S M L

तिरुपति मंदिर: भगवान के नाम पर सिवेट कैट्स पर अत्याचार कितना सही?

तिरुमला तिरुपति स्थित मंदिर, खतरे में पड़ी बिल्लियों की एक प्रजाति को पालना-पोसना चाहता है

Updated On: Mar 08, 2017 01:08 PM IST

GS Radhakrishna

0
तिरुपति मंदिर: भगवान के नाम पर सिवेट कैट्स पर अत्याचार कितना सही?

ये लड़ाई करीब एक दशक पुरानी है. अब ये आग एक बार फिर भड़क उठी है. लड़ाई भी एकदम अजीब है. दुनिया का सबसे अमीर मंदिर, भगवान वेंकटेश्वर का तिरुमला तिरुपति स्थित मंदिर, खतरे में पड़ी सिवेट कैट, जिसे कबरबिज्जू या गंधबिलाव भी कहते हैं, को पालना-पोसना चाहता है. लेकिन वन विभाग इसका विरोध कर रहा है.

मंदिर का रख-रखाव करने वाला तिरुमला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से एक बार फिर से अपील की है कि उसे सिवेट कैट की नस्ल को बढ़ाने की इजाजत दी जाए.

ट्रस्ट ने कहा है कि, 'टीटीडी इन सिवेट कैट्स के रहने और खाने के ठिकानों का पूरा इंतजाम करेगा. मगर बदले में ट्रस्ट को भी इस बात का भरोसा दिया जाए कि उसे इन कैट्स में से हिस्सा नियमित रूप से मिलेगा'. लेकिन आंध्र प्रदेश का वन विभाग इस प्रस्ताव को लेकर उत्साहित नहीं.

सवाल ये है कि तिरुपति देवस्थान को सिवेट कैट्स की जरूरत क्या है? बिल्लियों की खत्म होती ये प्रजाति, रात में बसर करने वाली होती है. इन्हें फारसी बिल्लियां या टॉडी कैट्स के नाम से भी जाना जाता है.

इसकी पूंछ के पास एक ग्रंथि होती है, जिससे कस्तूरी जैसा रिसाव होता है. इसका तेल भगवान वेंकटेश्वर पर चढ़ाने में इस्तेमाल होता है. शुक्रवार को होने वाली खास प्रार्थनाओं में भगवान के श्रृंगार में इस तेल का इस्तेमाल होता है.

2006 में तिरुपति देवस्थानम पर हुआ था केस

2008 से पहले मंदिर की गोशाला में ये सिवेट कैट्स पाली जाती थीं. ये गैरकानूनी था. इसका विरोध हुआ तो केंद्र के वन और पर्यावरण मंत्रालय ने मंदिर ट्रस्ट के खिलाफ कार्रवाई की. वहां पाली जा रही पंद्रह सिवेट कैट्स को आंध्र प्रदेश के वन विभाग ने अपने कब्जे में ले लिया.

इन्हें ले जाकर तिरुपति के भगवान वेंकटेश्वर चिड़ियाघर में रखा गया. तिरुपति देवस्थानम पर जानवरों पर जुल्म करने का केस दर्ज किया गया. क्योंकि वो सिवेट कैट्स के जिस्म से जबरदस्ती तेल निकाल रहे थे. इनसे रोजाना दो मिलीग्राम तेल निकाला जाता था.

हालांकि देवस्थानम के खिलाफ ये केस बाद में खारिज कर दिया गया. वन विभाग ने 2008 में गौशाला से बरामद सिवेट कैट्स को लेकर टीटीडी के खिलाफ 2013 में आपराधिक केस कर दिया. ये केस चार साल चला.

पिछले हफ्ते एक स्थानीय अदालत ने केस को खारिज कर दिया और टीटीडी के अधिकारियों को बरी कर दिया. तिरुपति के चिड़ियाघर के संरक्षक वाई श्रीनिवास रेड्डी बताते हैं वो सिवेट कैट्स अभी भी चिड़ियाघर में ही हैं.

civet cat

सिवेट कैट

सिवेट ऑयल के लिए सिवेट कैट्स का खर्च उठाने को तैयार है ट्रस्ट 

2006 में तिरुपति देवस्थानम ने चिड़ियाघर में ही सिवेट कैट्स के रहने के लिए बने एक ठिकाने का खर्च उठाने का फैसला किया. इसका रख-रखाव वन विभाग को करना था. टीटीडी ने इसके लिए सालाना दस लाख रुपए खर्च करने की इजाजत दी. ताकि मंदिर को नियमित रूप से सिवेट ऑयल मिलता रहे.

लेकिन वन विभाग को इस पर एतराज है. वन विभाग सीधे केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के तहत आता है. वो जानवरों से तेल निकालकर मंदिर को देने की गारंटी नहीं दे सकता. ये वाइल्डलाइफ एक्ट के खिलाफ होगा.

तिरुपति वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट सर्किल के चीफ फॉरेस्ट कंजरवेटर, पी वी चलापति राव कहते हैं कि हम सिर्फ सिवेट कैट की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार हैं. हम उनके जिस्म से कुछ निकाल नहीं सकते. उसका कारोबार नहीं कर सकते.

हालांकि अगर तिरुमला तिरुपति देवस्थानम सिवेट कैट के रहने का ठिकाना बनाना चाहता है, उसका खर्च उठाना चाहता है, तो, इस बात पर वन विभाग को कोई ऐतराज नहीं. सिवेट कैट के रहने का ये रात्रि घर बनाने का खर्च करीब पांच करोड़ रुपए बैठने का अंदाजा है.

लेकिन इतना पैसा खर्च करने के एवज में देवस्थान इस बात की गारंटी चाहता है कि उसकी सिवेट ऑयल की जरूरत पूरी की जाएगी. इस बारे में ट्रस्ट लिखित आश्वासन चाहता है. वन विभाग ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया है.

बिना कानूनी बदलाव के नहीं मिलेगी इजाजत

एन चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाली आंध्र प्रदेश सरकार, टीटीडी की मदद करने की कोशिश कर रही है. नायडू ने पूर्व वन और पर्यावरण राज्य मंत्री प्रकाश जावडेकर से इस मामले में दखल देने की मांग की थी.

इसके लिए 1972 के वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के शेड्यूल-2 में बदलाव की जरूरत थी. मगर प्रकाश जावड़ेकर ने ऐसा करने से मना कर दिया था. जिसमें खतरे में पड़े जानवरों की नस्लों के बंद जगह पर पालन-पोषण करने पर रोक है.

जावड़ेकर ने नायडू से कहा था कि इस कानून में बदलाव से लोगों को खतरे में पड़े जानवरों को घर में पालतू बनाकर रखने की इजाजत मिल जाएगी. लोग अपने घरों और बगीचों में ऐसे जानवर रखने लगेंगे.

सिवेट ऑयल के लिए टीटीडी की बेकरारी क्यों?

सिवेट ऑयल को तेलुगू में फुनगू थैलम कहा जाता है. यह तेल दक्षिण भारत के हर मशहूर और अमीर मंदिर में इस्तेमाल होता है. त्रिची के श्रीरंगम मंदिर में इस तेल से मूर्ति की सफाई की जाती है, जब आषाढ़ में मंदिर एक महीने के लिए बंद होता है.

उडूपी के श्रीकृष्णा मंदिर, पुरी के जगन्नाथ मंदिर, कोल्हापुर के लक्ष्मी मंदिर और विशाखापत्तनम के पास स्थित सिहांचलम मंदिर में भी इस तेल का इस्तेमाल होता है.

तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के पूर्व पुजारी, कोर्लाहल्ली वेंकटेशाचार्य कहते हैं, 'ये सभी मंदिर फुंनगू थैलम बाजार से खरीदते हैं. सिर्फ तिरुपति में ही इस तेल की सालाना पांच से दस किलो तक की खपत है. यहीं पर सिवेट कैट पालने की कोशिश की जा रही है'.

देवस्थानम का कहना है कि वो कभी भी सिवेट कैट्स से जोर-जबरदस्ती नहीं करते. मंदिर की गोशाला के निदेशक हरनाथ रेड्डी कहते हैं कि, 'हम सिवेट कैट्स के पिंजरे में चंदन की लकड़ी के टुकड़े रख देते हैं. जिस पर ये कैट्स अपना बदन रगड़ती हैं. उससे पसीना और हारमोन निकलते हैं'. हालांकि रेड्डी साफ करते हैं कि अब गोशाला में एक भी सिवेट कैट नहीं है.

civet_cat_in_cage

सिवेट कैट्स के तेल से निखरती है भगवान की खूबसूरती 

पहले तिरुमला मंदिर के पुजारी अपने घरों में सिवेट कैट्स पालते थे, ताकि भगवान के श्रृंगार के लिए जरूरी तेल जुटाया जा सके. मंदिर ट्रस्ट, शेषाचल के जंगलों में रहने वाले आदिवासियों से भी ये सिवेट कैट्स खरीदता था.

चूंकि ये कैट्स मांसाहारी होती हैं, इस वजह से इन्हें पालना बड़ा सिरदर्द था. इसके बाद पुजारियों ने इन्हें गोशाला के हवाले कर दिया.

अब चूंकि ये सिवेट कैट्स ज्यादातर लकड़ी की मांद या पत्थर की चट्टानों के बीच रहती हैं, तो वो पिंजरे में रहने वाली कैट्स से प्रजनन नहीं करती थीं. उनमें भयंकर लड़ाइयां भी होती थीं. इसमें कई मारी गईं. इसी वजह से उनका रख-रखाव बेहद मुश्किल हो गया था.

सिवेट ऑयल को कस्तूरी, जिंजेली ऑयल और चंदन के साथ मिलाकर, भगवान वेंकटेश्वर पर उसका लेप किया जाता है. हर शुक्रवार भगवान की आठ फुट ऊंची मूर्ति का ऐसे श्रृंगार किया जाता है कि मूर्ति चिकनी रहे और टूटे-फूटे नहीं.

पहले तिरुमला तिरुपति देवस्थानम, भक्तों को एक खास 'अरिजित सेवा' या 'फुनगू गिन्ने सेवा' करने का मौका भी भक्तों को देता था. जिसमें कुछ गिने चुने भक्त, सिवेट पूजा के बर्तन को छू सकते थे. इसके एवज में उन्हें तीन सौ रुपए खर्च करने पड़ते थे. लेकिन अब तेल मिलने में दिक्कत होने से ये पूजा भी खत्म करनी पड़ी है.

पंडित और मंदिर के पुजारी कहते हैं कि वैष्णव देवता भगवान वेंकटेश्वर को सिवेट ऑयल की मीठी खुशबू बेहद पसंद है. ये बात सदियों से प्रचलित है.

श्रीवारी मंदिर के मुख्य पुजारी ए वी रामाना दीक्षितुलू कहते हैं, 'फुनगू थैलम से भगवान की खूबसूरती भी निखरती है. इससे बड़ी संख्या में भक्त उनके दर्शन के लिए आते हैं. इससे वेंकटेश्वर भगवान को अलग ही रूप मिलता है.'

फिलहाल तो सिवेट कैट को बांधकर पालने का विवाद जारी है. यह विवाद तब तक रहेगा, जब तक वाइल्ड लाइफ एक्ट में बदलाव नहीं किया जाता. वन और पर्यावरण मंत्रालय का मानना है कि एक्ट में बदलाव का मतलब है विवादों के नए पिटारे को खोलना, जो वो बिल्कुल नहीं चाहते.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi