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क्या भारत एक मजबूत ASEAN का नेतृत्व करने में सक्षम होगा

कुछ ही दिनों पहले दक्षिण पूर्वी देशों के गुट ASEAN का सिंगापुर में शिखर सम्मलेन हुआ. दक्षिण पूर्वी देशों और पूरे हिन्द प्रशांत क्षेत्र पर चीन का बढ़ता प्रभाव इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती है

Updated On: Nov 21, 2018 08:31 AM IST

Naghma Sahar Naghma Sahar

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क्या भारत एक मजबूत ASEAN का नेतृत्व करने में सक्षम होगा

कुछ ही दिनों पहले दक्षिण पूर्वी देशों के गुट ASEAN का सिंगापुर में शिखर सम्मलेन हुआ. दक्षिण पूर्वी देशों और पूरे हिंद प्रशांत क्षेत्र पर चीन का बढ़ता प्रभाव इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती है. ASEAN यानी दक्षिण पूर्वी देशों के समूह के ज्यादातर देश इस क्षेत्र में भारत को चीन की शक्ति का संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी समझते हैं. साथ ही पूरे इलाके में आर्थिक समरसता बढ़ाने से लेकर एक स्वतंत्र इंडो-पेसिफिक क्षेत्र के लिए के लिए भी भारत की तरफ नजर है.

हालांकि भारत इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में एक बहुपक्षीय सैनिक गठबंधन बना कर चीन को नाखुश करने के पक्ष में नहीं है, फिर भी वो ASEAN देशों के साथ अपने सैन्य संबंधों को मजबूत कर रहा है जैसे वियतनाम, म्यांमार, इंडोनेशिया, थाईलैंड और मलेशिया.

प्रधानमंत्री ने सिंगापुर में ASEAN के दौरान निवेश कारोबार और देशों के बीच कनेक्टिविटी पर फोकस किया, चीन ने भारत की एक्ट ईस्ट और चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना में समन्वय बनाने की बात की. उन्होंने कहा कि इससे दोनों देशों को फायदा होगा लेकिन भारत चीन की OBOR परियोजना को स्वीकृति नहीं देता चाहता है. इसका कारण है वन बेल्ट वन रोड परियोजना के जरिए छोटे देशों पर अपना आधिपत्य जमाने की कोशिश. जैसा कि श्रीलंका के हम्बंतोता मामले में देखा गया, जैसा मालदीव पर चीन के बढ़ते असर के मामले में देखा गया.

पूरे इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में एक सामरिक भूस्खलन चल रहा है और चीन का उदय, उसकी वन बेल्ट वन रोड परियोजना इस का अहम हिस्सा है. इन परिस्थितियों में भारत की अहमियत सामरिक, राजनीतिक दृष्टि से बढ़ती ही जा रही है. अमेरिका के लिए भी इस क्षेत्र में भारत की अहमियत बढ़ती गई है, उसके एशिया पिवट की नीति के तहत भी इंडो-पेसिफिक उसके लिए महत्वपूर्ण है, इतना कि अमेरिका ने कुछ समय पहले अपने पेसिफिक कमांड का नाम बदल कर इंडो-पेसिफिक कमांड कर दिया. ये सांकेतिक है, लेकिन अहम संकेत है.

पड़ोसी देशों में सियासी बदलाव: भारत के लिए नया मौका

भारत का पड़ोसी देश मालदीव हाल ही में चीन समर्थक अब्दुल्लाह यामीन के चंगुल से बाहर आया है. यामीन ने भारत के कई प्रोजेक्ट को दरकिनार कर दिया था जैसे मालदीव की सेना के लिए भारत की ट्रेनिंग अकादमी, एक एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन, काम करने मालदीव गए भारतीयों के वीसा में अड़ंगा और भारतीय प्राइवेट कंपनियों की पहल पर रोक.

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नए राष्ट्रपति ने साफ किया है कि पिछले शासन में निर्माण क्षेत्र में चीन के उधार की वजह से मालदीव एक कर्ज जाल में फंस गया. मालदीव के खजाने खाली हैं. मालदीव में जांच की मांग चल रही है कि पछली सरकार में चीनी कंपनियों को किस तरह कॉन्ट्रैक्ट दिए गए.

मोहम्मद सोलिह

मालदीव के नए राष्ट्रपति मोहम्मद सोलिह

नए राष्ट्रपति इब्राहीम सोलिह के शपथ पर प्रधानमंत्री की मौजूदगी दिखाती है कि अब पलड़ा भारत की तरफ झुका है और भारत की अपेक्षा होगी की हिंद महासागर में मालदीव भारत के सुरक्षा हितों की चीन की बढती मौजूदगी के बीच रक्षा करे.

श्रीलंका के राजनीतिक संकट को भी विश्लेषक भारत और चीन के बीच भूराजनीतिक टकराव की तरह देखते हैं. श्रीलंका का पारंपरिक सहयोगी भारत और वैश्विक आर्थिक शक्ति चीन दोनों के हिंद महासागर में सामरिक हित हैं और श्रीलंका इसके लिए अहम है. कोलंबो चीन के नए सिल्क रोड प्रोजेक्ट का हिस्सा होने वाला है. राजपक्षे पर चीन से रिश्वत लेकर चीन को परियोजनाएं बांटने का आरोप है.

2007 में राजपक्षे ने चीन के एक कंसोर्टियम के साथ हम्बंतोता बंदरगाह बनाने की 1 बिलियन डॉलर की डील की, फिर चीन को कोलंबो के पास एक विशेष निवेश क्षेत्र दिया गया. श्रीलंका में विद्रोह की शुरुआत भी इसी कारण हुई थी कि चीन के हित विक्रमसिंघे सरकार में नहीं सध पा रहे थे. विक्रमसिंघे ने न सिर्फ भारत से बल्कि पश्चिमी देशों से भी संबंध सुधारने की शुरुआत की.

लेकिन कई साउथ-ईस्ट एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर चीन का दबदबा इतना ज्यादा है कि उनके नेता खुल कर कुछ कह नहीं पाते और इसी संदर्भ में कई ASEAN देश भारत पर RCEP यानी रीजनल कॉम्प्रेहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप पर चल रही बातचीत को जल्द ही किसी नतीजे पर पहुंचाने का दबाव बना रहे हैं, जिसका लक्ष्य है एक फ्री ट्रेड क्षेत्र स्थापित करना जो दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा क्षेत्र होगा. यहां विश्व की एक तिहाई जीडीपी और कारोबार है. एक स्वतंत्र और सबको समाहित करने वाले इंडो पेसिफिक क्षेत्र का केंद्र ASEAN ही हो सकता है.

ASEAN की समस्या

आज ASEAN की सबसे बड़ी समस्या दक्षिण चीन सागर है. कारण ASEAN ने बीजिंग के बांटो और राज करो नीति के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाया. ASEAN की कमजोरी ने समुद्र और धरती पर चीन के इरादे और दृढ़ किए हैं. साउथ ईस्ट एशिया 640 मिलियन की आबादी का क्षेत्र है, यहां अगर चीन का आधिपत्य हावी हो गया तो इसका भू-राजनीतिक असर पूरे इंडो पेसिफिक क्षेत्र पर पड़ेगा.

2002 में साउथ चाइना सी के लिए एक कोड ऑफ कंडक्ट को मंजूरी दी गई थी जिसके तहत सभी देशों को खुद पर नियंत्रण रखना था ताकि कोई ऐसी गतिविधि न हो जिससे टकराव बढ़े. लेकिन चीन ने इस कोड ऑफ कंडक्ट की अनदेखी की और उसपर कोई अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई भी नहीं हुई. ASEAN की दूसरा बड़ी चुनौती है दक्षिण पूर्वी एशिया की राजनीति और इकॉनमी में बढ़ता फासला. पूरा क्षेत्र आर्थिक तौर पर तो पास आ रहा है लेकिन सियासी दूरियां बढ़ी हैं.

चीन की चुनौती का जवाब क्या होगा

इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी का मुकाबला करने के लिए अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत ने एक क्वाड बनाया है. भारत ने ये साफ कर दिया है कि उसके समुद्री संबंध अमेरिका और उसके सहयोगी तक सीमित नहीं हैं. वो चीन से भी संबंध रखना चाहता है और रूस के साथ भी इस क्षेत्र में संपर्क बढ़ाना चाहता है. ये भारत के हित में है. सवाल है कि सिर्फ शक्ति संतुलन के ध्येय से ये गुट क्या चीन के BRI का मुकाबला कर पाएगा.

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चीन अपनी परियोजना में कई बिलियन डॉलर खर्च कर रहा है, जिस जगह ये परियोजना जा रही है वहां नौकरी का वादा है, इसके मुकाबले अमेरिका इस परियोजना में इस तरह का आर्थिक जोर नहीं लगा रहा. जब तक कोई परियोजना उस क्षेत्र के लोगों के लिए लाभदायक नहीं होगी, वहां की अर्थव्यवस्था को जड़ से मजबूत नहीं करेगी तब तक उसके कामयाब होने पर सवाल बना रहेगा.

ट्रंप प्रशासन ने चीन के साथ सहयोग की जगह स्पर्धा शुरू की

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माइक पेंस

अपने हालिया भाषण में अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पेंस ने चीन के आक्रामक पहलू को उजागर किया है. उन्होंने कहा कि चीन अपने भौगोलिक और समुद्री रिश्तों को नए सिरे से लिख रहा है, आर्थिक आक्रामकता, सैन्य आक्रामकता और देश में किसी भी विरोध को दबाने की नीति लेकर अपनी महत्वाकांक्षा को बढ़ा रहा है. चीन के उदय में अमेरिका का हाथ रहा.

अब ट्रंप प्रशासन ने चीन के खिलाफ पिछली अमेरिकी नीतियों को बदल दिया है जो 70 के दशक से अभी तक अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने अपनाई और चीन को एक उभरती हुई शक्ति माना. ट्रंप प्रशासन ने चीन के साथ सहयोग के बजाय स्पर्धा की नीति अपनाई है, जिसका नतीजा है ट्रेड वॉर.

ASEAN और इंडो पसिफिक में भारत के लिए कूटनीतिक मौका

मालदीव में चीन समर्थक अब्दुल्लाह यामीन की जगह भारत के पक्षधर इब्राहीम सोली जिन्होंने भारत को अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए चुना है और श्रीलंका में विक्रमसिंघे की वापसी ने बीजिंग के लिए एक झटका है और अब खेल में एडवांटेज भारत है. भारत पर निर्भर करता है कि वो श्रीलंका, मालदीव, जैसे देशों को जो भारत की तरफ देख रहे हैं, किस तरह आक्रामक चीन के चंगुल से बचा कर एक मजबूत विकल्प देता है.

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