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ताज महल और लाल किले को कॉरपोरेट ऐसा क्या बना देगा जिसमें सरकारें नाकाम रहीं?

हजारों करोड़ खर्चकर शिवाजी और पटेल की मूर्ति लगाने वाले देश में विरासतों को संभालना क्या इतना मुश्किल है?

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Apr 28, 2018 06:28 PM IST

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ताज महल और लाल किले को कॉरपोरेट ऐसा क्या बना देगा जिसमें सरकारें नाकाम रहीं?

केंद्र सरकार ने लाल किले को 5 साल के लिए ‘डालमिया भारत’ को गोद दे दिया है. इसके बाद अगला टेंडर ताजमहल का होगा. खबरों के मुताबिक 25 करोड़ की धनराशि के बदले डालमिया भारत देश की इस धरोहर को अपने हिसाब से ‘विकसित’ करेगा. लाल किले में बेंच, शौचालय और लाइटिंग जैसी सुविधाएं दी जाएंगी. इसके अलावा और भी कई ऐसे काम किए जाएंगें जिनसे आने वाले ‘ग्राहक’ बार-बार आएं. इन सारी सुविधाओं का खर्च आने वाले लोगों से वसूला जाएगा. इसका अर्थ हुआ कि भविष्य में भारत में इन जगहों पर घूमना महंगा पड़ने वाला है.

इस फैसले को लेकर कई लोग नाराज़ हैं. वहीं एक तबके का कहना है कि लाल किला और ताजमहल जैसे प्रतीकों की बेहतर देखभाल कोई करे और उससे पैसा भी कमाए तो इसमें बुरा क्या है. दूसरी तरफ बात ये भी है कि देश के सम्मान से जुड़ी हर चीज़ को मुनाफा कमाने के लिए बेचा, गिरवी रखना या लीज़ पर देना सही नहीं हैं. बाकी सारी बातों पर बाद में बात करते हैं. पहले तथ्यात्मक रूप से समझ लेते हैं कि क्या ताजमहल, लालकिला और दूसरी धरोहरों का रखरखाव इतना महंगा है कि उन्हें निजी हाथों में सौंप देना ही एकमात्र विकल्प है.

मुनाफा कमाते हैं ताजमहल और लालकिला

2016 जुलाई में संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने लोकसभा में अपने लिखित उत्तर में बताया था कि 2013 से 2016 तक ताजमहल से आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने कुल 75 करोड़ रुपए कमाए. इन तीन सालों में ताजमहल पर कुल 11 करोड़ रुपए का खर्च हुआ. ताजमहल के रखरखाव में सालाना खर्च औसतन 3-4 करोड़ था. इसमें सबसे बड़ा खर्च ताज को सफेद बनाए रखने के लिए संगमरमर की सफाई का खर्च है. 2015-16 में इस क्लीनिंग ट्रीटमेंट में 55 लाख रुपए का खर्च आया था. वो भी तब जबकि पूरे ताज को विशेष तौर पर साफ किया गया था. इसका सीधा अर्थ है कि ताजमहल अपने महंगे रखरखाव के बाद भी अच्छा-खासा मुनाफा कमाने वाली संस्था है.

अगर बात लालकिले की करें तो भारत का ये प्रतीक देश की सबसे ज्यादा कमाई वाली ऐतिहासिक इमारतों में से एक रही है. 2013-14 में लालकिला लगभग 6 करोड़ 16 लाख की कमाई करने वाली इमारत था. जबकि लाल किले में ताजमहल की तरह मड पैकिंग जैसी सफाई का कोई खर्च नहीं है, लालकिला भी किसी प्रकार से सरकार के लिए सफेद हाथी नहीं दूध देने वाली गाय ही है. लालकिला और ताजमहल जैसी इमारतों को जितने पैसे में ‘गोद दिया’ गया है, उतना या उससे ज्यादा पैसा ये इमारतें पहले से ही कमा रही हैं. ऐसे में इस तरह के फैसले के पीछे की मंशा स्पष्ट नहीं होती है.

क्या अक्षम है आर्कियोलॉजिकल सर्वे

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पास देश भर में 3600 से ज्यादा साइट्स हैं. लगभग 1000 करोड़ के बजट वाले विभाग के पास हर तरह की इमारते हैं. लाल किले और ताजमहल का ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक महत्व है. कोणार्क के मंदिर और दरगाहों का धार्मिक महत्व है. इन सबको अलग-अलग श्रेणी में बांटा गया गया है. सामान्य सी बात है कि सबका एक जैसा रखरखाव संभव नहीं हैं. 2009 में एसएसआई की 35 साइट्स खो गई थीं. यहां खो जाने का मतलब नष्ट होना नहीं हैं. कुछ जगहें बाढ़, बांध आदि में डूब गईं. कुछ को ढूंढा नहीं जा सका. कुछ को स्थानीय लोगों ने नष्ट कर दिया.

एसएसआई के मुताबिक आसाम में शेरशाह सूरी की बंदूकें खोई मान ली गई थीं. बाद में वो आसाम में ही कहीं और मिलीं. कुछ जगहों के मंदिर लोगों ने तोड़कर उनके पत्थर घरों में लगा लिए. सीधी सी बात है कि एसआई हर इमारत की सुरक्षा ताजमहल की तरह नहीं कर सकता है. लेकिन देश भर की 32 वर्ल्ड हेरिटेज इमारतों की देखभाल कर रहा है और उनसे पैसे भी कमा रहा है.

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पहले भी सुधारा गया है इमारतों को

हुमायूं का मकबरा दुनिया भर में दिल्ली की प्रमुख पहचानों में से एक है. विभाजन के समय इस जगह पर रिफ्यूजी कैंप लगाए गए. तमाम झोपड़ियां, खोखे और मकान बन गए. इसके चारबाग में सब्जियां उगाई जाने लगीं. ऐसे आर्कियोलॉजिकल सर्वे ने इसे सुधारने के चार असफल प्रयास किए. जिसके बाद काबुल के आगा खां ट्रस्ट और ओबेरॉय होटल ने इसको वापस गरिमापूर्ण बनाने के लिए अच्छा-खासा पैसा दान दिया.

मकबरे के सामने से अतिक्रमण हटा. कंक्रीट और दूसरे निर्माण को हटाकर पानी का सिस्टम, बगीचे सुधारे गए. इसके बाद मकबरा उस स्थिति में पहुंचा जहां इसे देखने बराक ओबामा भी आए. इस पूरी प्रक्रिया की खास बात ये है कि इसका बोझ नागरिकों या सैलानियों से जबरन नहीं वसूला गया. इस सुधार के बदले में आगा खां ट्रस्ट य़ा ओबेरॉय होटल का बोर्ड हुमायूं के मकबरे पर लगा नहीं दिखता. जबकि नई योजना में पहले ही स्पष्ट है कि ‘गोद लेने’ वाली कंपनी इसके जरिए ब्रांडिंग भी करेगी, इसके सांस्कृतिक इस्तेमाल भी होंगे. इसे डेस्टिनेशन की तरह ‘विकसित’ भी किया जाएगा.

जंगल को बगीचा बनाना विकास नहीं

देश में मध्यवर्ग का एक बड़ा तबका ऐसा है जिसके लिए दो वक्त की रोटी के संघर्ष के बीच कभी कभार ही घूमने जाने का मौका मिलता है. जो ट्रेन, बस की भीड़ में आकर ताजमहल, कुतुबमीनार, कोणार्क या अजमेर घूमने का प्लान बनाता है. उस आदमी के बजट में 30 रुपए का कोई टिकट अतिरिक्त बोझ नहीं लगता. लेकिन 4 लोगों के हिसाब से 250 रुपए के 4 टिकट जिसके बस में नहीं होते.

दुनिया भर में ऐसी इमारतों को देखने का खर्च 10 से 25 डॉलर या यूरो के बीच है. ये इन देशों में किसी मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने के खर्च के बराबर है. अगर भारत में यही मॉडल लागू हुआ तो अनुमानतः टिकट की कीमत इसी के बीच होगी. ज़ाहिर सी बात है कि ये खर्च देश की बड़ी अर्धशहरी या ग्रामीण आबादी, छात्रों और युवाओं से उनकी विरासत से रूबरू होने का मौका छीन लेगी.

इन सबस तथ्यों के परे भी एक और बात है. कुछ चीज़ें हमारे सम्मान, परंपरा और इतिहास से जुड़ी हुई हैं. इसीलिए देश की आजादी की बात करते समय अनगिनत बार ‘लालकिले की प्राचीर से’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है. इसीलिए पाकिस्तान ने युद्ध में ताजमहल पर बम गिराने की कोशिश की थी. हर पेड़ से फल नहीं मिलते, कुछ छांव देते हैं तो कुछ का घर में होना शुभ माना जाता है.

ओलंपिक में जब खिलाड़ी पदक जीतते हैं, राष्ट्रध्वज ऊपर जा रहा होता है, राष्ट्रगान बजता है, लोग भावुक होकर रोते हैं. भावुक करने वाले उस मौके को लाखों करोड़ों लोग देखते हैं. अगर कोई कंपनी उस मौके पर राष्ट्रगान की जगह उसका विज्ञापन बजाने के करोड़ों रुपए दे, बदले में खिलाड़ियों को और अच्छी सुविधाएं देने की बात करें तो क्या नैशनल एंथम को किसी विज्ञापन से बदल देंगे?

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