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झारखंड में आदिवासियों का उबाल, निशाने पर रघुबर सरकार...

ग्राम सभा ने यह भी तय कर रखा है कि उनकी इजाजत के बगैर इस पूरे इलाके में कोई सरकार का प्रतिनिधि भी दाखिल नहीं हो सकता

Brajesh Roy Updated On: Aug 27, 2017 10:45 AM IST

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झारखंड में आदिवासियों का उबाल, निशाने पर रघुबर सरकार...

झारखंड के आदिवासी बहुल इलाकों में अब सरकार को सीधे चुनौती मिलने लगी है. ताजा घटना गुरुवार से शुक्रवार तक की है. रांची से सटे लगभग 60 किमी की दूरी पर खूंटी जिला के कांकी सिलादोन गांव में बैरिकेटिंग बैरियर को हटाने गई पुलिस और प्रशासनिक महकमा के 150 से ज्यादा अधिकारी और सहयोगियों को पारंपरिक हथियारों से लैस गांव वालों ने पूरी रात बंधक बना कर रखा.

पूरी रात बंधक रहने वाले जिलाधिकारी उपायुक्त के अलावा डीआइजी, एसपी, डीएसपी, एसडीओ सहित तीन थानो के थानेदार और सैंकड़ों पुलिस के जवान को 13 घंटे बाद शुक्रवार की सुबह ग्रामीणों ने रिहा किया. इससे पहले सरकार के आला अधिकारियों को जमीन पर आमने सामने बैठकर ग्रामीणों से बात करनी पड़ी और उनकी समस्याओं के निदान का वादा करना पड़ा.

क्यों उबाल पर हैं इलाके का आदिवासी समाज?

दरअसल चार किमी सर्किल वाले इस पूरे इलाके में गांव वालों ने अपनी सीमा पर सालों से किसी भी बाहरी आदमी के प्रवेश पर रोक लगा रखा है. सरकारी हुकुम इस इलाके में प्रभावहीन रहा है. यहां प्रशासन और सरकार की विवशता खुलकर सामने दिखती रही है.

भारतीय संविधान के तहत पांचवीं अनुसूची का हवाला देते हुए आदिवासियों ने गांव के मुहाने और बाजारों में पत्थलगढ़ी (शिलालेख) लगाकर किसी भी बाहरी आदमी के प्रवेश को प्रतिबंधित कर रखा है. यह आदेश इलाके के आदिवासी समाज की ग्राम सभा का है.

ग्राम सभा ने यह भी तय कर रखा है कि उनकी इजाजत के बगैर इस पूरे इलाके में कोई सरकार का प्रतिनिधि भी दाखिल नहीं हो सकता. यहां सालों से रह रहे मुंडा आदिवासी समाज का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन करते हुए वे हर चुनाव में वोट डालते आए हैं.

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बावजूद इसके यह पूरा इलाका आजादी के सत्तर साल के बाद भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है. यहां न ढंग से बिजली मिलती है, न पेयजल की समुचित व्यवस्था है और न ही बच्चों की पढ़ाई के लिए पुख्ता इंतजाम. इतना ही नहीं ग्रामीणों का यह भी मानना है कि सरकार और उसके नुमाइदें सिर्फ अपनी कमीशन खोरी के लिए योजनाओं को बनाते रहें हैं जिससे उन्हें कभी कोई लाभ नहीं हुआ.

इन्हीं कारणों से ग्राम सभा के तेवर इधर और भी ज्यादा तल्ख होते गए और ग्रामीणों ने पिछले एक साल से सभी सरकारी सुविधाओं का बहिष्कार भी कर रखा है. यही वजह है कि अपने पत्थलगढ़ी यानी शिलालेखों के जरिये संविधान का हवाला देते हुए यहां के ग्रामीणों ने बाहरी लोगों को चेतावनी देने का काम किया है.

पत्थलगढ़ी (शिलालेख) पर क्या लिखा है?

इलाके की ग्राम सभा ने लगभग सभी गांव, बाजार के मुहाने पर पत्थलगढ़ी कर रखा है और कई जगह पर बैरियर भी लगा रखा है. पत्थलगढ़ी पर जो बातें लिखी गई हैं उसके अनुसार:-

1> भारत का संविधान अनुच्छेद 13 (3) के तहत रूढ़ि या प्रथा ही विधि का बल है, यानी संविधान की शक्ति है.

2> अनुच्छेद 19 (5) के तहत पांचवीं अनुसूचित जिला या क्षेत्रों में कोई भी बाहरी या गैर रूढ़िवादी प्रथा के व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से भ्रमण करना, निवास करना और बस जाना वर्जित है.

3> अनुच्छेद 19 (6) के तहत कोई भी बाहरी व्यक्ति को पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में व्यवसाय, कारोबार और रोजगार पर प्रतिबंध है.

4> पांचवीं अनुसूचित जिलों या क्षेत्रों में भारत का संविधान अनुच्छेद 244 (1) भाग ख धारा 5 (1) के तहत संसद या विधानमंडल का कोई भी समान कानून लागू नहीं है.

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पत्थलगढ़ी या शिलापट्ट पर लिखी ये बातें अथवा हिदायतों के प्रति यहां की आम सभा बेहद सख्त है. इतना ही नहीं इनके दावों के समर्थन में हुटार गांव के चौराहे भारत राजपत्र का लगा एक बोर्ड भी इनके मनोबल को बढ़ाता रहा है. अपने इन्ही दावों और सरकार की उदासीन रवैये को ही आदिवासी समाज ने ढाल बना रखा है. गुरुवार को कुछ ऐसा ही हुआ जिससे कांकी सिलादोन के मुंडा आदिवसियों का आक्रोश उबाल पर आ गया.

ऐसा क्या हुआ गुरुवार को?

गुरुवार की सुबह मुंडा आदिवासी गांव कांकी में एक बिना नंबर वाली कार पहुंची. इस कार में खूंटी के थानेदार के साथ चार पुलिसकर्मी भी थे. ग्राम सभा के सदस्यों ने इनसे परिचय मांगते हुए अपने इलाके के नियम बताने की कोशिश की. इसपर थानेदार सहित पुलिसकर्मियों ने ग्रामीणों को गाली देना और फिर डंडे से पीटना शुरू कर दिया.

पुलिस वालों ने धमकी दिया कि जल्दी से ये सारा बैरियर हटाओ नहीं तो सबको जेल में डाल दिया जाएगा. इस बीच पुलिस के जवान ने एक महिला को राइफल के बट्ट से मार भी दिया. मामला बिगड़ता देख ग्राम सभा की एक महिला सदस्य ने पेड़ पर टंगी अलार्म घंटी को बजाना शुरू दिया. मिनट भर में सैंकड़ों आदिवासियों ने हरवे हथियार के साथ पुलिस वालों को घेर लिया. मौके की नजाकत को समझते हुए पुलिस दल यहां से भाग खड़ा हुआ.

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सुबह की इस छोटी सी घटना के बाद पुलिस महकमा ने पूरी तैयारी के साथ कांकी गांव पर धावा बोला. खूंटी के साथ मुरहु दो थाने की पुलिस ने लगभग 50 जवानों के साथ गांव पहुंचे और आते ही उन्होने बैरियर को तोड़ दिया. इतना ही नहीं रात में पहरा के लिए बनाये गए बांस के मचान को भी ध्वस्त कार डाला.

गांव वालों ने जब इसका विरोध किया तो पुलिस वालों की लाठी भोले आदिवासियों पर जमकर बरसने लगी. क्या पुरुष और क्या महिला, यहां तक की मासूम बच्चों को भी निशाने पर पुलिस ने लेना शुरू कार दिया. अपनी सुरक्षा के मद्देनजर फिर से एक सदस्य ने ग्राम सभा की घंटी को बजा दिया. इस दफा घंटी जोर से और देर तक बजी.

परिणाम तुरंत दिखा सिर्फ कुछ मिनट के अंदर दो हजार से भी ज्यादा ग्रामीण पारंपरिक हथियारों से लैस होकर पहुंचे और पुलिस वालों को अपने तरीके धावा बोल दिया. हथियारों से लैस आदिवासियों की बड़ी फौज को देखकर पुलिस वालों ने डंडों के साथ बंदूक से फायरिंग भी करना शुरू कर दिया.

यह अलग बात है कि पुलिस वालों ने हवाई फायरिंग ग्रामीणों को सिर्फ डराने और काबू पाने के लिए किया था. इधर ग्रामीणों की फौज में सिपाहियों की संख्या तेजी से बढ्ने लगी. देखते ही देखते आस पास गांव के ग्रामीण भी पारंपरिक हथियारों के साथ घटना स्थल पर पहुंच गए.

आदिवासी ग्रामीणों ने चारों तरफ से मौजूद पुलिस को घेर लिया. आदिवासी सेना के सामने आखिरकार पुलिस के जवानों ने सरेंडर कर ही दिया. तुरंत इसकी सूचना पुलिस के आला अधिकारियों तक पहुंची तो उनके होश उड़ गए.

जिला के डीसी मनीष रंजन, एसपी अश्विनी सिंहा, डीएसपी रणवीर और एसडीओ प्रणव के साथ भारी संख्या में पुलिस बल गांव कांकी सिलादोन पहुंचे. प्रक्षेत्र के डीआइजी अमोल वी होमकर भी रांची से अपने दल बल के साथ घटना स्थल पर पहुंचे. बड़े अधिकारियों के सामने आने के बाद भी ग्रामीणों का गुस्सा शांत नहीं हुआ.

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इस दौरान एसपी अश्विनी कुमार ने कहा भी कि आप भारत के संविधान के तहत हैं और देश में दो संविधान नहीं है. बावजूद इसके ग्रामीणों ने पुलिस अधिकारियों की एक न सुनी. ग्राम सभा के सदस्यों ने पुलिस पर कई तरह के गंभीर आरोप लगाए और आला अधिकारियों को निर्देश दिया ‘जबतक आप हमारी बात नहीं सुन लेते तब तक एक भी बाहरी आदमी इस गांव से बाहर नहीं जाएगा. यहां मौजूद सभी बाहरी लोगों को समझौता होने तक ग्राम सभा बंधक बनाती है.'

पूरे 13 घंटे बाद रिहा किया गया बंधकों को...

इस फरमान के बाद पूरी रात सरकारी महकमा ग्राम सभा का बंधक रहा. पूरे तेरह घंटे के बाद शुक्रवार की सुबह ग्राम सभा के सदस्यों की आपसी सहमति के बाद सभी अधिकारी और जवान रिहा किए गए.

अधिकारी और पुलिस वालों के जाने के बाद ग्राम सभा ने यह भी निर्णय लिया कि पुलिसिया जुल्म के लिए एसपी अश्विनी कुमार को जिम्मेवार मानते हुए उनपर देशद्रोह का मामला चलाया जाएगा. इसके साथ ही ग्राम सभा ने यह भी ऐलान किया कि 28 अगस्त को खूंटी पहुंच रहे राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास का भी ग्रामीण भारी विरोध करेंगे.

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फिलहाल शांति है यहां पर सरकार के लिए सबक...

फिलहाल घटना के बाद से इलाके में शांति कायम है और वो भी गांव वालों ने अपने तरीके से बनाने का काम किया है. ग्राम सभा की हिदायतों को समझते हुए यहां घटना के बाद पुलिस के जवानों को भी तैनात नहीं किया है प्रशासन ने.

बावजूद इसके इस घटना ने रघुवर सरकार के सामने कई सवाल जरूर खड़ा कर दिया है. यह अलग बात है कि सरकार इसके पीछे विपक्ष की ओछी राजनीति का जुमला पढ़ रही है.

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