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अनिवार्य उपस्थिति के फरमान की क्यों ‘ऐसी की तैसी’ कर रहे हैं जेएनयू के स्टूडेंट्स

जेएनयू के स्टूडेंट्स और टीचर्स पूरी तरह से एकजुट हो कर जेएनयू प्रशासन द्वारा क्लास रूम में 75% अटेंडेंस को अनिवार्य किए जाने का विरोध कर रहे हैं.

Updated On: Feb 14, 2018 05:09 PM IST

Piyush Raj Piyush Raj
कंसल्टेंट, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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अनिवार्य उपस्थिति के फरमान की क्यों ‘ऐसी की तैसी’ कर रहे हैं जेएनयू के स्टूडेंट्स

जेएनयू के स्टूडेंट्स और टीचर्स पूरी तरह से एकजुट हो कर जेएनयू प्रशासन द्वारा क्लास रूम में 75% अटेंडेंस को अनिवार्य किए जाने का विरोध कर रहे हैं. पहली नजर में जेएनयू को करीब से न जानने-समझने वाले लोगों को यह लग ही सकता है कि आखिर इसमें गलत क्या है? कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि स्टूडेंट्स पढ़ना नहीं चाहते हैं और शिक्षक पढ़ाना नहीं चाहते हैं. इस वजह से ये लोग अनिवार्य उपस्थिति का विरोध कर रहे हैं.

जबकि सच्चाई ठीक इसे उलट है. जरा एक बार सोचिए अगर जेएनयू के स्टूडेंस पढ़ना नहीं चाहते हैं और शिक्षक पढ़ाना नहीं चाहते हैं और सिर्फ राजनीति ही करना चाहते हैं तो इतने सालों से जेएनयू देश का सबसे सर्वश्रेष्ठ यूनिवर्सिटी कैसे बना हुआ है? NAAC लगातार क्यों जेएनयू की ग्रेडिंग सबसे अधिक कर रहा है? कैसे जेएनयू को सर्वेश्रेष्ठ यूनिवर्सिटी का प्रेसिडेंट अवार्ड मिल रहा है? क्यों दुनिया में अगर भारत के किसी अच्छे यूनिवर्सिटी का नाम लिया जाता है तो उसमें जेएनयू जरूर शामिल होता है?

इसके बरक्स बिल्कुल नियम-कायदे जैसे की 75% अनिवार्य उपस्थिति वाले विश्वविद्यालयों का कहीं नामों-निशान नहीं है. जेएनयू को जेएनयू बनाने में सिर्फ यहां कि अकादमिक सुविधाओं का ही हाथ नहीं है बल्कि यहां के वातावरण का इससे अधिक योगदान है. जिन्हें यह गलतफहमी है कि जेएनयू के स्टूडेंट्स क्लास नहीं करते हैं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि किसी भी अन्य भारतीय विश्वविद्यालय के स्टूडेंट्स की तुलना में अधिक क्लास करते हैं. दरअसल जेएनयू में उपस्थिति कभी भी समस्या नहीं रही है.

इसके बाद कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि जब स्टूडेंट्स क्लास आते ही हैं तो फिर अनिवार्य उपस्थिति का विरोध क्यों? दरअसल इस फरमान के विरोध के दो पक्ष हैं. एक तकनीकी पक्ष और दूसरा दार्शनिक पक्ष.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

तकनीकी पक्ष यह है कि जेएनयू में क्लास रूम में परफार्मेंस पर भी ग्रेड मिलते हैं. इसमें सेमिनार, पेपर प्रजेंटेशन, मिड सेमेस्टर से लेकर कई तरह की प्रक्रिया शामिल होती है. इसमें कई काम तो सरकारी तौर से घोषित छुट्टियों के दिन भी होते हैं. ऐसे में इन दिनों में उपस्थित हुए स्टूडेंट्स का हिसाब कैसे रखा जाएगा. अभी तक अनिवार्य उपस्थिति का प्रावधान न होने की वजह से शिक्षक और स्टूडेंट आपस में मिलकर इनका समय तय कर लेते थे.

इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जेएनयू में अंतर-अनुशासनिक पढ़ाई पर जोर दिया जाता है और स्टूडेंट्स दूसरे स्कूलों और सेंटरों के विषय भी चुनते हैं. ऐसे में कोई स्टूडेंट कभी किसी स्कूल में क्लास करने जाता तो कभी किसी और स्कूल में. अब सवाल यह है कि ऐसे स्टूडेंट्स की हाजिरी का हिसाब-किताब कैसे होगा.

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सबसे बड़ी दिक्कत तो एमफिल और पीएचडी के उन शोध स्टूडेंट्स के लिए है जो कहीं पढ़ा रहे हैं या किसी अन्य यूनिवर्सिटी या संस्थान या जगह पर शोध के लिए जाते हैं. अब ऐसे स्टूडेंट्स को अपना सब काम छोड़कर जो ज्यादा जरूरी था, सिर्फ हाजिरी बजाने के लिए जेएनयू में अपने सेंटर या स्कूल आना होगा. अब पता नहीं कैसे किसी को लग रहा है कि इससे जेएनयू की अकादमिक गुणवत्ता में बढ़ोतरी होगी. जेएनयू के शिक्षक और स्टूडेंट हमेशा एकदूसरे के संपर्क में रहने की कोशिश करते हैं. यह किसी नौकरशाही फरमान की वजह से नहीं है बल्कि यहां की अकादमिक वातावरण की वजह से है.

अब इसके दार्शनिक पक्ष पर बात करते हैं. हम सबने कई बड़े-बड़े शिक्षाविदों को यह कहते हुए सुना है कि शिक्षा ऐसे देनी चाहिए कि वो किसी को बोझ न लगे बल्कि कोई भी स्टूडेंट स्वतः पढ़ने और ज्ञान अर्जित करने को प्रेरित हो. जेएनयू इसी संकल्पना की सफल प्रयोगशाला है, जिसमें शिक्षा किसी क्लास रूम में बंधी और बोझिल वस्तु की तरह नहीं है बल्कि यहां के शिक्षक इस बात के लिए स्टूडेंट्स को प्रेरित करते हैं कि वे उनके पढ़ाए गए विषय में रुचि लें और फिर खुद से कुछ नया खोजें.

अब तक जेएनयू को अकादमिक जगत में सफलता इसी वजह से मिली है. इसी कारण अनिवार्य उपस्थिति का विरोध करने जेएनयू के स्टूडेंट्स अपने शिक्षकों को कह रहे हैं कि वे क्लास रूम में क्लास न लेकर बाहर पढ़ाएं. और शिक्षक और स्टूडेंट्स यूनिवर्सिटी स्ट्राइक के बावजूद पढ़ने-पढ़ाने का काम कर रहे हैं. बस इन लोगों का यह कहना है कि किसी फरमान द्वारा उन्हें यह न बताया जाए की क्या करना है और क्या नहीं.

जेएनयू के प्रयोग को किसी सर्कुलर या कानून के बहाने नष्ट नहीं करना चाहिए. कोई भी कानून इसलिए बनाया जाता है कि जो चल रहा है उसे बेहतर किया जाए न कि जो बेहतर है उसे बर्बाद किया जाए. पर शायद जेएनयू के साथ यह बिडंबना रही है कि अकादमिक जगत में किसी भी सुधार में पहले यह कहा जाता है कि जेएनयू इस मामले में आदर्श है लेकिन सभी विश्वविद्यालयों पर यह नियम नहीं लागू किया जा सकता और फिर बाद में सभी विश्वविद्यालयों के मिए बनाए गए नियमों को जेएनयू पर ही सबसे पहले थोपने की कोशिश होती है.

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ऐसा जेएनयू के छात्रसंघ चुनाव के मामले में हो चुका है, फिर यौन-उत्पीड़पन को रोकने और जांच के लिए कार्यरत जीएसकैश को भंग किया गया और अब अनिवार्य उपस्थिति का प्रावधान. अब सवाल यह है कि अगर आप अन्य विश्वविद्लयों के बारे में जब यह कहते हैं कि जेएनयू के नियम उनपर लागू नहीं हो सकते तो फिर जेएनयू पर अन्य विश्वविद्यालयों के नियम कैसे लागू हो सकते हैं?

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इस संकट का सबसे दुखद पहलू तो यह है कि जेएनयू वीसी शायद जानबूझकर यह बात समझने की कोशिश नहीं कर रहे हैं. वे एक तरफ जेएनयू के नामपर पुरस्कार ले रहे हैं वहीं दूसरी ओर जिस परंपरा की वजह से उन्हें यह पुरस्कार लेने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है उसे ही बदलने और बर्बाद करने पर तुले हैं. स्टूडेंट्स के विरोध को रोकने के लिए हर दिन नए तरह की धमकियां दी जा रही हैं और छात्रसंघ के पदाधिकारियों पर फाइन लगाया जा रहा है. जबकि ये लोग जेएनयू ही नहीं बल्कि विश्वविद्यालय कैसे होने चाहिए, उसकी संकल्पना को बचाने की मुहिम में लगे हैं.

हाई कोर्ट के जेएनयू के एडब्लॉक के 100 मीटर के भीतर प्रोटेस्ट न करने के फरमान के बावजूद अगर इस बार जेएनयू के स्टूडेंट लगातार प्रशासनिक भवन के सामने प्रदर्शन कर रहे हैं तो शायद वे पाश की इन पंक्तियों के प्रेरणा ले रहे हैं:

मैं घास हूं

मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा

बम फेंक दो चाहे विश्वाविद्यालय पर

बना दो होस्टाल को मलबे का ढेर

सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर

मेरा क्या करोगे

मैं तो घास हूं हर चीज पर उग आऊंगा

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