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सवाल नहीं पूछने की वजह से ही पिछड़ गया भारत!

जहां सवाल पूछने की आजादी दिखती थी वहां देशद्रोह के फतवों ने कबाड़ा करना शुरु कर दिया है

Vinod Verma Updated On: Apr 14, 2017 05:49 PM IST

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सवाल नहीं पूछने की वजह से ही पिछड़ गया भारत!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हनुमान जयंती पर भारतीय जनता पार्टी के सांसदों को सलाह दी है कि वे हनुमान की तरह काम करें. उन्होंने कहा, 'पूरी रामायण में हनुमान ने कभी भगवान राम से सवाल नहीं पूछा, हमेशा उनके चरणों में शीश झुकाए रहे.'

एक ओर नरेंद्र मोदी जी ने इस उदाहरण के जरिए चतुराई से अपने आपको ‘भाजपा के राम’ की तरह स्थापित कर लिया है.

बीजेपी के कई सांसद जो उम्र और अनुभव में नरेंद्र मोदी से आगे हैं वे भी एकाएक बौने हो गए हैं. जो अपने आपको गुरु वशिष्ठ मानते रहे होंगे वे भी एकाएक हनुमान हो गए हैं.

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क्या हुआ 'अच्छे दिनों' के वादे का?

दूसरी ओर नरेंद्र मोदी ने उन सभी सवालों को निकट भविष्य के लिए टाल दिया है जो उनके कामकाज और प्रदर्शन को लेकर पार्टी के भीतर पूछे जा सकते थे.

जनता के मन में तो सवाल हैं कि ‘अच्छे दिन’ कब तक आ जाएंगे लेकिन उसकी चिंता नरेंद्र मोदी जी को नहीं है क्योंकि वे जानते हैं कि उन्हें 2019 के पहले जनता के सामने जाना नहीं है.

मीडिया से वे मिलते नहीं हैं तो सवाल केवल बीजेपी के लोग पूछ सकते थे सो उन्हें भी कह दिया गया है कि वे चुप ही रहें, चरणों में शीश झुकाए रहें.

बीजेपी को नरेंद्र मोदी ने जहां पहुंचाया है, उसके लिए पार्टी सौ बार उनके चरणों में झुकी रह सकती है. उनसे सवाल पूछना तो दूर उफ तक नहीं कर सकती.

लेकिन प्रधानमंत्री देश के मुखिया भी हैं. देश के मुखिया के रूप में अगर उनका यह संकेत देश की जनता के लिए भी है तो इसके संदेश अच्छे नहीं जाएंगे.

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हमारी तो परंपरा ही सवाल सिखाती थी 

हम विज्ञान के युग को पीछे छोड़ आए हैं और अब तकनीक के युग में रह रहे हैं. जहां वर्चुएल रियालिटी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बात हो रही है. और वहां हर नया सवाल एक नई तकनीक को जन्म दे सकता है.

अब जवाब से ज्यादा अहम सवाल हो गए हैं क्योंकि सवालों ने ही समाज को आगे बढ़ने का रास्ता बताया है.

भारतीय समाज एक सवाल पूछने वाला समाज रहा है. सिद्धार्थ के मन में जो सवाल उपजे थे उसने ही उन्हें गौतम बुद्ध बनाया था. सवालों ने ही आर्यभट्ट को गणित के कठिन साध्यों और समीकरणों का हल तलाश करने में सफलता दी और उन्हें खगोल का अद्वितीय विद्वान बनाया था.

हम शास्त्रार्थ की परंपरा के लोग हैं जहां निरुत्तर करने वाले सवालों से जीत हार तय होती थी और हम कबीर की परंपरा के लोग हैं जो ईश्वर की सत्ता को भी चुनौती देकर पोंगापंथ को गरिया सकते हैं.

हम आगे बढ़ रहे हैं या पीछे जा रहे हैं?

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तस्वीर: बीजेपी की वेबसाइट से

 

 

कबीर के समानांतर एक समाज इसी भारतीय समाज में पता नहीं कैसे पनप गया जो सवाल ही पूछना भूल गया. वह रामचरित मानस में पुष्पक विमान के बारे में तो पढ़ता रहा लेकिन यह उसके मन में कभी नहीं आया कि यह विमान क्या होता है और वह उड़ता कैसे होगा?

अगर उनके मन में यह सवाल आ जाता तो विमान का आविष्कार राइट बंधुओं की जगह किसी भारतीय के नाम होता. सेब न सही आम तो बहुत से भारतीयों के सिर गिरा होगा लेकिन न्यूटन के मन में ही यह सवाल क्यों आया कि फल टूट कर नीचे ही क्यों गिरता है?

क्यों न हमने बिजली का आविष्कार किया न बल्ब का, न इंजिन बनाई न गाड़ी, न टेलीफोन बनाया न ग्रामोफोन. पूरी बीसवीं सदी आविष्कारों की सदी थी लेकिन हमारे लिए छुआछूत, जात-पात की लड़ाई की सदी रही और जो बचा उनमें हमने आजादी की लड़ाई लड़ी.

यह कुतर्क कई लोगों के मन में आ सकता है कि हम तो गुलाम थे क्या करते? तो मामला राजनीतिक गुलामी का है ही नहीं मानसिक आजादी का है. वरना यूरोप भी बीसवीं सदी में कम लड़ाई झगड़ों से नहीं जूझ रहा था, जहां दनादन आविष्कार हो रहे थे.

हमें तो पोंगापंथियों ने पता नहीं किस भ्रम में डाल दिया जिसमें हम अपनी अज्ञात सांस्कृतिक विरासत की खुमारी में डूबे रहे और आज भी डूबे हुए हैं.

अब तो बस सुनने की आदत डाल ली है हमने

narendra modi

 

पिछले 3 साल ने तो इस खुमारी में मानों किसी नशीली दवा की पिनक और पैदा कर दी है कि हम सवाल पूछने की जगह जवाब देने लगे हैं. गणेश के सिर में प्लास्टिक सर्जरी का दाव कर रहे हैं गोबर में सोना पैदा कर रहे हैं.

स्कूलों में सवाल पूछना तो पता नहीं कब का प्रतिबंधित हो चुका. हमारे कॉलेज तो सवाल पूछने से घबराते हैं. ले-देकर एकाध संस्थान थे जहां सवाल पूछने की आजादी दिखती थी वहां देशद्रोह के फतवों ने कबाड़ा करना शुरु कर दिया है.

प्रधानमंत्री सहित पूरे देश को समझने की जरूरत है कि इस देश को इस समय सबसे अधिक जरूरत सवालों की है. वो सवाल गाय से लेकर गोबर तक और इंटरनेट से लेकर ईंधन तक सब कुछ से जुड़ा हो सकता है.

भारत को सवालों का सामना करने की ट्रेनिंग की जरूरत है न कि यह सीख देने की कि वह हनुमान की तरह चरणों में पड़ा रहे.

याद रखने की जरूरत है कि सवाल पूछने से गीता जैसे ग्रंथ का जन्म होता है और वैज्ञानिक आविष्कार होते हैं. भक्ति से सिर्फ पोंगापंथ निकलता है.

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