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झारखंड में नक्सलियों से ज्यादा हाथियों ने की हत्याएं

झारखंड में हाथियों का खौफ नक्सलियों से कहीं ज्यादा है

Ravi Prakash Updated On: May 23, 2017 09:38 AM IST

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झारखंड में नक्सलियों से ज्यादा हाथियों ने की हत्याएं

झारखंड के देवघर जिले के पत्रकार भोला तिवारी की कमर टूट गई है. वे पिछले दिनों मधुपुर इलाके में आए जंगली हाथियों की तस्वीर ले रहे थे. उन्हें ऐसा करते देख गजराज नाराज हुए. उन्हें दौड़ा दिया और बेचारे भोला हाथी से बचने की कोशिश में गड्ढे मे गिर गए. इन दिनों वे अपना इलाज करा रहे हैं.

रामगढ़ जिले के हेसल गांव निवासी देवनाथ बेदिया को हाथियों ने तब घेरा, जब वे प्याज के अपने खेत में पानी पटा रहे थे. साथ में उनका बेटा आशीर्वाद भी था. इसी बीच जंगल से आए हाथियों के एक झुंड ने उन्हें घेर लिया.

एक हाथी सूढ़ में उठाकर उन्हें हवा में उछालने लगा. कुछ देर बाद उसने देवनाथ बेदिया को पटक दिया. इससे वे बुरी तरह घायल हो गए. बाद में रांची के एक अस्पताल में उनकी मौत हो गई.

उन्हें बचाने की कोशिश कर रहे उनके बेटे आशीर्वाद को भी हाथियों ने पटक दिया. इसमें बुरी तरह घायल होकर वह अपना इलाज करा रहा है. इस घटना से पूरे गांव मे दहशत है.

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दहशत का नाम हैं हाथी

झारखंड और आसपास के राज्यों में जंगली हाथियों के उत्पात की ऐसी कहानियां आपको हर रोज सुनने के मिलेंगी. रोज कहीं न कहीं हाथियों का झुंड उत्पात मचाता है और अगले दिन वन विभाग के लोग क्षति की गणना करने लगते हैं.

ऐसी घटनाओं से आजीज झारखंड की रघुवर दास सरकार ने हाथियों द्वारा मारे जाने पर मृतक के परिजनों को 4 लाख रुपए के मुआवजे का प्रावधान किया है. हाल ही में कैबिनेट ने इसे मंजूरी दी है.

नक्सली हिंसा बनाम हाथियों के हमले

दरअसल, झारखंड में हाथियों का खौफ नक्सलियों से कहीं ज्यादा है. इसकी वजह साफ है. झारखंड में नक्सली हिंसा में मारे गए लोगों से ज्यादा संख्या वैसे लोगों की है, जो हाथियों के हमले में अपनी जान गंवा बैठे.

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वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक साल 2015-16 में जंगली हाथियों के हमलों में झारखंड के 66 लोगों ने अपनी जान गंवाई, जबकि नक्सली हिंसा मे मारे गए लोगों की संख्या 57 थी.

इस साल 28 फरवरी तक हाथियों ने 42 लोगों को मार डाला है. किसी एक साल में इस वजह से सबसे अधिक मौत 2010-11 मे हुई थी. उस साल हाथियों के हमले में झारखंड के 69 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी.

ऐसा क्यों होता है

झारखंड के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वाइल्ड लाइफ) एल आर सिंह के मुताबिक, इसके पीछे मुख्य वजह हाथियों के लिए जंगलों में खाने-पीने का प्रबंध नहीं हो पाना है. हाथियों को बांस व खैर आदि के पत्ते और टहनियां ज्यादा पसंद हैं. जंगलों मे अब ऐसे पेड़ कम ही हैं.

इसके अलावा लगातार बढ़ती गर्मी के कारण जलस्रोत सूखे हैं. इस वजह से जंगल में पहले आसानी से उपलब्ध पानी भी अब हमेशा उपलब्ध नहीं हो पाता.

इस कारण हाथी आबादी की तरफ आते हैं और ग्रामीणों को देखकर हिंसक हो जाते हैं. उन्होंने बताया कि झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल समेत हाथी प्रभावित 5 राज्यों की कमेटी बनायी गयी है. इसमें इस समस्या से निपटने के उपायों पर विचार किया जा रहा है.

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जंगल कटेंगे तो यही होगा

पर्यावरणविद नीतीश प्रियदर्शी कहते हैं कि मानव-हाथी भिड़ंत का मुख्य कारण जंगलों का कम होना है. सौ साल पहले जहां घने जंगल ते, वहां अब घर बनने लगे हैं. पेड़ों की कटाई हो रही है और जगलों पर कब्जा करने की कोशिश.

ऐसे में हाथियों को आबादी में आने से कोई नही रोक सकेगा. उन्होंने बताया कि कुछ हाथियों को शराब की गंध भी भाती है.

जैसे ही हड़िया (आदिवासियों द्वारा बनायी जाने वाली शराब) की गंध उनके नथुने में जाती है, वे खुद को नहीं रोक पाते और अगर हाथियों ने भूले से भी शराब पी ली तो उनके द्वारा पहुंचायी जाने वाली क्षति का आप पूर्वानुमान नही कर सकते.

...जब हाथी गांव आते हैं

हाथियों का झुंड गांवों में भोजन तलाशने आता है. इस कारण पहले तो वे खेतों मे खड़ी फसल उखाड़ते हैं फिर घरों को तोड़कर अनाज खोजते हैं.

यह देखकर ग्रामीण भयभीत हो जाते हैं. और फिर उन्हें भगाने की कोशिश की जाने लगती है. इस दौरान जाते-जाते भी हाथी बड़ी क्षति कर जाते हैं.

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