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जस्टिस जोसेफ के मामले में क्यों आधारहीन हैं सरकारी तर्क

सवाल यह है कि यदि जोसेफ हाईकोर्ट जजों में जूनियर हैं तो उन्हें कोलेजियम की सिफारिश पर वर्तमान बीजेपी सरकार ने 2014 में उत्तराखण्ड का चीफ जस्टिस क्यों बनाया था ?

Virag Gupta Virag Gupta Updated On: Apr 27, 2018 06:07 PM IST

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जस्टिस जोसेफ के मामले में क्यों आधारहीन हैं सरकारी तर्क

सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम ने जनवरी 2018 में 2 लोगों को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने की सिफारिश की थी. तीन महीने बाद सरकार द्वारा इंदू मल्होत्रा के नाम को मंजूरी और उत्तराखण्ड के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ की पदोन्नति पर कोलेजियम से पुर्नविचार करने के पत्र से राजनीतिक बखेड़ा खड़ा हो गया है.

जस्टिस जोसेफ ने उत्तराखण्ड में राष्ट्रपति शासन के आदेश को निरस्त किया था. कोलेजियम ने जोसेफ को आंध्र प्रदेश-तेलंगाना का चीफ जस्टिस बनाने के लिए बहुत पहले अनुशंसा की थी जिस पर सरकार ने चुप्पी साध ली. जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट का जज ना बनाए जाने के लिए सरकार द्वारा दिए जा रहे तर्क, परंपराओं और तथ्यों के विपरीत हैं जिससे यह मामला अभी और तूल पकड़ सकता है.

केएम जोसेफ देश के सबसे सीनियर चीफ जस्टिस हैं. केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को पत्र लिखा है. कानून मंत्री के अनुसार देश के सभी हाई कोर्टों की वरिष्ठता सूची में जोसेफ 42वें स्थान पर हैं और वरिष्ठता क्रम में उनके ऊपर 11 मुख्य न्यायाधीश हैं. इस बारे में दिल्ली स्थित संस्था सेन्टर फॉर एकाउंटेबिलिटी एण्ड सिस्टमिक चेंज (सीएएससी) द्वारा जजों की सीनियरटी लिस्ट के अध्ययन के बाद एक चार्ट बनाया गया है, जिसके अनुसार केएम जोसेफ की चीफ जस्टिस पद पर 31 जुलाई 2014 को नियुक्ति हुई थी.

अध्ययन के अनुसार देश में 24 हाईकोर्टों के चीफ जस्टिस में जोसेफ सबसे वरिष्ठ हैं और उनके बाद वरिष्ठता सूची में गुजरात के चीफ जस्टिस आर सुभाष रेड्डी का नाम है जिनकी नियुक्ति 13 फरवरी 2016 को हुई थी. अमूमन हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ही सुप्रीम कोर्ट के जज बनते हैं तो फिर जजों की पुरानी सीनियरटी से मामले को बेवजह क्यों उलझाया जा रहा है ?

सवाल यह है कि यदि जोसेफ हाईकोर्ट जजों में जूनियर हैं तो उन्हें कोलेजियम की सिफारिश पर वर्तमान बीजेपी सरकार ने 2014 में उत्तराखण्ड का चीफ जस्टिस क्यों बनाया था ?

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10 हाईकोर्टों से सुप्रीम कोर्ट में जज ना होने का बेजा तर्क

कानून मंत्री द्वारा लिखे गए पत्र के अनुसार जोसेफ की नियुक्ति से सुप्रीम कोर्ट में केरल के दो जज हो जाएंगे जबकि देश के 10 हाईकोर्टों का सुप्रीम कोर्ट में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है. पत्र के अनुसार हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस स्तर पर ही केरल हाईकोर्ट का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है. मंत्री जी के अनुसार छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस टीबी राधाकृष्णन व केरल हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एंटनी डोमिनिक भी केरल हाईकोर्ट से हैं.

इस तर्क के आधार पर जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट जज ना बनाने का फैसला पूरी तरह से गलत है. देश में 29 राज्य और 7 केन्द्र शासित प्रदेश हैं जबकि हाईकोर्ट केवल 24 राज्यों में ही है, इसलिए सभी राज्यों से सुप्रीम कोर्ट में प्रतिनिधित्व वैसे भी संभव नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में जज बनने के लिए राज्यवार आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है और इसलिए कई राज्यों से सुप्रीम कोर्ट में अनेक जज हैं.

दिल्ली और बम्बई हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में तीन जज हैं. पूर्व में नियुक्त तीनों वकीलों के बाद इंदु मल्होत्रा भी दिल्ली से हैं, तो सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली से कुल सात जज हो जायेंगे. इलाहाबाद, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से भी सुप्रीम कोर्ट में दो जज हैं, तो फिर केरल से दो जजों पर आपत्ति क्यों? सुप्रीम कोर्ट में केरल के जज कूरियन जोसेफ वैसे भी नवम्बर 2018 में रिटायर हो जायेंगे, जिसके बाद केएम जोसेफ केरल से सुप्रीम कोर्ट में इकलौते जज हो सकते हैं.

खाली पदों से एससी/एसटी के जजों की नियुक्ति क्यों नहीं

एससी/एसटी कानून पर फैसले के बाद यह बात सामने आई कि सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति और जनजाति का कोई जज नहीं है. जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट का जज ना बनाने के लिए कानून मंत्री ने अपने पत्र में एससी/एसटी के शून्य प्रतिनिधित्व की बात कहकर बहस को राजनीतिक रुख देने की कोशिश की है.

सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति के आखिरी जज केजी बालाकृष्णन थे जो चीफ जस्टिस बनकर मई 2010 में रिटायर हुए. देश में अनुसूचित जनजाति की बड़ी आबादी है और उस वर्ग से सुप्रीम कोर्ट में आज तक कितने जज हुए, इस पर दूरगामी विचार करने की बजाए जोसेफ को बलि का बकरा क्यों बनाया जा रहा है ? सुप्रीम कोर्ट में जजों की कुल स्वीकृत संख्या 31 है और इंदू मल्होत्रा के बाद 25 जज हो गए हैं. 2018 में पांच जज रिटायर होगें जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में जजों की 10 वैकेंसी हो जाएंगी.

जोसेफ की नियुक्ति को रोकने की बजाए क्या रिक्त हुए पदों पर एससी/एसटी जजों के प्रमोशन की बात नहीं होनी चाहिए ?

कोलेजियम की सिफारिश पर आंशिक अमल क्यों

सीनियर वकील इंदिरा जयसिंह समेत 100 वकीलों ने याचिका दायर करके सरकार के निर्णय पर रोक लगाने की मांग को चीफ जस्टिस ने ठुकरा दिया. इसके पहले 2014 में सरकार ने तीन वकीलों को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाते हुए पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम के नाम पर आपत्ति जाहिर की थी. तत्कालीन चीफ जस्टिस आर. एम. लोढ़ा ने कोलेजियम की सिफारिशों पर सरकार द्वारा खण्डित स्वीकार करने पर आपत्ति जाहिर करते हुए सख्त पत्र लिखा था.

इसके बाद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा है कि सरकार कोलेजियम की सिफारिश को वापस भेज सकती है. जजों की नियुक्ति के बारे में मेमोरेण्डम ऑफ प्रोसिजर (एम. ओ. पी.) पर अंतिम स्वीकृति मिलने तक इन बातों पर विवाद बना रहेगा. सवाल यह है कि क्या कोलेजियम द्वारा जोसेफ के नाम की संस्तुति दोबारा यदि की गई तो क्या सरकार उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाएगी?

( लेखक सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं.)

( क्या हैं कोलेजियम, एमओपी और मास्टर ऑफ़ रोस्टर पर विवाद , इस बारे में अगली कड़ी में विस्तार से चर्चा )

 

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