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मध्य प्रदेश बोर्ड रिजल्ट: 70 फीसदी नंबर लाने वाले छात्र भी क्यों कर रहे हैं आत्महत्या

राज्य में अब तक दर्जन भर से अधिक बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं

Dinesh Gupta Updated On: May 26, 2017 08:44 AM IST

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मध्य प्रदेश बोर्ड रिजल्ट: 70 फीसदी नंबर लाने वाले छात्र भी क्यों कर रहे हैं आत्महत्या

हाई स्कूल और हायर सेकेंड्री परीक्षा का परिणाम घोषित होते ही मध्यप्रदेश में बच्चों द्वारा आत्महत्या करने का सिलसिला शुरू हो गया. राज्य में अब तक दर्जन भर से अधिक बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं.

आत्महत्या करने वाले कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जो कि सत्तर प्रतिशत से अधिक अंकों से पास हुए थे. इनमें से अधिकांश बच्चे गरीब परिवारों और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले हैं.

इस साल बोर्ड की परीक्षा में 51 प्रतिशत से अधिक बच्चे फेल हो गए हैं या सप्लीमेंट्री में हैं. बच्चों द्वारा आत्महत्या किए जाने से उठे बवाल के बाद सरकार बैठक की औपचारिकता कर यह पता लगाने में जुटी है कि आखिर बच्चे फेल कैसे हो गए?

मनमाफिक रिजल्ट न आने के बाद मध्यप्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल की हेल्पलाइन पर हर दिन पांच हजार से अधिक कॉल आ रहे हैं. कॉल उन बच्चे और उनके अभिभावकों के भी आ रहे हैं, जिन्हें परीक्षा में 88 प्रतिशत अंक मिले हैं.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

मंडल की हेल्प लाइन में काउंसलिग कर रहीं हिना काजमी बताती हैं कि पहले तो उन्हीं बच्चों के फोन आते थे, जो कि फेल हो गए हैं या डिवीजन बिगड़ गया है.

इस बार ऐसे बच्चों और उनके अभिभावकों के फोन आ रहे हैं, जो कि 70 प्रतिशत अंक पाने के बाद भी संतुष्ट नहीं हैं. एक अन्य काउंसलर नीता तिवारी के पास एक ऐसे अभिभावक का कॉल आया जिनके बेटे को बारहवीं की परीक्षा में 88 प्रतिशत अंक मिले.

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मैरिट सूची में नाम न आने के कारण बच्चे ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया. बारहवीं की परीक्षा में 72 प्रतिशत अंक आने के बाद भी भोपाल में सत्रह साल के नमन कड़वे ने जहरीला इंजेक्शन लगाकर आत्महत्या कर ली.

सतना जिले के कोलगांव में तो फेल होने के कारण भाई-बहन ने एक साथ आत्महत्या कर ली. रश्मि पांडे बारहवीं और दीपेंद्र पांडे दसवीं की परीक्षा में फेल हो गया था.

साल दर साल गिर रहा है परीक्षा परिणाम

मध्यप्रदेश में बोर्ड परीक्षाओं का परिणाम साल-दर-साल गिरता जा रहा है. हाईस्कूल का रिजल्ट इस बार 49.86% रहा, जबकि पिछले साल 53.87 प्रतिशत था. यानी पिछले साल के मुकाबले 4 प्रतिशत कमजोर.

इसी तरह हायर सेकंडरी का रिजल्ट 67.87 प्रतिशत रहा, जबकि पिछले साल 69.33 प्रतिशत था. यानी पिछले साल के मुकाबले करीब 1.5 प्रतिशत कम. इस बार हायर सेकेंड्री की मेरिट लिस्ट में 118 परीक्षार्थियों को स्थान मिला है. पिछले साल यह संख्या 134 थी.

मध्यप्रदेश में वर्ष 2003 में बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम इसी तरह के आए थे, तो प्रदेश में यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना था. राज्य में दिग्विजय सिंह की सरकार थी. विपक्षी नेता उमा भारती ने इसे सरकार की बड़ी असफलता के तौर पर प्रचारित किया था. इस बार के परीक्षा परिणाम भी कुछ इसी तरह के हैं.

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शिवराज सिंह चौहान के फेसबुक वाल से

विपक्षी दल कांग्रेस के अध्यक्ष अरूण यादव कहते हैं कि परीक्षा परिणाम इस बात को प्रमाणित करते हैं कि शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने के बाद से शिक्षा सरकार की प्राथमिकता में नहीं रही.

शिवराज सिंह चौहान वर्ष 2006 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. वे इस पद पर बारह साल से हैं. अर्थात शिवराज सिंह चौहान जब मुख्यमंत्री बने थे, तब जो बच्चा केजी में होगा, उसी ने इस साल बारहवीं परीक्षा दी होगी.

सरकारी स्कूलों न टीचर, न साइंस लैब

मध्यप्रदेश में कुल 16271 हाई स्कूल एवं हायर सेकेंड्री स्कूल हैं. इनमें 8555 सरकारी स्कूल हैं. इन स्कूलों के लिए कुल 48484 शिक्षकों के पद सरकार ने मंजूर किए हैं. लगभग 22 हजार टीचरों के पद खाली हैं.

एक हजार से अधिक स्कूल तो ऐसे हैं, जिनमें टीचर ही नहीं हैं. जबकि 3438 स्कूलों में प्रिंसिपल नहीं हैं. पिछले साल दसवीं की परीक्षा में सरकारी स्कूलों के 57.32 प्रतिशत बच्चे पास हुए थे. इस बार कुल 51.98 प्रतिशत बच्चे ही पास हुए हैं.

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आदिवासी विभाग इलाकों में दसवीं का परीक्षा परिणाम और भी खराब रहा है. आदिवासी स्कूलों के कुल 49 प्रतिशत बच्चे ही पास हुए हैं. पिछले साल 59 प्रतिशत बच्चे पास हुए थे. बारहवीं की परीक्षा में भी पिछले साल की तुलना में इस साल सरकारी स्कूलों के तीन प्रतिशत कम बच्चे पास हुए हैं.

पिछले साल सरकारी स्कूलों के 73 प्रतिशत बच्चे पास हुए थे. आदिवासी स्कूलों में पांच प्रतिशत की कमी आई है. जबकि प्राइवेट स्कूलों का परीक्षा परिणाम में एक प्रतिशत का सुधार हुआ है.

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साठ हजार करोड़ रुपए भी नहीं सुधार सका नतीजे

पिछले चार साल में सरकार ने स्कूली शिक्षा की स्थिति सुधारने में साठ हजार करोड़ रूपए से अधिक खर्च किया है. बजट का बड़ा हिस्सा स्कूलों के निर्माण और उसके विकास पर खर्च किया गया है. राज्य में अभी भी ऐसे सैकड़ों स्कूलों हैं, जो भवन विहीन हैं.

बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए भी सरकार कई लोक-लुभावनी योजनाएं चला रही है. बच्चों को मुफ्त साइकिल और किताबें भी दी जा रहीं हैं. 73 लाख छात्रों को छात्रवृति देने की भी योजना चल रही है.

पिछले साल जब कोटा में बच्चों द्वारा आत्महत्या किए जाने का मामला तूल पकड़ा था, तो मध्यप्रदेश की विधानसभा ने विधायक अर्चना चिटनिस की अध्यक्षता में विधायकों की एक कमेटी स्थिति का अध्ययन करने के लिए बनाई थी.

कमेटी के सामने बच्चों की आत्महत्या के जो आंकड़े सामने आए वे चौंकाने वाले थे. वर्ष 2011 में कुल 175 छात्रों ने आत्महत्या की थी. वर्ष 2015 में यह संख्या बढ़कर 248 हो गई.

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि निजी स्कूलों की तुलना में सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले गरीब और मध्यमवर्गीय छात्र बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं. यह रिपोर्ट दो माह पूर्व ही राज्य विधानसभा में टेबल की गई है.

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