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मध्य प्रदेश: नाथूराम गोडसे के मंदिर का विरोध क्या कांग्रेस को संजीवनी देगा

कांग्रेस के विरोध के कारण कथित मंदिर आकर्षण का केंद्र बन गया है. इस मंदिर का विरोध भारतीय जनता पार्टी भी कर रही है.

Dinesh Gupta Updated On: Nov 17, 2017 09:57 PM IST

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मध्य प्रदेश: नाथूराम गोडसे के मंदिर का विरोध क्या कांग्रेस को संजीवनी देगा

ग्वालियर में हिंदू महासभा के कार्यालय में महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के कथित रूप से बनाए गए मंदिर के विरोध से कांग्रेस को क्या हासिल होगा? कांग्रेस के विरोध के कारण कथित मंदिर आकर्षण का केंद्र बन गया है. इस मंदिर का विरोध भारतीय जनता पार्टी भी कर रही है.

कांग्रेस का विरोध सड़कों पर धरना आंदोलन के जरिए हो रहा है. बीजेपी बयानों के जरिए कर रही है. माना यह जा रहा है कि कांग्रेस इस विरोध के जरिए ग्वालियर-चंबल अंचल में अपनी खोई हुई जमीन पाने की कोशिश कर रही है.

किसी दौर में ग्वालियर हिंदू महासभा का गढ़ रहा था लेकिन, आज उसकी कोई राजनीतिक जमीन नहीं है. गोडसे के मंदिर के विरोध के कारण हिंदू महासभा एक बार फिर चर्चा में है. विरोध गोडसे के मंदिर का हो रहा तो सिंधिया परिवार का जिक्र भी एतिहासिक संदर्भ के साथ किया जा रहा है.

ग्वालियर एवं चंबल संभाग में कुल चार लोकसभा और 34 विधानसभा की सीटें हैं. वर्तमान में कांग्रेस के पास लोकसभा की एक एवं विधानसभा की दस सीटें हैं. दो स्थानों पर उपचुनाव होना है. मध्यप्रदेश का यह क्षेत्र धर्म की राजनीति से दूर है. यहां वोट की राजनीति सिंधिया परिवार के इर्द-गिर्द सिमटी रहती है.

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सवाल यह भी उठ रहा है कि गुजरात के चुनाव से गोडसे के मंदिर का कोई संबंध तो नहीं? गुजरात महात्मा गांधी जन्मस्थली है. भारतीय जनता पार्टी वहां सरदार वल्लभ भाई पटेल के योगदान को आगे रख रही है.

सिंधिया परिवार का साथ छूटने से पहचान भी खत्म हुई

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विजयाराजे सिंधिया,( प्रदेश की राजनीति में जिनकी पहचान राजमाता के तौर है) का समर्थन जब तक हिंदू महासभा को रहा तब तक उसकी राजनीतिक पहचान भी थी. विधानसभा और लोकसभा में उसका प्रतिनिधित्व भी था. राजमाता के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद हिंदू महासभा भी धीरे-धीरे एक कमरे में सिमटकर रह गई.

राजमाता के बीजेपी में आने के साथ ही ग्वालियर पार्टी के गढ़ के तौर स्थापित हो गया. ग्वालियर के दौलतगंज इलाके में महासभा का कार्यालय है. इस कार्यालय के ही एक कक्ष में नाथूराम गोडसे की मूर्ति लगाकर मंदिर का नाम दिया गया है.

कार्यालय के आसपास रहने वाले कुछ परिवार ऐसे हैं, जो काफी कट्टर हिंदू महासभाई माने जाते हैं. वर्तमान में नगर निगम परिषद में महासभा का एक निर्वाचित पार्षद भी है. हिंदू महासभा घुड़सवार और तलवार और ढाल के सिंबल पर चुनाव लड़ती रही है.

कांग्रेस द्वारा गोडसे के कथित मंदिर का विरोध किए जाने के कारण हिंदू महासभा और इतिहास चर्चा के केंद्र में आ गए हैं. महासभा हर साल ही वीर सावरकर और गोडसे से जुड़े कार्यक्रम करती है. ग्वालियर में कुछ स्थानों का नामकरण सावरकर के नाम पर भी किया गया है.

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महात्मा गांधी की हत्या में गोडसे की भूमिका होने के कारण हिंदू महासभा कभी भी उनके नाम पर किसी स्थान का नामकरण नहीं करा पाई. कथित मंदिर की स्थापना को नामकरण की कड़ी से जोडकर देखा जा रहा है. हिंदू महासभा ने नगर निगम ग्वालियर एवं मध्यप्रदेश शासन से कई बार गोडसे के मंदिर के लिए जमीन आवंटित करने की मांग की थी. इस मांग को किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया गया था.

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मजबूरी में महासभा को कार्यालय में ही मूर्ति स्थापित करना पड़ी. हिंदू महासभा का नाता सिंधिया परिवार से पूरी तरह खत्म है. गोडसे के मंदिर का विरोध कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी किया है. भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता लोकेन्द्र पारासर कहते हैं कि इस तरह की गतिविधियों के विरोध में हम भी हैं.

कांग्रेस के विधायक सुंदरलाल तिवारी कहते हैं कि बीजेपी को अपने महापुरुषों की प्रतिमाओं को अब हटा देना चाहिए. 27 नवंबर से होने वाले राज्य विधानसभा के सत्र में इस मामले पर हंगामा करने की तैयारी कांग्रेस कर रही है. हिंदू महासभा ने विवाद में एक कदम आगे बढ़ते हुए अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की फोटो लगाकर आरती शुरू कर दी है.

प्रशासन के लिए मूर्ति हटाने का काम चुनौती भरा हो गया है. अफसर मूर्ति हटाने के लिए कायदे-कानून और धर्म की परिभाषा तलाश कर रहे हैं. प्रशासन ने हिंदू महासभा को दिए नोटिस में लिखा है कि मंदिर बनाए जाने से लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हो रही हैं.

गोडसे ने जिस बंदूक से गोली चलाई वह ग्वालियर से खरीदी थी

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नाथूराम गोडसे का ग्वालियर से जन्म का कोई सबंध नहीं रहा है लेकिन उसने  जिस पिस्टल से महात्मा गांधी पर गोली चलाई थी, वह उसने ग्वालियर में ही खरीदी थी. पिस्टल चलाने का प्रशिक्षण भी ग्वालियर में ही लिया था.

हिंदू महासभा के कर्ता-धर्ता जयवीर भारद्वाज कहते हैं कि गोडसे जब भी ग्वालियर आते थे, इसी कार्यालय में रुकते थे. गन चलाना भी यही सीखा. बताया यह जाता है कि गोडसे ने पिस्टल सिंधिया राजवंश की सेना के एक अफसर से पांच सौ रुपए में खरीदी थी.

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उस दौर में पचा सौ रुपए बड़ी रकम मानी जाती थी. गोडसे ने जब पिस्टल खरीदी थी, उस वक्त लायसेंस की जरूरत नहीं होती थी. सिर्फ कीमत ली जाती थी. ग्वालियर-चंबल का इलाका दस्यु समस्या के लिए बदनाम रहा है. आज भी यह क्षेत्र बंदूक के लायसेंस के कारण ही चर्चा में रहता है. यहां के लोग बंदूक खरीदने और उसका लाइसेंस लेने के लिए अपनी जमीन भी बेच देते हैं.

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