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भूख से हुई बच्ची की मौत पर कोई #Metoo कैंपेन क्यों नहीं?

ऐसा तो नहीं कि भीड़ का हिस्सा बनकर हम अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं?

Swati Arjun Swati Arjun Updated On: Oct 20, 2017 09:41 AM IST

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भूख से हुई बच्ची की मौत पर कोई #Metoo कैंपेन क्यों नहीं?

सोशल मीडिया यानि वो शै- जो पलक झपकते, उंगली की थिरकन के साथ ही अपके की-बोर्ड से निकले शब्दों को न सिर्फ बिजली की गति से चलायमान बना देता है बल्कि आपकी आमतौर पर नजरअंदाज की जाने वाली बातों को भी खास बना देता है.

कुछ ऐसा ही हुआ जब 3-4 दिन पहले हॉलीवुड अभिनेत्री रोज़ मैक्गोवन ने, हॉलीवुड के सफलतम प्रोड्यूसरों में से एक हार्वे व्हाईंस्टन के खिलाफ यौन शोषण और बलात्कार का आरोप लगाया है. तब से लेकर अब तक व्हाईंस्टन पर तकरीबन 45 महिलाओं ने यौन शोषण के आरोप लगा दिए हैं.

व्हाईंस्टन के समर्थन में सोशल मीडिया में #Metoo कैंपेन चालू हो गया, जिसे भारत समेत पूरी दुनिया की औरतों और मर्दों का एक समान समर्थन हासिल हुआ. हर किसी ने अपनी टाइमलाइन पर ये बताया कि कैसे उनके साथ जीवन में कभी न कभी यौन शोषणा जैसा हादसा हुआ है.

इसके ठीक दो दिन के बाद भारत के पूर्व में बसे राज्य झारखंड के सिमडेगा में एक 11 साल की बच्ची भूख से तड़पते हुए अपनी जान गंवा देती है. उसकी मां के मुताबिक आधार कार्ड में नाम न होने के कारण उन्हें चावल नहीं मिला और बच्ची ‘भात-भात’ कहते हुए मर जाती है. इस घटना को चार दिन हो गए, लेकिन उस बच्ची के समर्थन या सरकारी नीतियों के विरोध में कहीं कोई हैशटैग नज़र नहीं आया.

झारखंड की दूरी राजधानी दिल्ली से तकरीबन 1200 किमी की है, एक आदिवासी बहुल लेकिन प्राकृतिक संपदा से संपन्न राज्य, जिसका गठन हुए अभी दो दशक भी नहीं हुआ है लेकिन जिसकी मुख्यमंत्री की संख्या 9-10 के आसपास पहुंच चुकी है.

हॉलीवुड से इस राज्य की तुलना करें तो- बस यही कह पाएंगे- ये ग्लोब के दो अलग-अलग छोर पर बसी बिल्कुल जुदा समकालीन सभ्यताएं हैं. लेकिन एक का वास्ता हमारे सपनों...हमारी आकांक्षाओं, हमारी सुप्त हो चुकी लालसाओं से है तो दूसरे का वास्ता हमारी सच्चाई से जिसे हम बड़ी कुशलता से सौंदर्य और संपन्नता की झूठी परत से ढंक कर रखना चाहते हैं.

सवाल किसी मुद्दे को मिल रहा समर्थन या विरोध नहीं, सवाल किसी घटना को नजरअंदाज करना भी नहीं है न ही ये कि आखिर क्यों घर में हुई एक अमानवीय मौत- सात समंदर पार हुई एक घटना के सामने तुच्छ साबित हो रही है. सवाल ये है कि हम भीड़ का हिस्सा क्यों बनते जा रहे हैं. आखिर इससे हमें ऐसा क्या हासिल हो रहा है जो कोयली देवी की मरी हुई बेटी के संताप में शामिल होने से रोक रहा है.

सिर्फ तीन दिन पहले इंटरनेश्नल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने साल 2017 का ग्लोबल हंगर इंडेक्स जारी किया जिसमें 119 देशों की सूची में भारत का नंबर 100वां आया है. ये इंडेक्स 9 सालों के अंतराल के बाद जारी किया गया है. जिससे ये साबित होता कि भारत की सरकारें ही नहीं बल्कि यहां के लोग भी अपने साथ रहने वाले गरीब, भूखे, बीमार और लाचार की मदद करने में किस तरह से असफल साबित हुए हैं. आखिरकार इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि कोई भी समाज 10 सालों में एक नई जिम्मेदार पीढ़ी का निर्माण करता है.

भारत की वो नई और जवान पीढ़ी सोशल मीडिया में अपनी मौजूदगी बहुत ही जबरदस्त तरीके से दर्ज कराती है. फेसबुक हो या ट्विटर हर साल इनके द्वारा जारी किए गए आंकड़े ये साबित करते हैं कि उनके यूजर्स में भारतीयों की संख्या सबसे ज्यादा है.

इसके उलट अगर हम ग्लोबल हंगर इंडेक्स के आंकड़ों पर नजर डालें तो पाएंगे कि जिन देशों के हालात भारत से भी खराब हैं उनमें एशिया से सिर्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान शामिल हैं- जो कमोबेश अस्थिर राजनीतिक हालात, युद्ध और आतंकवाद की चपेट में है. इस लिस्ट में शामिल किए गए अन्य देशों में से ज्यादातर अफ्रीकी देश हैं- जैसे सूडान, यमन, इथियोपिया, ज़िंबाब्वे और नाइजीरिया.

भारत के चारों पड़ोसी देश जिनमें चीन, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश की रैंकिंग भी क्रमश: 29वां, 72वां, 84वां और 88 है. हमारे देशवासियों की हालत उत्तर कोरिया के तानाशाह किम-जोंग-उन के अधीन रहने वाले लोगों से बुरी है. 2014-2017 के तीन सालों में, इस इंडेक्स में भारत 45 पायदान नीचे आ गया है. यानि- हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था, उत्तर कोरिया के तानाशाही शासन से भी बुरी साबित हो रही है.

अब वापस चलते हैं- #Metoo कैंपेन पर. क्या अब भी ये समझना मुश्किल है कि ऐसे कैंपेन को सोशल मीडिया में इतना समर्थन क्यों मिलता है? हर कोई वहां क्यों अपनी टाइमलाइन पर सारी इंसानियत, सारी समझदारी, सभी तरह के एक्ट्विजम में शामिल हो जाता है- क्योंकि वहां उन्हें सिर्फ दिखने की जरूरत है- कुछ करने की नहीं. अंग्रेज़ी का एक शब्द है- ‘Doer’, जिसका मतलब होता है करने वाला.

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सोशल मीडिया आपके करने को यहां-लिखने की परिभाषा में गढ़ता और आपकी काबिलियत को सीमित कर देता है, आपको लगता है कि लिखकर आप अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गए हैं. लिखना- किसी भी हाल में कोई कमतर काम नहीं है- लेकिन आप ऐसे प्लेटफॉर्म पर लिख रहे हैं जो एक क्लिक के साथ- आपके लिखे को मिटा देता है- जहां आपके लिखे की शेल्फ लाइफ कुछ मिनटों की होती है, जहां आपका लिखा हुआ- असल में मिटता हुआ शब्द है.

कोई भी आंदोलन सोशल मीडिया या सिर्फ मीडिया के सहारे खड़ा नहीं होता- ज्यादा पुरानी बात नहीं है, क्या अन्ना का आंदोलन बगैर सड़क पर उतरे सफल हो पाता या निर्भया को इंसाफ सिर्फ सोशल मीडिया के जरिए मुमकिन थी?

किसी भी सवाल का जवाब...अन्याय से न्याय....प्रतिरोध का स्वर जमीन पर उतरे बगैर नामुमकिन है- उस भीड़ का हिस्सा बनकर नहीं जो एक क्लिक के साथ गायब हो जाती हो. आवाज वही सुनाई देती है- जो अकेली ही सही पर पुरजोर तरीके से उठाई गई हो, कोरस में गाने वाला सिंगर सिर्फ लय और ताल का हिस्सा बनता है.

इसलिए- अगर हम या आप बदलाव का हिस्सा बनना चाहते हैं, अपने देश और देश के लोगों के लिए शुभेच्छाएं रखते हैं तो जरूरत कुछ करने की है- सिर्फ लिखने की नहीं. करने की वहां- जहां हमारी जरूरत है, वहां- जहां गलत हो रहा है, उनके साथ खड़े होने की जो हाशिये पर हैं- उस बच्ची के साथ जो ‘भात-भात’ कहते हुए दम तोड़ देती है, वो नाबालिग लड़की जो सड़क पर बच्चे को जन्म देती है और फ्रॉक से अपने बच्चे को ढंकने की कोशिश करती है- वो लड़की जो दफ्तर में किसी सीनियर के व्यवहार की शिकायत करती है तो आप उसे चुप नहीं बोलने का हौसला देते हैं. इस दिवाली हमें ये तय करने की जरूरत है कि- सोशल होना ज्यादा जरूरी है या सामाजिक होना.

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