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यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता...ये हमारे देश के लिए ही कहा गया है?

क्या ये वाकई वही देश है जिसके लिये पुराणों में लिखा गया है कि यहां नारियों की देवी रूप में पूजा होती है?

Updated On: Jun 26, 2018 07:36 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता...ये हमारे देश के लिए ही कहा गया है?
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थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के एक सर्वे ने महिलाओं से यौन हिंसा के मामले में भारत को सबसे खतरनाक देश बताया है. इस सर्वे के मुताबिक महिलाओं पर अत्याचार के मामले में भारत दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में  पहले नंबर पर है. सर्वे की अपनी रिपोर्ट है और उसके सैंपल लेने का अपना तरीका भी हो सकता है. लेकिन सिर्फ किसी शंका या सर्वे की प्रामाणिकता पर सवाल उठाकर इस रिपोर्ट को खारिज भी नहीं किया जा सकता है.

जहां नारी का सम्मान मां के रूप में होता है, देवी के रूप में पूजी जाती है और बेटी-बहन के रूप में सम्मानित की जाती हो, वहां देवता नहीं दानवों का वास हो जाए और महिलाएं सुरक्षित नहीं मानी जाएं तो ये शर्मसार करने के लिये काफी है. खासबात ये है कि इस सर्वे में युद्धग्रस्त सीरिया और अफगानिस्तान को दूसरे और तीसरे नंबर पर रखा गया है जबकि पाकिस्तान छठे नंबर पर है.

सवाल उठता है कि आखिर महिलाओं के लिये अत्याचारी और असुरक्षित कैसे होता जा रहा है भारत? आज भारत में नेशनल क्राइम ब्यूरो के मुताबिक हर महीने सौ से भी ज्यादा यौन-अपराध के मामले दर्ज होते हैं. देश का सिर शर्म से झुकाने वाले इस बात पर कभी अफसोस नहीं करेंगे कि उनकी फितरत और हैवानियत ने देश की इज्जत भी तार-तार कर डाली.

यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता !

जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवता वास करते हैं. लेकिन जिस देश में कोख में ही बेटियां मारी जाती रही हों तो वहां नारी अस्मिता को लेकर समाज ही विरोधाभास का प्रतीक भी है. एक तरफ नारी के मां दुर्गा स्वरूप की आराधना होती है, मां लक्ष्मी और सरस्वती को पूजा जाता है तो वहीं दूसरी तरफ रोजमर्रा की जिंदगी में मां-बेटी-बहू हिंसा और शोषण के लिए सॉफ्ट टारगेट होते हैं.

कभी दहेज के लिये किसी नवविवाहिता की हत्या कर दी जाती है, कहीं ‘ऑनर-किलिंग’ में बेटी की गला घोंट कर हत्या कर दी जाती है, कहीं किसी अबला की अस्मत लूट ली जाती है, कहीं एकतरफा इश्क के जुनून में सिरफिरे आशिक किसी लड़की पर तेजाब डाल कर उसके चेहरे को ताउम्र के लिए झुलसा जाते हैं तो कहीं विधवा बुजुर्ग मां के साथ उसका बेटा और बहू ही ‘थर्ड डिग्री टॉर्चर’ करता है. सोशल मीडिया के दौर में ऐसी घटनाओं के दिल दहलाने वाले वीडियो सबूत के तौर पर अक्सर नजर आते हैं.

क्या ये वाकई वही देश है जिसके लिये पुराणों में लिखा गया है कि यहां नारियों की देवी रूप में पूजा होती है?

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

ये विडंबना ही कि जिस देश को महिलाओं के लिये सबसे खतरनाक माना जा रहा है उसी देश में सामाजिक, राजनीतिक, औद्योगिक, शैक्षिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, खेल, सिनेमा जैसे क्षेत्रों के बड़े-बड़े पदों पर महिलाएं विराजमान हैं और उनकी कायल दुनिया है. लेकिन उसी देश में ये सर्वे भी मुंह चिढ़ा रहा है कि यहां सबसे असुरक्षित और शोषित महिलाएं हैं.

दरअसल इसकी वजह वो ही समाज है जहां मानवीय संवेदनाएं और नैतिक मूल्य धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं. भौतिकवाद की अंधी दौड़ में नैतिकता का पतन रफ्तार पकड़ चुका है. निर्भया कांड जैसी खबरें समाज के एक हिस्से की बदरंग तस्वीर तो इंसानियत पर बदनुमा दाग है. ऐसी हिंसक और घिनौनी घटनाओं के बाद कुछ पलों के लिये रगों में खून खौलता है लेकिन फिर एक लंबी खामोशी छा जाती है जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं था. उस सन्नाटे में न जाने कितनी दूसरी मासूम निर्भया की चीखें, क्रन्दन और सिसकियां भी खामोश हो जाती हैं. रेप की घटनाओं के बाद पीड़िता इंसाफ के लिये दर-दर भटक कर एक दूसरी लंबी यातना के सफर पर खुद को बेबस और अकेला पाती है.

हरियाणा के गुरुग्राम में एक महिला का ऑटोचालक रेप करता है. उसकी मासूम बेटी को चलते ऑटो से बाहर फेंक दिया जाता है. बाद में वही रेप पीड़ित महिला अपनी बेटी के शव के साथ गुरुग्राम के पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने जाती है लेकिन उसकी रिपोर्ट दर्ज नहीं होती. इसके बाद वो अपनी मृत बेटी को घायल समझ कर इलाज के लिये दर दर भटकती है. यहां तक कि बेटी के शव को गोद में लेकर मेट्रो से सफर कर दिल्ली के एम्स तक आती है. ये खबर अखबारों-टीवी चैनलों की हेडलाइंस भी बन जाती है. लेकिन रेप की तमाम राक्षसी-कहानियों के अंत की तरह ये पीड़िता भी इंसाफ की लड़ाई और बेटी की जिंदगी की जंग हार जाती है.

रेप पीड़िताओं के अधूरे इंसाफ की हजारों घटनाएं कोर्ट-कचहरी के दस्तावेजों में दबी पड़ी हैं और उन मामलों को वक्त की गर्द धुंधलाने का काम करती आई है.

हर बड़ी घटना पर एक शोर जरूर होता है. इंसाफ के लिये आवाज बुलंद करने के वादे भी होते हैं. लेकिन कुछ मोमबत्तियों की रोशनियां समाज को अंधेरे से ज्यादा देर तक दूर नहीं कर पाती हैं.

छह महीने से लेकर दस साल की बच्चियों के साथ रेप की खबरें देश का दिल दहलाने का काम करती हैं. जम्मू के कठुआ में 8 साल की बच्ची के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली इस तरह की घटनाओं से सिर्फ पॉक्सो एक्ट से निपटना भी आसान नहीं था. इसलिये पॉक्सो एक्ट में संशोधन कर 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के दोषियों के लिये मौत की सजा का प्रावधान किया गया.

रेपिस्ट को फांसी देने की मांग पर भी बहस होती है. सरकार ये इच्छाशक्ति इसलिये नहीं दिखा पाती क्योंकि उसे इस कानून के बेजा इस्तेमाल का भी डर है. साथ ही यह बहस भी छिड़ती है कि क्या कड़े कानूनों से ही रेप से निजात मिल सकेगी?  क्या कड़े कानून बनाने से रेप की घटनाओं पर अंकुश लग सकता है?

सिर्फ कानून के जरिये ही यौन अपराधियों पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता है. समाज अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में नाकाम दिख रहा है. नई पीढ़ियां आधुनिकता की होड़ में पुराने संस्कारों का अंतिम संस्कार कर रही हैं. जब समाज ही सोने लगे तो फिर संस्कार कहां से जगाए जा सकते हैं. रेप की घटनाओं के लिये सिर्फ लड़कियों के छोटे कपड़ों और उनकी आजादी को जिम्मेदार ठहराकर समाज के कथित ठेकेदार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते हैं.

आज अगर इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध होने वाली आपत्तिजनक सामग्री और सिनेमाई पर्दे की अश्लीलता से समाज में बच्चों के दिमाग पर नकारात्मक असर पड़ रहा है तो परिवार का भी ये दायित्व बनता है कि वो किशोर से युवा होती पीढ़ी में संस्कार भरने में कोताही न बरते. घर की चौखट के भीतर से ही बेटी-मां-बहन के सम्मान और सुरक्षा का संस्कार लड़कों में भरा जाए लेकिन विडंबना ये है कि परिवार के लिये पैसा कमाने की होड़ में परिवार ही पीछे छूटते जा रहे हैं. भटके हुए किशोर मन को समझने और समझाने के लिए पैरेंट्स के पास वक्त की कमी है जिस वजह से बच्चों के खाली मन में बुरी बातें अपना घर बना रही हैं.

ऐसे में कानून क्या करेगा सिवाए सज़ा देने के. अपराध की राह पर तो पहला कदम घर से ही बाहर निकलता है.

लेकिन महिलाओं के साथ यौन अपराधों को लेकर बहस बेमानी इसलिये भी नहीं है क्योंकि इसी समाज में नेता सरेआम किसी रेप की घटना पर पर्दा डालने के लिये ये तक कह डालते हैं कि 'लड़कों से गलती हो जाया करती हैं'.

रेप की घटनाओं पर जब राजनीति अपना पर्दा डालती है तो वो संवेदनशीलता का कफन बन जाता है. ‘पिंक’ जैसी फिल्में अपनी कहानियों के जरिये आक्रोश दिखाने की कोशिश करते हैं और नारी की निजता को सम्मान देने की अपील करते हैं लेकिन दलीलों के शोर में वो तमाम अपीलें अनसुनी रह जाती हैं. असहनीय यातनाओं को झेलने वाली एक शोषित अपने हिस्से के इंसाफ के लिये जलालत की हर चौखट से जब गुजरती है तो उसे यह अहसास होता है कि पुरुष प्रधान समाज में वो कितना बड़ा अभिशाप है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

नारी आखिर कहां सुरक्षित है? अगर वो घर में है तो घरेलू हिंसा का शिकार हो जाती है या फिर किसी भरोसेमंद रिश्तेदार से रेप का. शर्म और डर की वजह से अपनी व्यथा किसी से कह नहीं पाती है.

अगर वो किसी दफ्तर में काम करती है तो वहां उत्पीड़न के लिये कई निगाहें घूर रही होती हैं. कामकाजी लड़कियों के लिये अकेले रहना या फिर अकेले आना-जाना हर दिन किसी डरावने अहसास के साथ उनकी असुरक्षा के भाव के बढ़ाने का काम करता है.

आज किसी बुजुर्ग को सड़क पार करते समय लोग गाड़ियां रोकने में समय की बर्बादी समझते हैं या फिर किसी बुजुर्ग महिला को मेट्रो या बस में सीट देने पर झगड़ा करने पर आमादा हो जाते हैं. ऐसी सोच रखने वाली पीढ़ी से किसी महिला के प्रति सम्मान की उम्मीद करना पानी की लकीर पर लिखने के समान है. ऐसे में समाज के साथ साथ परिवार,स्कूल और कानून को भी बराबरी से अपनी भूमिका निभानी होगी और गलत सांचे में ढलने से युवा होते किशोरों को बचाना होगा.

एक स्वस्थ समाज और सभ्य सोच पर ही महिलाओं का वर्तमान और भविष्य निर्भर करता है. महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का जज्बा घरों से ही विरासत में जबतक परिवार को नहीं मिलेगा तो वो बाहर सम्मान क्यों प्रदर्शित करेगा?

देश के मौजूदा हालातों में महिलाओं के लिये पुरुषवादी सोच बदलने की सख्त जरूरत है और इसके लिये समाज के साथ सरकार की इच्छा शक्ति की जरूरत है. सिर्फ नारों और चुनावी घोषणा-पत्र जैसे वादों से आज महिलाओं की हालत नहीं सुधर सकती और न ही कानूनों में संशोधनों से महिलाओं के भीतर सुरक्षा का भाव भरा जा सकता है.

महिलाओं की सुरक्षा के लिये ये जरूरी है कि उनके खिलाफ यौन अपराध करने वाले कुंठित और अर्धविक्षिप्त तत्वों में अपराध के बाद मिलने वाली सजा का भय भरा जाए ताकि उस गलती को करने से उनकी रूह कांपे. साथ ही ये जरूरी है कि महिलाएं ‘मी टू’ जैसे कैम्पेन के जरिये ही अपने साथ हुए हादसे को न बताएं बल्कि वो बिना किसी डर और दबाव के अपने साथ हुए अपराध को लेकर आवाज बुलंद करें. हो सकता है कि चीरहरण करने वाली भीड़ के सामने कोई कृष्ण भी आ जाए. अगर महिलाएं भी अपनी सुरक्षा के लिये आवाज बुलंद नहीं करेंगी तो हर साल महिलाओं पर अत्याचार के मामले सिर्फ नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़े बढ़ाने का ही काम करेंगे.

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