी लोग युवा हैं और खेतीबाड़ी में आमदनी घटने तथा वैकल्पिक रोजगार दिलाने में सरकारी उदासीनता से आजिज आकर उन्होंने खुदकुशी जैसी जानलेवा राह अपनाई है. मराठा आंदोलन के समर्थन में मंगलवार को दरअसल दो लोगों ने आत्महत्या की. इनमें एक 17 साल का विद्यार्थी है और दूसरा 35 साल का खेतिहर मजदूर है. खुदकुशी करने वाले विद्यार्थी का नाम प्रदीप हरि म्हास्के है.

इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारी हाथ जोड़कर लोगों से अपनी दुकाने बंद करने के लिए कहते दिखे

महाराष्ट्र में औरंगाबाद जिले की फलमबाड़ी तहसील के वडोद बाजार गांव के प्रदीप ने दसवीं की परीक्षा में हालांकि 75 फीसद अंक पाए थे मगर आरक्षण एवं पैसे के अभाव में उसे किसी भी जूनियर कॉलेज अथवा तकनीकी प्रशिक्षण संस्थान में दाखिला नहीं मिला. इसी से डिप्रेशन में आए प्रदीप ने आरक्षण के समर्थन में कुए में कूद कर अपनी जान दे दी. उसकी मौत के बाद से आरक्षण आंदोलनकारियों ने औरंगाबाद-जलगांव रोड को जाम कर रखा है.

दूसरी खुदकुशी मंगलवार को ही अभिजित देशमुख नाम के खेतिहर मजदूर ने बीड जिले के वाड़ा गांव में कर ली. अभिजित ने अपने घर के पास खड़े पेड़ पर लटक कर जान दे दी. आत्महत्या का कारण गिनाने वाली पर्ची में उसने साफ लिखा कि यह अतिवादी कदम वह मराठा आरक्षण के समर्थन में उठा रहा है. इसके अलावा बेरोजगारी तथा बैंक के बकाया कर्ज का भी उस पर्ची में जिक्र है.

इनसे पहले गोदावरी नदी के किनारे बसे नांदेड़ जिले के धबड़ गांव में 38 वर्षीय, कचारू कल्याण नाम के युवक ने भी छत के कुंडे से लटक कर मराठा आरक्षण आंदोलन के समर्थन में आत्महत्या कर ली थी. उसी दिन औरंगाबाद में 35 साल के युवक ने चलती ट्रेन के सामने कूद कर मराठा आरक्षण के लिए जान दे दी थी. पिछले हफ्ते भी दो युवकों ने मराठा आरक्षण के समर्थन में आत्महत्या कर ली थी तथा नवी मुंबई में प्रदर्शन के दौरान घायल हुए एक अन्य युवक की इलाज के दौरान मौत हो चुकी है.

इतना ही नहीं दिवंगत मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के गृह जिले लातूर में आठ युवाओं ने मंगलवार को आत्मदाह की कोशिश की. हालांकि पुलिस के समय पर दखल से उन्हें बचा लिया गया मगर यदि वे अपने मिशन में कामयाब हो जाते तो मराठा आरक्षण आंदोलन भी मंडल विरोधी आंदोलन में राजीव गोस्वामी द्वारा आत्मदाह की कोशिश की तरह बुरी तरह भड़क जाता.

दिल्ली विश्वविद्यालय यानी डीयू के देशबंधु कॉलेज में आत्मदाह के प्रयास में आग की लपटों से घिरे 19 साल के छात्र राजीव गोस्वामी की तस्वीर ने 1990 में अन्य पिछड़ा वर्ग को सरकारी नौकरियों में मिले आरक्षण से बौखलाए देश भर के युवाओं को आग में डले पेट्रोल की तरह भड़का दिया. उसके बाद गाजियाबाद, चंडीगढ़, कानपुर, हिसार, सिरसा, अंबाला, लखनऊ, ग्वालियर, कोटा आदि अनेक शहरों में युवाओं ने डिप्रेशन में आत्मदाह से खुदकुशी कर ली थीं.

अकेले राजधानी दिल्ली में ही कम से कम आधा दर्जन युवाओं ने आरक्षण के खिलाफ आत्महत्या की थी. हालांकि दिल्ली में सबसे पहली आत्महत्या डीयू के सुरेंद्र नाम के छात्र ने की थी मगर तब कैमरा वहां न होने से डीयू के ही राजीव गोस्वामी की आत्मदाह की कोशिश की तस्वीरों ने उसे युवा आंदोलन का 'पोस्टर बॉय' बना दिया. राजीव गोस्वामी को उस घटना के बावजूद बचा तो लिया गया मगर 2004 में 33 साल की अल्पायु में ही वह दो बच्चों को छोड़ कर पीलिया के कारण चल बसा.

राजीव बाद में डूसू का अध्यक्ष भी बना, मगर जल्द ही इस सबसे ऊबकर उसने अपना कारोबार शुरू कर लिया था. राजीव की बेटी सिमरन और बेटा आदित्य अमेरिका के मिशीगन में अपने दादाजी के पास रहते हैं. मंडल आरक्षण विरोधी आंदोलन दिल्ली में इतना प्रबल हो गया था कि विद्यार्थियों ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के सामने वाले चौराहे का नाम 'कुर्बानी चौक' रखकर वहीं पर महीने भर से अधिक समय तक डेरा डाले रखा.

यह बात दीगर है कि एक रोज आधी रात को भारी तादाद में आई पुलिस ने धरने पर बैठे हजारों विद्यार्थियों को इस लेखक के सामने ही लाठियों से पीट-पीट कर भगाने की कोशिश की. पुलिस की इस हरकत का जब और अधिक तादाद में जमा हुए युवाओं ने विरोध किया तो उन पर गोलियों की बौछार हुई. इस लेखक के देखते-देखते ही दो युवकों ने गोलियां खाकर आरक्षण के विरुद्ध अपना आक्रोश जताने के क्रम में दम तोड़ दिया.

युवाओं का वह आंदोलन इतना प्रबल था कि चंडीगढ़ और कुरुक्षेत्र सहित अनेक शहरों में स्थानीय प्रशासन ने सेना की आड़ लेकर आंदोलन को काबू किया. हिमाचल प्रदेश जैसा बेहद शांत प्रदेश भी आरक्षण समर्थकों और आरक्षण विरोधियों के टकराव में झुलस गया था. बिहार में आरक्षण विरोधियों और समर्थकों के बीच हिंसक झड़प भी हुईं.

ताज्जुब यह है कि मंडल विरोधी आंदोलन के समय जाट, पटेल, मराठा, गुर्जर आदि जो जातियां आरक्षण विरोधियों के साथ थीं आज एक-एक करके वे सभी आरक्षण पाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं. राजस्थान में पहले जाटों ने और फिर गुर्जरों ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण पाने के लिए आंदोलन किया. अब हरियाणा में भी जाट आरक्षण पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

इसी तरह गुजरात में जहां कभी माधव सिंह सोलंकी द्वारा अन्य पिछड़ों को आरक्षण देने का पटेलों ने चिमनभाई पटेल के नेतृत्व में विरोध किया था वहां भी पिछले साल से पाटीदार अनामत आंदोलन पटेलों को आरक्षण दिलाने की मुहिम छेड़े हुए है.

अब महाराष्ट्र के मराठा भी सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण पाने के लिए आंदोलनरत हैं. यह सभी जातियां मुख्यत: खेतिहर जातियां रही हैं, मगर कृषि में लगातार घाटे और उच्च शिक्षा के निजीकरण की भाजपा, कांग्रेस और सपा, बसपा सहित तमाम राजनीतिक दलों द्वारा अपनाई गई नीति ने इन्हें पिछले 25 साल में हाशिये पर ला खड़ा किया है.

मराठा आरक्षण आंदोलन के समर्थन में युवाओं द्वारा आत्महत्या करने से इस कटु सत्य की पुष्टि भी हो रही है. वरना मराठा समुदाय हमेशा से अपने लड़ाकू कौम होने पर अभिमान करता रहा है और उसके युवाओं द्वारा आत्महत्या की राह अपनाए जाने के बारे में इससे पहले कभी सोचा भी नहीं जा सकता था. युवाओं द्वारा आत्महत्या भले ही किसी भी कारण से की जाए पूरे समाज के लिए चुनौती के साथ ही बेहद कष्टप्रद है.

devendra fadnavis

उम्मीद है कि महाराष्ट्र के युवा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, मराठा युवाओं को दिलासा देकर खुदकुशी से बाज आने संबंधी ठोस उपाय करेंगे. हालांकि बीजेपी और मुख्यमंत्री तो मराठों के लिए आरक्षण की राह में रोड़ा अटकाने का ठीकरा अदालतों के सिर फोड़कर अपनी खाल बचाने में मशगूल हैं. इसके बावजूद फडणवीस को यह याद रखना चाहिए कि अपने सहयोगी शिवसेना के निशाने पर वे पहले से ही हैं उपर से मराठों ने भी यदि अगले चुनाव में बीजेपी से मुंह मोड़ लिया तो उसे 'पुनर्मूषक' बनते देर नहीं लगेगी.

इस फेर में बीजेपी को राज्य ही नहीं केंद्र की सत्ता फिर से हासिल करना भी दूभर हो जाएगा. क्योंकि 2014 में राज्य की जनता ने बीजेपी ओर उसके सहयोगियों को राज्य में लोकसभा की कुल 48 में से 42 सीटों से नवाजा था. उसी की बदौलत बीजेपी पूर्ण बहुमत और एनडीए 334 सीट पाने में कामयाब रहे थे.

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