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NMC बिल को लेकर डॉक्टर संगठनों में गहरे मतभेद

कई राज्यों के मेडिकल एसोसिएशन नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल में कुछ तब्दीली के बाद इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के साथ सुर में सुर मिलाने के पक्ष में नहीं है

Pankaj Kumar Pankaj Kumar Updated On: Aug 02, 2018 02:55 PM IST

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NMC बिल को लेकर डॉक्टर संगठनों में गहरे मतभेद

मॉनसून सत्र में नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल लाए जाने की चर्चा को लेकर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन पुरजोर विरोध कर रहा है. वहीं देश के कई राज्यों के मेडिकल एसोसिएशन नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल में कुछ तब्दीली के बाद इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के साथ सुर में सुर मिलाने के पक्ष में नहीं है. यही वजह है कि कुछ दिनों पहले इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की ओर से बुलाए गए हड़ताल में कुछ राज्यों के मेडिकल एसोसिएशन ने हिस्सा लेना मुनासिब नहीं समझा. इन राज्यों में महाराष्ट्र मेडिकल एसोसिएशन और दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन प्रमुख है.

इतना ही नहीं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के कुछ भूतपूर्व प्रेसिडेंट ने भी एसोसिएशन द्वारा बुलाए गए हड़ताल को गैरवाजिब करार देते हुए कहा कि सरकार डॉक्टर्स के सुझावों को मानने के लिए तैयार दिख रही है और बिल में मौजूद कई प्रावधान को सरकार ने संशोधित कर दिया है इसलिए सरकार को सदन में बिल रखने का मौका दिया जाना चाहिए और चर्चा के दरम्यान कुछ और तब्दीलियों की गुंजाइश बरकरार है, ऐसा माना जाना चाहिए

दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन (DMA) के प्रेसिडेंट डॉ अश्वनी गोयल कहते हैं कि दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन ने एक्जीक्यूटिव कमेटी की मीटिंग बुलाकर ये फैसला किया कि दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन (DMA) इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) द्वारा बुलाए गए स्ट्राइक में हिस्सा नहीं लेगा. दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन(DMA0 के प्रेसिडेंट डॉ अश्वनी गोयल कहते हैं. 'जिन चार पांच मुद्दों को लेकर डॉक्टर्स के एसोसिएशन और बिल में प्रावधान को लेकर बिरोधाभास था, उसे सरकार ने अपने संशोधित बिल में कमोबेश मान लिया है. ऐसा उन्हें स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य मंत्रालय के जरिए बताया गया है. ऐसे में अगर सरकार संसद में अपनी कथनी और करनी में फर्क करेगी, तब हम राज्यसभा में रखे जाने से पहले व्यापक रूप से बिल का विरोध करेंगे.'

संशोधित बिल की मुख्य बातें

1- दरअसल ऑरिजनल नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल में ब्रिज कोर्स का जिक्र था जिसके जरिए आयुष डॉक्टर्स को छह महीने की ट्रेनिंग देकर उन्हें लिमिटेड प्रैक्टिस करने देने का प्रावधान था. सरकार ऐसा कर देश के सुदूर इलाकों में प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर ऐसे डॉक्टर्स को बहाल करने के उद्देश्य से ये प्रावधान ला रही थी लेकिन संशोधित बिल में ब्रिज कोर्स को हटाकर पूरी तरह राज्य सरकार के हवाले छोड़ दिया है कि वो अपने राज्य में डॉक्टर्स की कमी को पूरा करने के लिए वो ब्रिज कोर्स का सहारा लेना चाहें तो ले सकते हैं.

2- ऑरिजन बिल के मसौदे में एक्जिट एक्जाम का भी जिक्र था और इसको पास करने पर प्रैक्टिस करने के लिए लाइसेंस दिए जाने की बात थी. संशोधित बिल में एमबीबीएस के फाइनल एक्जाम को ही एक्जिट एक्जाम मान लिया गया है.

3- नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल के ऑरिजनल मसौदे में कुल 20 सदस्यों का प्रावधान था जिनमें 11 डॉक्टर और शेष सिविल सोसाइटी के नामचीन लोगों के मनोनीत किए जाने की बात थी. लेकिन संशोधित बिल में 25 सदस्य का प्रावधान है और इनमें 21 डॉक्टर्स होंगे और 4 विभिन्न क्षेत्रों से चुने जाने का प्रावधान है. संशोधित बिल में 21 डॉक्टर्स में से 5 के चुनकर आने का प्रावधान है.

4- संशोधित बिल में नेशनल मेडिकल काउंसिल के चेयरमेन के चयन की प्रक्रिया कैबिनेट सेक्रेटरी की अध्यक्षता में किए जाने का प्रावधान है.

5- नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल के ऑरिजनल मसौदे में प्राइवेट और डीम्ड कॉलेज को ये अधिकार दिया गया था कि 60 फीसदी सीट्स के लिए वो फीस खुद तय करे और ऐसा कर सरकार प्राइवेट प्लेयर्स को भी बढ़ावा देना चाह रही थी, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग मेडिकल कॉलेज खोलने को लेकर तत्परता दिखाएं और इससे एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा प्राइवेट कॉलेज में भी बहाल हो सके. जाहिर है स्वस्थ प्रतिस्पर्धा मनमानी फीस पर अंकुश लगाने का काम करेगी, वहीं इससे ज्यादा से ज्यादा डॉक्टर तैयार होंगे, जिनसे डॉक्टरों की कमी से निपटने में मदद मिलेगी. लेकिन संशोधित बिल में इसे 50 फीसदी कर दिया गया है. अब 50 फीसदी कोटा सरकार भरेगी वहीं 50 फीसदी नीट के तहत चुने गए छात्र कॉलेज द्वारा निर्धारित फीस को भरेंगे.

नए प्रावधानों को समझने वाले डॉक्टरों ने बनाई दूरी

दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन सरकार के संशोधित प्रस्ताव को सकारात्मक नजरिए से देख रही है. डीएमआई के प्रेसिडेंट कहते हैं, ‘नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल को लेकर कई भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं लेकिन जो भी राज्य और उसके डॉक्टरों के संगठन संशोधित बिल के प्रावधान को जान पाए हैं, उन्होंने अपने आप को इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के द्वारा बुलाए गए हड़ताल से अपने आप को दूर रखा है.’

ऐसा ही कमोबेश इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पुराने प्रेसिडेंट डॉ एस एस अग्रवाल भी मानते हैं. फ़र्स्टपोस्ट से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘हमारी मांगों को सरकार ने आंशिक रूप से माना है लेकिन सरकार का रुख सकारात्मक है. वो रेगुलेटरी बॉडी में बदलाव लाकर मेडिकल एजुकेशन को बेहतर बनाना चाह रही है इसलिए नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल को सदन में पेश करने देना चाहिए. बिल को सदन में रखे जाने के बाद चर्चा-परिचर्चा के दौरान भी कई तब्दीलियां संभव हैं, इसलिए मैं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के हड़ताल का पक्षधर नहीं हूं.’

दरअसल डॉक्टर एस एस अग्रवाल प्राइवेट कॉलेज और डीम्ड यूनिवर्सिटीज में 15 फीसदी से ज्यादा सीटों के फीस निर्धारण तय करने का अधिकार प्राइवेट कॉलेज प्रबंधन को देने के पक्षधर नहीं हैं. वहीं फाइनल एक्जाम जिसे संशोधित बिल में एक्जिट एक्जाम मान लिया गया है उसको लेकर वो राज्य के हिसाब से परीक्षा लिए जाने के पक्षधर हैं. लेकिन डॉक्टर एस एस अग्रवाल एमसीआई को भंग किए जाने और नेशनल मेडिकल काउंसिल बनाए जाने के पक्ष में अपनी दलील पेश करते हैं.

डॉक्टरों की स्वायत्त संस्था को बर्बाद करने के लिए है ये कवायद?

लेकिन जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ केके अग्रवाल जो कि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के इससे पहले के प्रेसिडेंट रह चुके हैं. वो एनएमसी बिल का पुरजोर विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि एनएमसी बिल को लेकर डॉक्टर्स के किसी भी संगठन में कोई विरोध नहीं है और ये पूरी की पूरी कवायद डॉक्टर्स की स्वायत्त संस्था को बर्बाद करने के लिए है. डॉक्टर अग्रवाल कहते हैं, ‘बदलाव ही करना था तो इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट में करते लेकिन डॉक्टर्स के ऑटोनोमस बॉडी को खत्म कर उसे ब्यूरोक्रेसी के हवाले करने का क्या मतलब है. मेडिकल काउंसिल एक चुनी हुई संस्था है पर नए बिल में सिर्फ 5 लोगों के चुने जाने का प्रावधान है.’

जाहिर है वो मेडिकल काउंसिल को भंग कर नए काउंसिल के गठन के बिल्कुल खिलाफ हैं और संशोधित बिल में ब्रिज कोर्स को लेकर राज्य सरकार पर फैसला करने की जिम्मेदारी छोड़ना उन्हें मेडिकल प्रोफेशन को और खराब करने के लिए उठाया गया कदम जैसा जान पड़ता है.

लेकिन कई देशों में ब्रिज कोर्स जैसे प्रावधान अपनाए गए हैं जिन्हें कर लेने के बाद लिमिटेड एलोपैथी के प्रेक्टिस करने का लाइसेंस दिया जाता है. इनमें चीन, साउथ अफ्रीका और बांग्लादेश भी शामिल है. इतना ही नहीं कई विकसित देश भी लिमिटेड एलोपैथी प्रैक्टिस करने का लाइसेंस देते हैं. देश के अंदर छत्तीसगढ़ ने 3 साल का कोर्स शुरू किया था, जिससे प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर छोटे-छोटे गांव में बेहतर चिकित्सा मुहैया कराने में काफी मदद मिली थी.

नीति आयोग के सलाहकार आलोक कुमार कहते हैं, 'इस बिल को तैयार करने से पहले तमाम स्टेक होल्डर्स की राय ली गई है जिसमें डॉक्टर्स भी बड़े पैमाने पर शामिल हैं. ऐसे में ये कहना उचित नहीं होगा कि देश के ज्यादातर डॉक्टर्स नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल के खिलाफ हैं.'

दरअसल नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल की जरूरत संसदीय समिति की रिपोर्ट के बाद पड़ी, जिसमें मेडिकल काउंसिल को बदलकर नए बॉडी के गठन की बात कही गई थी. इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से ओवरसाइट कमेटी बनाकर मेडिकल काउंसिल की कार्यप्रणाली पर निगरानी रखने का आदेश दिया था. ऐसे में देश के कई राज्यों के संगठन नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल में संशोधन के बाद सरकार के खिलाफ हड़ताल करने के पक्षधर नहीं हैं. यही वजह है कि हाल के दिनों में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा बुलाए गए हड़ताल का व्यापक असर दिल्ली में भी नहीं दिखा और प्राइवेट अस्पताल से लेकर सरकारी अस्पताल के डॉक्टर्स बड़ी संख्या में मौजूद रहे.

दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के प्रेसिडेंट डॉ अश्वनी गोयल कहते हैं, ‘अलवर से लेकर कर्नाटक तक हमारी बात डॉक्टर्स एसोसिएशन से हुई जिन्हें संशोधित बिल के बारे में या तो जानकारी नहीं थी या फिर भ्रांतियां थी लेकिन हमसे बात करने के बाद उन लोगों ने भी इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के द्वारा बुलाए गए हड़ताल से पल्ला झाड़ लिया.’

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