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प्रदूषण पर सरकार या कोर्ट के रवैये से क्यों लग रहा जैसे कैंसर के मरीज को बैंडेज बांधा जा रहा है?

'प्रदूषण पर इस समय देश में जो हालात हैं, उसके लिए लोग जिम्मेदार नहीं है उसके लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकार और कहीं न कहीं कोर्ट का रवैया भी जिम्मेदार है'

Updated On: Oct 30, 2018 10:58 PM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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प्रदूषण पर सरकार या कोर्ट के रवैये से क्यों लग रहा जैसे कैंसर के मरीज को बैंडेज बांधा जा रहा है?
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चाहे नौनिहाल हो या 5 साल का मासूम बच्चा, देश की राजधानी इनके लिए श्मशान बनती जा रही है. दिल्ली का प्रदूषण इन सबके लिए यमदूत बनता जा रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी अब इस बात की तस्दीक कर दी है. हाल में जारी रिपोर्ट के अनुसार साल 2016 में भारत में वायु प्रदूषण की वजह से 5 साल की उम्र तक 1 लाख से ज्यादा बच्चों ने अपनी जान गंवाई है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि करीब 7 हजार मासूम बच्चे जिनकी उम्र 5 से 14 साल के बीच है, उनकी मौत भी वायु प्रदूषण की वजह से हुई है.

रिपोर्ट में यह भी चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि लड़कों की तुलना में लड़कियों की मौत सबसे ज्यादा हुई है. डब्लूएचओ की इस रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में वायु प्रदूषण की वजह से भारत में सबसे ज्यादा बच्चों की मौत हो रही है. इस रिपोर्ट में बताया गया कि निम्न-मध्यम आय वर्ग के देशों में 5 साल से कम उम्र के 98 प्रतिशत बच्चे 2016 में हवा में मौजूद महीन कण (पार्टिकुलेट मैटर) से होने वाले वायु प्रदूषण के शिकार हुए हैं.

संकेत आने वाली बड़ी घटना की तरफ इशारा कर रहे हैं 

मौसम वैज्ञानिक और प्रदूषण पर काम करने वाली सरकारी और गैर-सरकारी एजेंसियां दिल्ली-एनसीआर को स्मॉग चैंबर बनने को लेकर अपना अलग-अलग नजरिया पेश कर रहे हैं. पर्यावरण पर काम करने वाले कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यह संकेत आने वाली बड़ी घटना की तरफ इशारा कर रहे हैं. हमलोग इसे मौसमी आपातकाल भी कह सकते हैं. वहीं कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि मौसम में आए अचानक बदलाव की मुख्य वजह वायुमंडल में हवा की रफ्तार में कमी है, जो इस मौसम में पिछले कुछ वर्षों से देखा जा रहा है. वहीं, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को लगता है कि इसकी सबसे बड़ी वजह हरियाणा और पंजाब में पराली जलाने के बाद जो हवा दिल्ली की तरफ आई है, वही इसके लिए जिम्मेदार है.

Stubble Parali Burning

हर वर्ष इस मौसम में पंजाब और हरियाणा के किसान अपने खेतों में पराली जलाते हैं जो दिल्ली-एनसीआर के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण की एक मुख्य वजह है (फोटो: पीटीआई)

इस मौसम में सबसे ज्यादा दिक्कतों का सामना गर्भवती महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को करना पड़ रहा है. प्रदूषण के खतरनाक लेवल पर पहुंचने से गर्भवती महिलाओं के गर्भ में पलने वाले बच्चों पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ रहा है. इस मौसम में डॉक्टर लोगों को सलाह दे रहे हैं कि वो घर से बाहर कम ही निकलें. बच्चों में एलर्जी और चर्म रोग होने की संभावना ज्यादा होती है, बुजुर्ग लोगों को सांस और दिल की बीमारी होने का सबसे ज्यादा खतरा होता है. स्वस्थ और जवान लोगों को भी प्रदूषण की वजह से कई समस्याएं हो सकती हैं.

दिल्ली के लोक नायक जयप्रकाश नारायण (एलएनजेपी) अस्पताल में प्रोफेसर डॉ. नरेश कुमार फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘देखिए इस मौसम में खासकर सांस के मरीजों को विशेष ख्याल रखना पड़ता है. सांस के मरीजों की इस मौसम में हालत ज्यादा खराब हो जाती है. उन मरीजों को हमलोग या तो दवा की डोज़ बढ़ाते हैं या फिर अस्पताल में भर्ती कर लेते हैं. जो सांस के मरीज नहीं भी होते हैं उनको भी इस मौसम में सांस लेने में दिक्कत होती है और छाती में टाइटनेस (खिंचाव) महसूस होता है. ऐसे में उन्हें तुरंत ही डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. यह कभी-कभी जानलेवा भी साबित हो सकता है. जहां तक बच्चों की बात है वो भी इन चीजों से बच नहीं सकते. इन मौसम में घर के बाहर ही नहीं घर के अंदर भी प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है. बच्चों का न सिर्फ घर के बाहर ध्यान रखना होता है बल्कि उनका घर के अदंर भी ख्याल करना पड़ता है. इस मौसम में सांस के मरीजों को दवाई बिल्कुल नहीं छोड़नी चाहिए. एहतियातन बाहर निकलने से बचें. अगर सांस की परेशानी बढ़ती है तो फौरन अपने डॉक्टर से कंसल्ट (परामर्श) करें. घर में एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल कर सकते हैं.’

दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर पिछले कुछ वर्षों में खतरनाक स्तर तक पहुंचा

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अचल श्रीवास्तव फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर पिछले कुछ वर्षों में खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है. इससे सांस संबंधी बीमारियां सबसे ज्यादा फैलती हैं. सबसे ज्यादा असर दमा और सांस के मरीजों पर पड़ता है. स्मॉग से फेफड़ों तक हवा पहुंचाने वाली सांस नली में रुकावट, सूजन, रूखेपन की समस्या शुरू होने लगती है. फेफड़ा खराब होने लगता है, जो कि काफी खतरनाक है. आप कार में देखते हैं कि एक एअर क्लीनर होता है जिसे 15-20 हजार किलोमीटर चलाने के बाद बदलना पड़ता है, लेकिन यह फैसिलिटी हमलोगों के फेफड़ों में उपलब्ध नहीं है. फेंफड़े के अंदर एक बार जो चला जाता है वह बाहर नहीं निकलता. इसके साथ ही स्किन (त्वचा) की बीमारी भी वायु प्रदूषण के कारण होती है. साथ ही चिड़चिड़ापन और कुछ मामलों में तो चक्कर भी आने शुरू हो जाते हैं. कुछ मामलों में लोगों को ज्यादा नींद आने लगती है.’

दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण बढ़ने पर सांस संबंधित बीमारियों में इजाफा हो जाता है

वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वालों में बच्चे और बुजुर्ग होते हैं

पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस की जारी एक रिपोर्ट में भी भारत के प्रदूषण स्तर की बहुत ही भयावह तस्वीर पेश की गई है. रिपोर्ट के मुताबिक नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जन के विश्व के 3 सबसे बड़े ‘हॉटस्पॉट’ भारत में हैं और इनमें से 1 दिल्ली-एनसीआर में है. पीएम 2.5 और ओजोन के निर्माण के लिए नाइट्रोजन ऑक्साइड जिम्मेदार होता है.

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में 18 साल के कम उम्र के करीब 93 फीसदी बच्चे प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं. साल 2016 में दुनिया भर में 5 साल से कम उम्र के 5.40 लाख बच्चों की सिर्फ प्रदूषित हवा के कारण मौत हो गई. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में मरने वाले 5 साल से कम उम्र के 10 बच्चों में से 1 की मौत वायु प्रदूषण के कारण हो रही है.

WHO की ताजा रिपोर्ट ने ग्रीनपीस की रिपोर्ट को फिर मजबूत किया है

ग्रीनपीस इंडिया ने इसी साल जनवरी में एक रिपोर्ट जारी की थी. इस रिपोर्ट में एयरोप्किल्पिस-2 में प्रदूषित हवा का बच्चों पर असर को लेकर चिंता जाहिर की गई थी. डब्ल्यूएचओ की ताजा रिपोर्ट ने फिर से एक बार ग्रीनपीस की रिपोर्ट को मजबूत किया है. ग्रीनपीस की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में गरीब और मध्यम वर्ग के लोग प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. ये लोग घर के अंदर और घर के बाहर भी प्रदूषण के शिकार हो रहे हैं.

ग्रीनपीस के सीनियर कैंपेनर सुनील दहिया फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘भारत में पर्यावरण को लेकर हम लोगों ने पिछले साल सरकार के सामने विस्तृत और व्यावहारिक नीतियों को रखा था. हम पर्यावरण मंत्रालय से गुजारिश करते हैं कि वो हमारे बताए कुछ उपायों को स्वच्छ वायु के लिए तैयार हो रही राष्ट्रीय कार्ययोजना में शामिल करे और पावर प्लांट के लिए अधिसूचित उत्सर्जन मानकों का कठोरता से पालन करे. साथ ही अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कठोर मानकों को लागू कर प्रदूषण नियंत्रित करे.’

विश्व स्वास्थ्य संगठन

डब्ल्यूएचओ की ताजा रिपोर्ट ने एक बार फिर ग्रीनपीस की रिपोर्ट को मजबूत किया है, जिसमें कहा गया कि भारत में गरीब और मध्यम वर्ग के लोग प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं

दहिया आगे कहते हैं, ‘हमने हाल ही में वैश्विक स्तर पर सैटेलाइट डाटा के विश्लेषण को जारी किया है. इस विश्लेषण में हमलोगों ने पाया है कि भारत में कोयला और परिवहन उत्सर्जन के दो प्रमुख स्रोत हैं. नाइट्रोजन डायआक्साइड (एनओ 2) भी पीएम-2.5 और ओजोन के बनने में मददगार है. यह दोनों वायु प्रदूषण के लिए सबसे खतरनाक साबित हो रहे हैं. कोयला से चलने वाले उद्योग-धंधे और गाड़ियों के फ्यूल जलने से निकलने वाले कार्बन मोनोक्साइड (सीओ) से आप हर दिन दो-चार हो रहे हैं. हमने सरकार को एक रिसर्च बेस डाटा सौंपी है और कहा है कि प्रदूषण को कम करने के लिए कठोर नीतियों को बनाकर नई तकनीक अपनाए. इससे ही लोगों की जिंदगी बचाई जा सकती है. अगर इस पर अमल नहीं किया गया तो परिणाम और भी भयानक सामने आएगा.’

देश के जानेमाने पर्यावरणविद गोपाल कृष्ण फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘देखिए प्रदूषण को लेकर केंद्र सरकार, राज्य सरकार, एनजीटी या फिर सुप्रीम कोर्ट का हर कदम बेअसर साबित हो रहा है. प्रदूषण पर इस समय देश में जो हालात हैं, उसके लोग जिम्मेदार नहीं है उसके लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकार और कहीं न कहीं कोर्ट का रवैया भी जिम्मेदार है. साल 1997 में प्रदूषण को कंट्रोल करने के लिए केंद्र सरकार ने एक श्वेत पत्र जारी किया था. मगर इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी उस एक्शन प्लान पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है. अब लोगों का संस्थाओं पर से आस्था और विश्वास उठ गया है. संस्था की जिम्मेदारी होती है कि वो एक्शन प्लान को लागू करे. प्रदूषण पर काम करने वाली संस्थाओं की जिम्मेदारी होती है कि वो अपने ऑफिशियल विजडम में शामिल करे, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है.’

1981 एअर पॉल्यूशन एक्ट की अब इस देश में कोई सार्थकता नहीं बची 

गोपाल कृष्ण आगे कहते हैं, साल 1981 एअर पॉल्यूशन एक्ट की अब इस देश में कोई सार्थकता नहीं बची है. यह एक्ट अब देश में आउटडेटेड हो चुका है. 1981 के बाद वैज्ञानिक और मेडिकल साइंस के सबूत के आधार पर इस एक्ट को अपडेट नहीं किया गया है. इसको आप दूसरे तौर पर कह सकते हैं कि सरकारें या फिर कोर्ट कैंसर के मरीज को बैंडेज लगाने का काम कर रही है. भारत में प्रदूषण का जो स्टेंडर्ड मानक है वह डब्ल्यूएचओ के स्टैंडर्ड मानकों से काफी नीचे है. प्रदूषण की परिभाषा जो इस एक्ट में दिया गया है उसमें भी अब काफी बदलाव की जरूरत है. बता दूं कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी), पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) और खुद सुप्रीम कोर्ट की सख्ती भी प्रदूषण कम करने में बेअसर साबित हुई है. वायु प्रदूषण को लेकर दिल्ली-एनसीआर के क्षेत्र में आने वाले सभी राज्यों की हालत यह है कि अभी तक एक भी राज्य ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए अपना एक्शन प्लान तैयार नहीं किया है. ऐसे में मौजूदा हालात के लिए सरकारी तंत्र और उनकी नेक नीयती पर सवाल उठना तो लाजमी है.’

Supreme Court

पर्यावरणविद मानते हैं कि प्रदूषण पर देश में जो हालात हैं, उसके लिए लोग नहीं बल्कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और कहीं न कहीं सुप्रीम कोर्ट का रवैया भी जिम्मेदार है

कुल मिलाकर पिछले कुछ वर्षों से इस मौसम में दिल्ली-एनसीआर सहित देश के कई क्षेत्रों में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच जाता है. कई इलाकों में इस समय एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) पीएम 2.5 और पीएम 10 का स्तर 300 के आस-पास रहता है. इसे बेहद ही खराब स्तर माना जाता है.

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