S M L

जहां लाल आतंक का गढ़ था वहां बच्चे क्यों बनने लगे हैं इंजीनियर

मोस्ट वांटेड नक्सली संदीप यादव के घर का लड़का अश्वनी गुंजन भी चुना गया एनआईटी कॉलेज में 

Updated On: Dec 08, 2018 02:12 PM IST

Pankaj Kumar Pankaj Kumar

0
जहां लाल आतंक का गढ़ था वहां बच्चे क्यों बनने लगे हैं इंजीनियर

बिहार के गया और औरंगाबाद जिले के नक्सली इलाके में अब बंदूक की गोली नहीं बल्कि कंप्यूटर के माउस के लिए युवा पीढ़ी का रुझान बढ़ने लगा है. नक्सली इलाके में बच्चों पर पढ़ाई-लिखाई का कुछ ऐसा जुनून छाया है कि वो आईआईटी और एनआईटी कॉलेज में दाखिला पाने की होड़ में जुट गए हैं. कभी इन इलाकों में प्रेरणा श्रोत नक्सली कमांडर कमलेश यादव हुआ करते थे. फिर संदीप यादव का नाम इलाके के लोगों की जुबान पर होता था.

संदीप और कमलेश इन इलाकों में सामानांतर सरकार चलाते थे. संदीप यादव कुछ दिनों पहले ही इनफोर्समेंट डायरेक्टरेट के रडार पर थे. उनकी आय से अधिक संपत्ति पर एजेंसी ने धावा बोला था. लेकिन उनके घर का ही एक लड़का अश्विनी गुंजन अब एनआईटी जमशेदपुर में फोर्थ इयर का छात्र है. अश्वनी गुंजन और कुख्यात नक्सली संदीप यादव के घर के बीच महज एक दीवार का फासला है.

अश्विनी गुंजन और कुख्यात नक्सली संदीप यादव गया जिले के लटुआ थाने के बाबूरामडीह गांव के रहने वाले हैं. ये इलाका घनघोर नक्सली इलाका माना जाता है, लेकिन बंदूक की नली के साए में पलने के बावजूद अश्विनी गुंजन ने कलम का सिपाही बनने का फैसला किया और इस इरादे को पूरा करने में उसकी मदद समाज के कुछ प्रबुद्ध लोगों की मदद से चलने वाले एक संस्थान ने की. अश्वनी गुंजन जमशेदपुर एनआईटी में दाखिला लेकर अपने इलाके और आस-पास के लोगों के लिए प्रेरणाश्रोत बन गया है.

ऐसी ही कहानी औरंगाबाद जिले के गांव महद्दीपुर की है. यहां खेतों में काम करने वाली रेणु अब आईआईटी दिल्ली की शान बढ़ा रही हैं. रेणु टेक्सटाइल एंड टेक्नोलॉजी ब्रांच की छात्रा हैं और आईआईटी दिल्ली में उसका तीसरा साल है. रेणु की कहानी भी कम प्रेरणाश्रोत नहीं है.

renu

रेणु

औरंगाबाद में महद्दीपुर गांव का इलाका नक्सल प्रभावित क्षेत्र है. यहां रणबीर सेना और नक्सलियों में वर्चस्व की लड़ाई आम बात थी. रेणु के पिता कपड़े की छोटी सी दुकान खोलकर गुजारा करते थे और रेणु की मां और रेणु खेतों में काम कर गुजर बसर किया करती थीं. रेणु ये बताते हुए कांपने लगती हैं कि साल 2008 तक उनके पिता की अक्सर पिटाई हो जाया करती थी.

ये भी पढ़ें: विचारधारा में गिरावट और माओवाद के अंदर जातिगत संघर्ष नक्सलवाद को खोखला कर रहा है

एक बार रेणु के पिता के दुकान में आग लगा दी गई थी. रेणु के पिता पीछे से दीवार फांदकर भागने में सफल हुए थे. इतना ही नहीं उनके पिता की दुकान से कपड़े बिना पैसे का ही उठा लिया जाते थे और पैसे मांगने पर उसके पिता की कई बार पिटाई हो चुकी है.

पिता का पिटना और मां का रोना रेणु के जिंदगी का हिस्सा हो चला था. कई बार रेणु खेतों में काम करते-करते नक्सलियों के आने की आहट सुन लेती थीं और अपने परिवार वालों को वहां से भाग निकलने को कहती थीं.

लेकिन अब कहानी बिल्कुल उलट है. उसकी सफलता ने उसे इलाके में प्रेरणाश्रोत बना दिया है. रेणु के पिता की माली हालत ठीक नहीं थी कि उसे पढ़ा सकें. रेणु मेधावी छात्रा है और पढ़ने का उसे शौक है. जवाहर नवोदय विद्यालय में चुना जाना, उसके जीवन की पहली सफलता थी. गांव की लड़की का गांव के बाहर पढ़ाई के लिए जाना काफी मुश्किल भरा था.

लेकिन रेणु की लगन और पढ़ने की चाहत के आगे माता-पिता ने घुटने टेक दिए. रेणु 2013 में दसवीं पास कर गांव आ गई. फिर आगे की पढ़ाई के लिए हाथ पैर मारने लगी. पैसे की घर में किल्लत और उसका लड़की होना दोनों उसके आगे की पढ़ाई के रास्ते में सबसे बड़ी कठिनाई थी.

ये भी पढ़ें: नक्सलियों के गढ़ में सरकारी योजनाओं का असर, लोग कर रहे विकास की मांग

लेकिन मजबूत हौसलों को उड़ान भरने से कौन रोक पाता है. बाधाएं फुस्स हो गईं. रेणु को एक ऐसे कोचिंग संस्थान का सहारा मिल गया जो मेधावी छात्र छात्राओं के हौसलों को उड़ान के पंख लगा देती है. यहां गरीबी मंजिलों तक पहुंचने में बाधक नहीं होती बल्कि ऐसे कोचिंग संस्थान में दाखिला पाकर इरादे और मजबूत हो जाते हैं. इस कोचिंग संस्थान का नाम है मगध सुपर 30 जहां पैसे एक नहीं लगते और खाना-पीना रहना मुफ्त में नसीब होता है. इतना ही नहीं बेहतरीन कोचिंग और पठन-पाठन की सामग्री भी मुफ्त में मुहैया कराई जाती है.

रेणु के अरमान को पंख लग चुके थे. साल 2013 में मगध सुपर 30 गया में दाखिला मिल गया था. रेणु 2015 में इंटर पास करते ही पहले ही प्रयास में आईआईटी दिल्ली के लिए चुनी जा चुकी हैं. रेणु अब आईआईटी पास कर सिविल सेवा में जाना चाहती हैं. वहीं अपने गांव महद्दीपुर और आस-पास के गांव के लिए वो रोल मॉडल हैं.

उसके पिता की इज्जत भी गांव ही नहीं बल्कि इलाके में बढ़ गई है. अब उनके पिता के साथ मार-पीट और अवैध वसूली का काम भी बंद हो गया है. रेणु को देख उसका छोटा भाई भी प्रेरित होकर आईआईटी में चुन लिया गया है. रेणु के मुताबिक इलाके में पढ़ाई का साधन नहीं है, लेकिन उसकी सफलता ने लोगों की सोच बदल दी है.

सोनू गुप्ता भी ऐसा ही गुदड़ी का लाल है जो लाल आतंक के गढ़ों में से एक इमामगंज थाना पकड़ी गुडिया गांव का रहने वाला है. आईआईटी दिल्ली के फोर्थ इयर का छात्र है. सोनु फिलहाल फोर्थ इयर कंप्लीट करने वाला है लेकिन पढ़ाई पूरी होने से पहले ही कैंपस सैलेक्शन के जरिए उसे नौकरी मिल चुकी है. उसे एक मल्टीनेशनल कंपनी ने 22 लाख सालाना के पैकेज पर अपने यहां नौकरी का ऑफर भेजा है.

सोनू इलेक्ट्रिकल ब्रांच से इंजीनीयरिंग की पढ़ाई कर रहा है और उसकी सफलता भी किसी मिसाल से कम नहीं. माता-पिता की आय सालाना 1 लाख रूपए से भी कम है. लेकिन माता और पिता ने उसमें पढ़ाई की ललक देखकर उसे पढ़ने के लिए प्रेरित किया.

ये भी पढ़ें: नक्सलियों के भय और सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ चुका है ऐतिहासिक श्रृंगी धाम

सोनू साल 2008 की वो घटना भूल नहीं पाया है जब उसके गांव पकड़ी गुड़िया में एमसीसी ने एक आदमी को काटकर चौराहे पर रख दिया था. गांव में कुछ लोग एमसीसी समर्थक थे वहीं कुछ पूरी तरह से न्यूट्रल, लेकिन पूरे गांव पर एमसीसी का जबरदस्त प्रभाव था. गांव में शिक्षा का अलख जगाने वाला दूर-दूर तक कोई दिखता नहीं था. शिक्षक दहशत के मारे आते तक नहीं थे.

रेणु और सोनू गुप्ता

रेणु और सोनू गुप्ता

सोनू के मुताबिक शिक्षा के अभाव की वजह से लोगों में नक्सली विचारधारा के प्रति आकर्षण चरम पर था. परंतु सोनू की साल 2013 में आईआईटी में मिली सफलता ने लोगों को झुकाव पढ़ाई के प्रति तेजी से बदला है.

सोनू गुप्ता आस-पास के कई गांवों के लिए रोल मॉडल बन चुका है. इलाके का वह पहला आईआईटी इंजीनियर है. उसके गांव और आस-पास के लोग उसे मिसाल के तौर पर पेश करने लगे हैं. सोनू गुप्ता के मुताबिक उसकी गरीबी उसकी सफलता में बाधक नहीं बन पाई क्योंकि उसके हौसलों को उड़ान भरने में कुशल संस्थान का योगदान था. ये संस्थान मगध सुपर 30 ही है जो गया में है और वहां से रेणु,अश्वनी गुंजन समेत कई लोग बिना शुल्क कोचिंग पा चुके हैं.

जाहिर है ये कुछ मिशाल हैं नक्सल प्रभावित इलाकों में जहां शिक्षा का अलख जगा चुके इन बच्चों में कई नाम शुमार हैं जिनके माता पिता की वार्षिक आय 1 लाख रूपए से कम है. इतना ही नहीं शुभम देव प्रखंड का रहने वाला है जहां आज भी नक्सलियों का खौफ देखा जा सकता है. यहां का प्रखंड मुख्यालय नक्सली विस्फोट कर उड़ा चुके हैं. शुभम साल 2018 में आईआईटी कानपुर के लिए चुना गया है.

सोनी रेशमी एनआईटी सिक्किम के लिए चुनी गई है जो गया जिले के डुमरिया गांव की रहने वाली है. झारखंड के बॉर्डर पर बसे होने की वजह से नक्सल प्रभाव का गढ़ माना जाता है. आदित्य गोयल की कहानी और भी हैरतअंगेज है. उसने अपना सरनेम गोयल इसलिए रख लिया क्योंकि एमसीसी और रणबीरसेना का कोपभाजन नहीं बनना चाहता था. साल 2014 में चुने जाने के बाद सेनारी और मियांपुर गांव के आस-पास के लोग उसकी राह पर चल पड़े हैं.

ध्यान रहे इस इलाके में भी कई नरसंहार हो चुके हैं जिसकी कहानी सुनकर लोग आज भी थर्रा उठते हैं, लेकिन आदित्य की सफलता ने गांव के कई लोगों को प्रेरित होकर अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया है. इसके अलावा सुमित कुमार आईआईटी गुवाहाटी के लिए साल 2014 में चुने गए जो अरवल जिले के नक्सल प्रभावित इलाके से ताल्लुक रखते हैं.

इसी तरह गौरव गुप्ता गया जिले के शेरघाटी का रहने वाला है, जो एनआईटी कालीकट और फिर आईआईएम इंदौर के लिए चुना गया है. ध्यान रहे शेरघाटी नक्सलियों के कथित लिबरेटेड जोन के रूप में कुख्यात रहा है. शिवम और संजीत आईआईटी कानपुर आईटी मुंबई का छात्र है जो गया जिले के चंदौती और गढ़ुआ थाने का निवासी है. इन दोनों की सफलता भी लाल आतंक के गढ़ में शिक्षा का अलख जगाने में बेहद कारगर रही है.

इस तरह पिछले कुछ सालों में नक्सल प्रभावित इन इलाकों में 35 से ज्यादा बच्चों का आईआईटी और अन्य ऊंचे संस्थानों में चुना जाना आम लोगों के लिए प्रेरणाश्रोत बन गया है. केंद्र सरकार प्रतिंबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी के आधार को कुंद करने के लिए अब तक अरबों रुपए केंद्रीय सहायता योजना के तहत खर्च कर चुकी है.

iit

मगध सुपर 30 कोचिंग इंस्टिट्यूट

नक्सलियों के कथित मुक्त इलाके में सरकार शिक्षा और रोजगार के अवसर मुहैया करा कर उन्हें मुख्य धारा में लाने की कोशिश कर रही है. बीते 22 नवंबर को ही गया जिले के लटुआ थाने को प्रशासन ने चुना जहां सरकार अपनी तरफ से कई तरह के कार्यक्रम चलाकर लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए प्रयासरत है. लेकिन यह संस्थान मगध सुपर 30 उस इलाके के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देकर इंजीनियर बनाकर नई दिशा दिखाने का काम कर रहा है. संस्थान के महत्व को इस बात से भी आंका जा सकता है कि युवाओं को काबिल बनाने में कोई सरकारी मदद नहीं ली जा रही है. आम लोगों की मदद के जरिए ये संस्थान दबे-कुचले, शोषित परिवार के बच्चों को जीवन की नई दिशा दे रहा है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Jab We Sat: ग्राउंड '0' से Rahul Kanwar की रिपोर्ट

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi